ट्रेनों की लेटलतीफी से यात्री बेहाल: SER की पंक्चुअलिटी 54 प्रतिशत पर, देश में 17वां स्थान; रांची मंडल तुलनात्मक रूप से बेहतर
आरटीआई के खुलासे के अनुसार, दक्षिण पूर्व रेलवे (एसईआर) की ट्रेनों की समयबद्धता पिछले दस सालों में 90.72% से गिरकर ...और पढ़ें

दक्षिण पूर्व रेलवे की ट्रेनों की समयबद्धता में भारी गिरावट, यात्री परेशान।
HighLights
आरटीआई से खुलासा: एसईआर की पंक्चुअलिटी 54.18% पर पहुंची।
दस साल में 90.72% से गिरकर 54.18% हुई समयबद्धता।
यात्री लेटलतीफी से बेहाल, कनेक्टिंग ट्रेनें छूटने की समस्या।
शक्ति सिंह, जागरण, रांची। ट्रेन पकड़ने के लिए समय से स्टेशन पहुंचने वाले यात्रियों को अब अक्सर अपनी ट्रेन का इंतजार करना पड़ रहा है। कहीं ट्रेन घंटों देर से पहुंच रही है तो कहीं देरी के कारण यात्रियों की आगे की कनेक्टिंग ट्रेन छूट जा रही है। रेलवे बोर्ड स्तर पर ट्रेनों की समयबद्धता सुधारने के लिए लगातार समीक्षा और निर्देश दिए जाने के बावजूद दक्षिण पूर्व रेलवे (एसईआर) में ट्रेनों की पंक्चुअलिटी लगातार नीचे जा रही है।
सूचना का अधिकार (आरटीआई) से मिले रेलवे बोर्ड के आधिकारिक आंकड़ों में इसका खुलासा हुआ है। वर्ष 2026-27 में अगस्त तक एसईआर की पंक्चुअलिटी महज 54.18 प्रतिशत रह गई है।
चार मंडलों में रांची की स्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर
दक्षिण पूर्व रेलवे के अंतर्गत रांची, चक्रधरपुर, खड़गपुर और आद्रा रेल मंडल आते हैं। जोन की कुल पंक्चुअलिटी में गिरावट के बावजूद उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार रांची रेल मंडल का प्रदर्शन इन तीन अन्य मंडलों की तुलना में तुलनात्मक रूप से बेहतर बना हुआ है।
दस साल में 90 से 54 प्रतिशत पर पहुंची पंक्चुअलिटी
झारखंड रेल यूजर्स की ओर से मांगी गई आरटीआई के जवाब में रेलवे बोर्ड के कोचिंग निदेशालय ने देश के सभी 18 रेलवे जोनों की पिछले 10 वर्षों की पंक्चुअलिटी का आंकड़ा उपलब्ध कराया है। इसमें दक्षिण पूर्व रेलवे की समयबद्धता में लगातार गिरावट दिखाई देती है।
वर्ष 2017-18 में एसईआर की पंक्चुअलिटी 90.72 प्रतिशत थी। कोविड काल के वर्ष 2020-21 में यह 95.55 प्रतिशत तक पहुंची। इसके बाद इसमें लगातार गिरावट दर्ज हुई। वर्ष 2022-23 में यह 86.35 प्रतिशत, 2023-24 में 72.08 प्रतिशत, 2024-25 में 61.97 प्रतिशत और 2025-26 में 56.26 प्रतिशत रही।
वर्ष 2026-27 में अगस्त तक यह और गिरकर 54.18 प्रतिशत रह गई। वर्ष 2026-27 (अगस्त तक) में पंक्चुअलिटी (समयबद्धता) के मामले में पूरे देश के 18 रेलवे जोनों में दक्षिण पूर्व रेलवे (एसईआर) 17वें स्थान पर है। उत्तर पश्चिमी रेलवे (एनडब्ल्यूआर) 94.80 प्रतिशत के साथ पहले स्थान पर और पश्चिम रेलवे (डब्ल्यूआर) 94.10 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर है।
यात्रियों पर सीधे पड़ रहा लेटलतीफी का असर
ट्रेनों की देरी का असर केवल स्टेशन पर बढ़ते इंतजार तक सीमित नहीं है। लंबी दूरी की यात्रा करने वाले यात्रियों की आगे की यात्रा भी प्रभावित हो रही है। ट्रेन देर से पहुंचने के कारण यात्रियों की कनेक्टिंग ट्रेन छूट रही है। कई यात्रियों को फ्लाइट या दूसरी परिवहन सेवा पकड़ने में भी परेशानी होती है।
सबसे अधिक परेशानी बुजुर्ग, बच्चे और मरीजों को होती है। उन्हें स्टेशन पर लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है। यात्रा की पहले से बनाई गई पूरी समय-सारिणी बिगड़ जाती है। खासकर रात या तड़के पहुंचने वाली ट्रेनों की देरी से यात्रियों की परेशानी और बढ़ जाती है।
चक्रधरपुर और खड़गपुर जैसे मंडलों में भारी माल ढुलाई का दबाव है। पटरियों पर अधिक ट्रैफिक और मेंटेनेंस ब्लाक के कारण यात्री ट्रेनों के परिचालन पर असर पड़ता है। इससे ट्रेनों के समय पर चलने की व्यवस्था प्रभावित होती है।
देश के जोनों में भी बड़ा अंतर
आरटीआई से मिले आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2026-27 में अगस्त तक रेलवे जोनों की पंक्चुअलिटी में काफी अंतर है। उत्तर पश्चिमी रेलवे 94.80 प्रतिशत और पश्चिम रेलवे 94.10 प्रतिशत पंक्चुअलिटी के साथ ऊंचे स्तर पर हैं। दक्षिण रेलवे की पंक्चुअलिटी भी 90.42 प्रतिशत रही। वहीं, ईस्ट कोस्ट रेलवे 43.40 प्रतिशत के साथ सबसे नीचे रहा।
दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे की पंक्चुअलिटी 54.38 प्रतिशत और दक्षिण पूर्व रेलवे की 54.18 प्रतिशत रही। इससे अलग-अलग जोनों में ट्रेनों की समयबद्धता के बीच बड़ा अंतर सामने आता है।
रेलवे बोर्ड की ओर से ट्रेनों के समय पर परिचालन को लेकर जोनल स्तर पर समीक्षा की जाती है और सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए जाते हैं। इसके बावजूद एसईआर की पंक्चुअलिटी का लगातार नीचे जाना सवाल खड़ा करता है।
रेलवे में आधारभूत संरचना के विकास, ट्रैक मेंटेनेंस और इंफ्रास्ट्रक्चर ब्लाक के कारण ट्रेनों के परिचालन में बदलाव होता है। लेकिन यात्रियों के लिए अंतिम परिणाम ट्रेन के समय पर पहुंचने से जुड़ा है।
