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जलवायु परिवर्तन से हिमालय में बढ़ेंगी खतरनाक घटनाओं की चुनौती

Published: Wed, 26 Aug 2026 11:08 PM (IST)

बीआइटी मेसरा के शोध में खुलासा हुआ है कि भारतीय हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव एक समान नहीं है, पश्चिमी हिमालय सबसे तेजी से गर्म हो रहा है।

1901 से 2020 तक के तापमान आंकड़ों तथा 8 वैश्विक जलवायु मॉडलों का विश्लेषण किया गया है।

1901 से 2020 तक के तापमान आंकड़ों तथा 8 वैश्विक जलवायु मॉडलों का विश्लेषण किया गया है। 

HighLights

  1. पश्चिमी हिमालय में तापमान सबसे तेजी से बढ़ रहा है।

  2. दिन की तुलना में रातें अधिक गर्म हो रही हैं।

  3. बर्फ पिघलने और आपदाओं का खतरा बढ़ा है।

जागरण संवाददाता, रांची। भारतीय हिमालय क्षेत्र (IHR) में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव हर हिस्से में एक समान नहीं है।

बीआइटी मेसरा के रिमोट सेंसिंग एवं जियोइंफॉर्मेटिक्स विभाग के शोध में यह चिंताजनक खुलासा हुआ है कि पश्चिमी हिमालय में तापमान सबसे तेजी से बढ़ रहा है।

विभागाध्यक्ष डॉ. अखौरी प्रमोद कृष्णा और प्रमुख शोधार्थी प्रोत्यूषा मुखोपाध्याय द्वारा किए गए इस अध्ययन में 1901 से 2020 तक (120 वर्षों) के तापमान आंकड़ों तथा 8 वैश्विक जलवायु मॉडलों का विश्लेषण किया गया है। 
 
शोध के अनुसार, तापमान और बर्फ पिघलने की स्थिति के आधार पर पूरा हिमालयी क्षेत्र बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहा है।
 

1. पश्चिमी हिमालय सबसे अधिक गर्म और संवेदनशील

लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश वाले पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में सर्दियों और बसंत दोनों मौसमों में गर्मी बढ़ने की दर सर्वाधिक दर्ज की गई है।

    सर्दियों में तापमान वृद्धि (1900-2014):

  •         पश्चिमी हिमालय: +1.06°C
  •         मध्य हिमालय: +0.96°C
  •         पूर्वी हिमालय: +1.09°C

 

  •     बसंत ऋतु में वृद्धि: पश्चिमी हिमालय में तापमान 1.08°C बढ़ा, जबकि मध्य और पूर्वी हिस्सों में यह बढ़ोतरी 0.83°C रही।
  •     भविष्य का अनुमान (2081-2100): यदि कार्बन उत्सर्जन इसी रफ्तार से जारी रहा, तो सदी के अंत तक पश्चिमी हिमालय में सर्दियों का तापमान 7.18°C तथा बसंत में 6.91°C तक बढ़ सकता है। मध्य और पूर्वी हिमालय में भी क्रमशः6.71°C और 5.82°C की भारी वृद्धि का अनुमान है।


2. दिन के मुकाबले रातें हो रही हैं अधिक गर्म

अध्ययन में पाया गया है कि पश्चिमी और मध्य हिमालय में दिन के अधिकतम तापमान की तुलना में रात का न्यूनतम तापमान तेजी से बढ़ रहा है:

  •     पश्चिमी हिमालय (सर्दियां): रात का तापमान 1.23°C बढ़ा, जबकि दिन का 0.87°C।
  •     पश्चिमी हिमालय (बसंत): रात का तापमान 1.25°C और दिन का 0.91°C बढ़ा।
  •     मध्य हिमालय (सर्दियां): रात का तापमान 1.20°C और दिन का 0.72°C बढ़ा।
  •     पूर्वी हिमालय (सर्दियां): दिन का तापमान 1.19°C और रात का 0.99°C बढ़ा।
प्रभाव: रातें गर्म होने से बर्फ जमने का समय घट रहा है, जिससे बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया तेज हो रही है और नदियों के जल प्रवाह का प्राकृतिक समय बदल रहा है।
 

3. बसंत में बर्फ को भारी नुकसान

तीनों हिस्सों में सर्दियों की तुलना में बसंत ऋतु में बर्फ का पिघलना तेजी से बढ़ा है, जिसमें पश्चिमी क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हुआ है: 
  • हिमालयी क्षेत्र        न्यूनतम उत्सर्जन स्थिति (सदी के अंत तक)    उच्च उत्सर्जन स्थिति (सदी के अंत तक)
  • पश्चिमी हिमालय    32.0 किग्रा/वर्ग मीटर नुकसान                  95.9 किग्रा/वर्ग मीटर नुकसान
  • मध्य हिमालय       17.0 किग्रा/वर्ग मीटर नुकसान                  34.9 किग्रा/वर्ग मीटर नुकसान
  • पूर्वी हिमालय        5.5 किग्रा/वर्ग मीटर नुकसान                   11.1 किग्रा/वर्ग मीटर नुकसान
 
सर्दियों के दौरान उच्च उत्सर्जन की स्थिति में पश्चिमी हिमालय में बर्फ का नुकसान सदी के अंत तक 53.2 किग्रा/वर्ग मीटर तक पहुंचने की आशंका व्यक्त की गई है।
 

4. आपदाओं और GLOF का बढ़ा खतरा

  •     ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF): यद्यपि पूर्वी हिमालय में तापमान वृद्धि की दर तुलनात्मक रूप से कम है, फिर भी यह क्षेत्र ग्लेशियल झीलों के फटने से आने वाली तबाही (GLOF) के लिए हॉटस्पॉट बन गया है। पीछे हटते ग्लेशियर नई झीलों का निर्माण कर रहे हैं, जिससे यह खतरा अब पश्चिम की ओर भी फैल रहा है।
  •     प्राकृतिक आपदाएं: तापमान और वर्षा पैटर्न में बदलाव से उत्तराखंड और सिक्किम जैसे क्षेत्रों में बादल फटने, भूस्खलन और हिमस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं।
  •     1.5 अरब आबादी पर असर: संपूर्ण हिमालय में 15,000 से अधिक ग्लेशियर मौजूद हैं, जो सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियों के मुख्य स्रोत हैं। इन पर लगभग 1.5 अरब लोगों की आजीविका और जीवन निर्भर है।


5. शोधकर्ताओं के मुख्य सुझाव

    एकीकृत निगरानी नेटवर्क: जमीनी जांच नेटवर्क, सैटेलाइट डेटा और हाई-रिज़ॉल्यूशन मॉडलिंग को आपस में जोड़कर बर्फ और ग्लेशियरों की रीयल-टाइम मॉनिटरिंग की जाए।
  •     पूर्व चेतावनी प्रणाली: पर्वतीय क्षेत्रों में मजबूत अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS) स्थापित किए जाएं।
  •     सतत जल प्रबंधन व सीमापार सहयोग: स्थानीय समुदायों में जलवायु-सहनशीलता बढ़ाने के साथ-साथ पड़ोसी देशों के साथ वैज्ञानिक और तकनीकी डेटा साझा किया जाए।
  •     व्यापक धरातलीय माप: नदियों तक पहुंचने वाले वास्तविक जल प्रवाह के सटीक आंकलन के लिए निरंतर धरातलीय मापन आवश्यक है।