हजारीबाग, [विकास कुमार]। जो पहल सरकार को करनी चाहिए थी, वह काम हजारीबाग में एक नौजवान कर रहा है। मकसद लोगों के सामने हाथ फैलाने वाले लोगों के हाथों में हुनर देना है। उनमें आत्मविश्वास भरना है। जीवन के प्रति उनका नजरिया बदलना है, ताकि बाहरी आवरण बदलने के साथ-साथ उनका आंतरिक आवरण भी बदल सके। हम बात कर रहे हैं आर्ट ऑफ लिविंग से जुड़े योग प्रशिक्षिक 40 वर्षीय तारकेश्वर सोनी की। इन्होंने अपने तीन माह के प्रयास से ही बुढ़वा महादेव, पंचमंदिर समेत अन्य धार्मिक स्थलों के सामने बैठे लाचार बुजुर्ग, दिव्यांग और विक्षिप्त भिखारियों की वेशभूषा बदल दी है।

हालांकि, इसके पीछे उन्होंने उनके भोजन को जरिया बनाया। शर्त रख दी कि सुबह नहाकर साफ कपड़े पहनने वालों को भोजन मिलेगा। कपड़े, साबून, तेल आदि भी उन्होंने ही लोगों की मदद से उपलब्ध कराए। चुनौती थी कि उनमें स्वच्छ रहने का भाव उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाए और वह हुआ भी। अब करीब 50 भिखारियों को हर दिन तारकेश्वर सोनी अपनी टीम के साथ सुबह-सुबह भोजन करा रहे हैं।

सावन माह में की शुरुआत

तारकेश्वर सोनी ने बताया कि सावन में बुढ़वा महादेव मंदिर की सीढ़‍ियों से उतरते वक्त मेरी दृष्टि उस दृश्य से उलझ गईं, जहां लोग भिखारियों को दान दे रहे थे। यह दृश्य इसलिए विचलित करने वाला था, क्योंकि दान देने के भाव के साथ उनमें अस्पृश्यता का भाव था। वजह थी भिक्षुकों की गंदगी। इन्हें बदलने के लिए मैंने लोभ और प्रेम का सहारा लिया। सुबह का बढ़‍िया नाश्ता की व्यवस्था मैंने कुछ दिनों के लिए शुरू की। सप्ताह भर के बाद से ही मेरे साथ एक-एक करके कई लोग जुड़ते चले गए। यह भोजन मेरे और भिक्षुकों के बीच की कड़ी बन गई है।

फूल और दातून बेचने के रोजगार से जोड़ना भी मकसद

ताकेश्वर सोनी इन भिक्षुकों के आंतरिक आवरण को भी बदलना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि वेशभूषा बदलने वाले भिखारी को श्रम से जोड़ें। उन्हें फूल और दातून बेचने वाले रोजगार से जोड़ने के लिए प्रयासरत हैं। उनके श्रम को सम्मान मिले और भीख मांग कर गुजारा करने वाले जीवन से बाहर आ जाएं।

Edited By: Sujeet Kumar Suman