रांची, राज्‍य ब्‍यूरो।  झारखंड की औद्योगिक नगरी जमशेदपुर में 15 नवंबर से देशभर के आदिवासियों का जुटान होगा। टाटा स्टील के सालाना आयोजन 'संवाद' के तहत होने वाले इस विमर्श में इस बार का विषय है-सामाजिक बदलाव के लिए आओ एक साथ। टाटा स्टील के चीफ (सीएसआर) सौरभ राय के मुताबिक 19 नवंबर तक होने वाले इस आयोजन में देशभर से लगभग 1500 आदिवासी समुदाय के लोग इकट्ठा होकर सामाजिक बदलाव के विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा करेंगे।

इसमें आदिवासी तबके के बुद्धिजीवी, कलाकार, उद्योगपति आदि शुमार हैं। इस दौरान अलग-अलग समूह पैनल चर्चा के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम और हस्तशिल्प प्रदर्शनी का भी आयोजन करेंगे। प्रदर्शनी के आरंभ में भगवान बिरसा मुंडा का जन्मदिवस समारोहपूर्वक मनाया जाएगा। 'संवाद' जनजातीय समुदाय को एक साथ लाकर विभिन्न विषयों पर सार्थक मंथन का एक सशक्त मंच है।

इसमें एक छत के नीचे समुदाय की चुनौतियां और विकास के लिए नई सोच पर विमर्श होता है। इस दौरान जनजातीय समुदाय के विविध मसलों और मुद्दों को समझने की कोशिश की जाती है ताकि उसके अनुरूप काम हो सके। जनजातीय समुदाय की सक्सेस स्टोरी के माध्यम से भी संदेश देने की कोशिश की जाती है कि ताकि बेहतर होने की आस के साथ-साथ सकारात्मकता का प्रसार हो। 2015 से हुई थी शुरूआत टाटा स्टील के हेड अर्बन सर्विस जेरीन टोपनो के मुताबिक समुदाय की चिंता और उसके सकारात्मक विषयों पर विमर्श हीं संवाद का मुख्य लक्ष्य है।

2015 में इसकी शुरूआत की गई थी। देश के अलग-अलग प्रांतों में इसका आयोजन किया गया था। संवाद के पहले संस्करण का विषय जनजातीय भाषाओं पर केंद्रित था। 2016 में दूसरा आयोजन जनजातीय स्वास्थ्य पद्धति पर खासतौर से चर्चा हुई। पिछले वर्ष संवाद के चर्चा के केंद्र में जनजातीय युवा और भविष्य के नेतृत्वकर्ता रहा। अभी तक इसका आयोजन बडोदरा, मैसूर और शिलांग में हो चुका है।

गोपाल मैदान में बिखरेगी आदिवासी जनजीवन की छटा टाटा स्टील के हेड कारपोरेट कम्युनिकेशन सिद्धार्थ बोरतामुली के मुताबिक संवाद का आकर्षण जमशेदपुर के गोपाल मैदान में होने वाला सांस्कृतिक आयोजन होगा। इस दौरान विविध आदिवासी समुदाय के सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किए जाएंगे।

इसके अलावा खास आदिवासी खानपान से भी लोगों को रूबरू कराया जाएगा। इसके लिए खास तैयारी की जा रही है ताकि आदिवासी रसोई से दुनिया परिचित हो सके। उन्होंने यह भी बताया कि टाटा समूह के होटल ताज में भी आदिवासी रसोई परोसा जा चुका है। इसे प्रोत्साहित भी किया जा रहा है।