कोडरमा, अनूप कुमार। तू ही ख्वाहिश, तू ही खतरा..., जवानी जानेमन, हसीन ए दिलरूबा...। रात के सर्द माहौल में गर्मी लानेवाली ऐसे ही गीतों की धुन पर मद्धिम रोशनी व पारदर्शी लिबास में थिरकती बार डांसर। उसके साथ झूमते शहर के शरीफजादों की टोली। इसमें व्यवसायी हैं, वार्ड पार्षद हैं और तथाकथित समाजसेवी भी। एक लोकल बॉडी के तोंदू उपाध्यक्ष तो बांहों में बाहें डाल नोटों को ताश के पत्तों की तरह इस थिरकते रूप मल्लिका पर तेजी से उड़ाते दिखते हैं। उपाध्यक्ष जी जुए के पुराने चैंपियन हैं। कुछ दिन पहले ही कप्तान की कृपा से इस मंडली के कुल 11 जुआरियों को दो दिन हवालात में गुजारने पड़े थे। जिले की सीमा से सटे एक रेस्ट हाउस में तैयार की गई यह वीडियो अब धीरे-धीरे सरेआम हो रही है। पहले यह सब जिले की सीमा में होता था, कुछ वर्दीवाले भी महफिल का हिस्सा होते थे। अब कप्तान का खौफ है कि ऐसी महफिल सीमा से बाहर सज रही है।

नेताजी का त्रिलोक कनेक्शन

नेताजी का राजनीतिक सितारा इन दिनों गर्दिश में चल रहा है। लेकिन आर्थिक मामला ठीकठाक है। रोड और पुल-पुलिया बनाने का जिम्मा अब इंजीनियर बेटे को दे चुके हैं। खुद स्प्रिट वालों के संरक्षक बने हैं। नेताजी का एक प्यादा त्रिलोकी पड़ोसी राज्य की पुलिस की हत्थे चढ़ा तो इस त्रिलोकी का नेताजी से कनेक्शन खोजा जा रहा है। नेताजी की राजनीतिक जमीन दो जिलों में आधे-आधे बंटा है। एकबार बाजी मारने में कामयाब हुए थे। लेकिन अगले ही बाद पांव तले से जमीन खिसक गई। वैसे राजनीतिक जमीन भले ही खिसक गई, लेकिन नेताजी दुकान और मकान मजबूत कर लिए हैं। नेताजी अपने सिद्धांत पर अडिग रहते हैं। धन आना चाहिए। चाहे माध्यम कोई भी हो। यदि संरक्षण देने से ही हिस्सेदारी मिल जाती हो तो क्या दिक्कत। चाहे वह धंधा स्प्रिट का हो या शराब का।

यहां पहले काम, बाद में नाम

इमारत बनाने महकमे में पहले काम हो जाता है, फिर ठेकेदार के नाम काम एलॉट होता है। टेंडर-वेंडर की खानापूर्ति साहब के टेबल पर हो जाती है। पसंदीदा वेंडर हो तो तीन का तेरह करने में भी कोई गुरेज नहीं। मुनाफा का रेशियो फिप्टी-फिप्टी का। रिपेयरिंग का कार्य ज्यादा भाता है। इसमें तीन का तेरह आसान भी होता है। साहेबान को भी ऐसे कामों में ज्यादा रूचि होती है। वैसे विभाग के ठेकेदार केवल बाबा के यहां जाने से घबराते हैं। यहां कमाने के कोई गुंजाइश नहीं। बाबा के आंगन में कमाना तो दूर, कुछ लगाकर ही आना होगा। बाबा भी अपने लिए कुछ नहीं करते। जो करते हैं उससे आंगन की ही खूबसूरती बढ़ती है। यहां कोई दायां-बायां करने भी कोई गुंजाइश नहीं, क्योंकि बिना बाबा के आदेश से भुगतान का कोई चांस नहीं।

मंद है लालटेन की लौ

लालटेन की लौ पिछले दो वर्षों से मंद पड़ी है। बिना तेल का लालटेन कितना जले। सूबे की सरकार में भागीदारी है, लेकिन विभाग ऐसा जिससे किसी को नहीं पड़ता वास्ता। बीच-बीच में बिहार से भैया लालटेन में तेल डाल जाते हैं तो लालटेन कुछ दिनों के लिए भभकता है, फिर रोशनी मंद पड़ जाती है। वैसे सबको पता है कि लालटेन की लौ को बस बचाकर रखना है, चुनाव के वक्त तेल डाल दीजिए लगेगा जलने। इधर, हाथ वालों के लिए हर मर्ज की एक ही दवा है बादल। वैसे तो बादल का संबंध वर्षा और खेती बारी से है, लेकिन हाथवाले माइनिंग से लेकर पुलिस, जंगल, रोड-नाली तक का मामला लेकर यहीं पहुंच जाते हैं। इन्हें भरोसा भी है कि यही एक दरबार है जहां बात सूनी भी जाती है साथ में फोटो भी खिंचवाई जाती है। अन्यथा बाकी जगहों में तो प्रवेश भी निषेध है।

Edited By: Madhukar Kumar