रांची रांची, {संजय कुमार} । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज अपना 96 वां स्थापना दिवस एवं विजयादशमी उत्सव मना रहा है। इस अवसर पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि देश में जिस गति से जनसंख्या बढ़ रही है वह कई समस्याओं को जन्म दे सकती है। उस पर ठीक से विचार होना चाहिए। जो नीति बने वह, सबों पर लागू हो। उन्होंने वर्ष 2015 में रांची में अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक की चर्चा करते हुए कहा कि संघ ने उस बैठक में प्रस्ताव पारित किया था कि जनसंख्या वृद्धि दर में असंतुलन देश के लिए चुनौती बनती जा रही है। उस बैठक में 2011 की जनगणना की चर्चा करते हुए कहा गया था कि जिस गति से विविध संप्रदायों की जनसंख्या के अनुपात में परिवर्तन सामने आया है उसे देखते हुए जनसंख्या नीति पर पुनर्विचार की आवश्यकता प्रतीत होती है।

विविध संप्रदायों की जनसंख्या वृद्धि दर में भारी अंतर, विदेशी घुसपैठ व मतांतरण के कारण देश की समग्र जनसंख्या विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों की जनसंख्या के अनुपात में बढ़ रहा असंतुलन देश की एकता, अखंडता व सांस्कृतिक पहचान के लिए गंभीर संकट का कारण बन सकता है । संघ प्रमुख ने कहा कि बैठक में बात सामने आई थी कि विश्व में भारत उन अग्रणी देशों में से था जिसने 1952 में ही जनसंख्या नियंत्रण के उपायों की घोषणा की थी परंतु 2000 में जाकर समग्र जनसंख्या नीति का निर्माण और जनसंख्या आयोग का गठन हो सका था ।

संघ प्रमुख ने कहा कि देश के सीमावर्ती प्रदेशों यथा असम, पश्चिम बंगाल व बिहार के सीमावर्ती जिलों में तो मुस्लिम जनसंख्या की वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है, जो स्पष्ट रुप से बांग्लादेश से अनवरत घुसपैठ का संकेत देता है।

इसलिए देश में उपलब्ध संसाधनों, भविष्य की आवश्यकताओं एवं जनसांख्यिकीय असंतुलन की समस्या को ध्यान में रखते हुए देश की जनसंख्या नीति का पुनर्निरधारण कर उसे सब पर समान रूप से लागू किया जाए। सीमा पार से हो रही अवैध घुसपैठ पर पूर्ण रुप से अंकुश लगाया जाए। राष्ट्रीय नागरिक पंजिका (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन ) का निर्माण कार्य घुसपैठियों को नागरिकता के अधिकारों से तथा भूमि खरीदने से वंचित किया जाए। संघ प्रमुख ने कहा कि देश में असंतुलित जनसंख्या वृद्धि के कारण स्थानीय हिंदू समाज पर पलायन करने का दबाव बनने की व अपराध बढ़ने की घटनाएं सामने आई हैं। एक से अधिक घंटे के अपने संबोधन में संघ प्रमुख ने तालिबान, सीमा की सुरक्षा, सामाजिक स्थिति, जाति व्यवस्था, कोरोना संक्रमण, राम मंदिर, देश की आजादी में लोगों का योगदान, सरकारों के अधिन मंदिर आदि विषयों पर अपनी बात रखी। इस बार भी पथसंचलन नहीं निकाला गया।

तालिबान से सुरक्षा के उपाय करनी चाहिए

संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में तालिबान की चर्चा करते हुए कहा कि यह परिस्थिति अप्रत्याशित तो नहीं, किंतु अनुमान से पहले आ कर खड़ी हुई है। अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनना उनका अपना पूर्व चरित्र है। कभी वह कहता है कि संबंध बना करके रखेंगे तो कभी कश्मीर की चर्चा करता है। इसलिए हमें उनसे सतर्क रहने की जरूरत है। उनसे सुरक्षा के उपाय करने चाहिए। जिस समय तालिबान सरकार स्थापित हो रही थी, उस समय चीन-पाकिस्तान तुर्किस्तान रूस ने समर्थन किया था। उनसे सुरक्षा के लिए अपनी सीमा को हमें मजबूत करना होगा। पूर्ण सजगता रखनी होगी। सुरक्षा में स्वर निर्भरता बढ़ानी होगी।

अपने संबोधन की शुरुआत उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से की। कहा, यह वर्ष हमारी स्वाधीनता का 75वां वर्ष है। 15 अगस्त 1947 को स्वाधीन हुए। परंतु सभी जानते हैं कि यह स्वतंत्रता रातों-रात हमें नहीं मिली। स्वाधीनता प्राप्ति के लिए आंदोलन में देश के सभी क्षेत्रों में सभी जाति वर्ग से निकले वीरों ने भाग लिया। समाज भी उनके साथ खड़ा रहा। तब जाकर के हमें स्वाधीनता मिली । परंतु कुछ लोगों की मानसिकता, स्वधर्म, स्वतंत्रता की समझ का अज्ञान, ढुलमूल नीति तथा अंग्रेजों की कूटनीति के कारण भारत को विभाजन की वेदना झेलनी पड़ी। प्रत्येक भारतवासी के हृदय में यह पीड़ा आज भी है ।

हमारे संपूर्ण समाज को खासकर अपनी नई पीढ़ी को इतिहास जानना, समझना एवं स्मरण रखना चाहिए। खोई हुई अखंडता और एकात्मता फिर से प्राप्त कर सके इसके लिए स्मरण कराना जरूरी है। मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि जातिगत विषमता की समस्या हमारे देश की पुरानी समस्या है। इसको ठीक करने के लिए अनेक प्रयास हुए फिर भी यह समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। समाज का मन अभी भी जातिगत विषमता की भावनाओं से जर्जर है। देश के बौद्धिक वातावरण में इस खाई को पाटकर परस्पर आत्मीय और संवाद को बनाने वाले स्वर कम है, बिगाड़ करने वाले अधिक।

हमें संवाद स्थापित कर इस विषमता को दूर करने का प्रयास करना होगा। इसके लिए हमें मेल जोल बढ़ाना होगा । सामाजिक दूरियां कम करनी होगी । सामाजिक समरसता मंच के माध्यम से संघ काम कर रहा है। भेद रहित समता मूलक समाज की हमें स्थापना करनी होगी। भारत की एकता और अखंडता के प्रति श्रद्धा को बनाए रखने की प्रेरणा तो वर्षों से यहां के लोगों में है। उसके लिए समय-समय पर लोगों ने खून पसीना भी बहाया है। इस वर्ष गुरु तेग बहादुर जी महाराज के प्रकाश का 400वां वर्ष है। उनका बलिदान भी भारत में पंथ संप्रदाय की कट्टरता के कारण चले हुए अत्याचारों को समाप्त करने के लिए ही हुआ था।

भारत की प्रगति से कुछ लोगों को होता है जलन

संघ प्रमुख ने कहा कि देश के स्वतंत्रता के बाद की स्थिति पर हम जब ध्यान देते हैं तो पाते हैं कि स्वाधीनता से स्वतंत्रता तक हमारी यात्रा अभी भी जारी है, पूरी नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि विश्व में ऐसे कुछ तत्व हैं जो भारत की प्रगति तथा विश्व में सम्मानित स्थान पर पहुंचने पर उनको कष्ट हो रहा है। ऐसे लोग भारत को आगे बढ़ना नहीं देखना चाहते हैं । उन्होंने कहा कि भारत में सनातन मानवता मूल्यों के आधार पर विश्व की धारना करने वाला धर्म प्रभावी होता है तो स्वार्थी तत्वों के कुत्सित खेल बंद हो जाएंगे। विश्व को उसका खोया हुआ संतुलन तत्व परस्पर मैत्री की भावना देने वाला धर्म का प्रभाव भारत को प्रभावी करता है ।

यह ना हो पाए, इसलिए भारत की जनता, भारत की वर्तमान स्थिति, भारत का इतिहास, भारत की संस्कृति, भारत में राष्ट्रीय नवोदय का आधार बन सकने वाली शक्तियां इन सब के विरुद्ध उचित प्रयास करते हुए विश्व को तथा भारत के जनों को भी भ्रमित करने का काम चल रहा है। संपूर्ण विनाश का भय इन शक्तियों की आंखों के सामने होने के कारण अपनी शक्तियों को सम्मिलित करते हुए विभिन्न रूप में प्रकट तथा प्रच्छन रूप से ध्यान में आने वाले स्थूल तथा ध्यान में न आने वाले सुक्ष्म प्रयास चल रहे हैं । उन सब के द्वारा निर्मित छल कपट तथा भ्रम जाल से सजगता पूर्वक स्वयं को तथा समाज को बचाना होगा। स्थिति ऐसी है कि हम आपस में ही लङ रहे हैं। राजनीति स्वार्थ के कारण सरकारें भी लड़ रही हैं। देश में नशा की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इसका पैसा देश विरोधी काम़ं में लग रहा है।

उन्होंने कहा कि अपने समाज में व्याप्त स्व के बारे में अज्ञान अस्पष्टता व श्रद्धा के साथ-साथ आजकल विश्व में बहुत गति से प्रचलित होती जा रही कुछ नई बातें इन स्वार्थी शक्तियों के कुत्सित खेलों के लिए सुविधाजनक बनी हुई है। वीटक्वाइन पर उन्होंने प्रहार करते हुए कहा कि इसके जैसा अनियंत्रित चलन प्रचलन आर्थिक स्वैराचार का माध्यम बनकर सभी देशों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक चुनौती बन सकता है । बालकों का मोबाइल फोन पर देखना नियम सा बन गया है। क्या देख रहा नहीं देख रहा, नहीं जानते।

विवेक बुद्धि तथा उचित नियंत्रण का अभाव भी नए वैध अवैध साधनों के संपर्क में समाज को किधर कहां ले जाएगा यह कहना कठिन है। परंतु देश के विरोधी तत्व इन साधनों का क्या उपयोग करना चाहते हैं यह सब जानते हैं इसलिए ऐसी सभी बातों पर समय रहते उचित नियंत्रण का प्रबंधन सरकार को करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन सब बातों पर नियंत्रण के लिए अपने घर में ही उचित -अनुचित, क्या करना और क्या नहीं करना है, परामर्श देने वाला संस्कारों का वातावरण बना सकते हैं । अनेक व्यक्ति, संगठन व संत महात्मा यह कार्य कर रहे हैं। संघ भी अपने कुटुंब प्रबोधन के माध्यम से यह कार्य कर रहा है। सप्ताह में बैठकें करते हैं।

उन्होंने कहा कि कह सकते हैं कि दुष्टों की टेढी बुद्धि अभी भी वैसी ही है और अपने दुष्कर्मो को नए नए साधनों के माध्यम से आगे बढ़ाने के प्रयास में लगे हैं। निहित स्वार्थों के चलने तथा अहंकारी और कट्टरपंथियों के चलते कुछ समर्थन जुटा लेना, लोगों की अज्ञानता का लाभ उठाकर उन्हें असत्य के आधार पर भ्रमित करना, उनकी वर्तमान अथवा काल्पनिक समस्याओं के आधार पर भड़काना, समाज में किसी प्रकार से वह किसी भी कीमत पर असंतोष. परस्पर विरोध, कलह और अराजकता उत्पन्न कर अपने ढलते प्रभाव को फिर समाज पर थोपने का उनका कुत्सित मंतव्य पहले उजागर हो चुका है।

कोरोना संक्रमण की तीसरी लहर की तैयारी चल रही

कोरोना संक्रमण की चर्चा करते हुए कहा कि दूसरी लहर में भी कई लोगों ने अपनी जान की परवाह किए बिना मदद की। दूसरी लहर में समाज ने फिर एक बार सामूहिक प्रयास किया। यह संकट का बादल पूरी तरह छंटा नहीं है । कोरोना वायरस से हमारा संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है।तीसरी लहर का सामना करने की हमारी तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है। अभी समाज भी सावधान है। संघ के स्वयंसेवकों के साथ साथ समाज के अनेक संगठनों ने तीसरी लहर में गांव स्तर तक लोगों की सहायता करने के लिए प्रशिक्षण देकर कार्यकर्ताओं का समूह तैयार कर लिया है। हमारी तैयारी पूरी है फिर भी सजग रहना है।

संघ प्रमुख ने कहा, पर्यावरण की रक्षा के लिए बहुत सारे संगठनों द्वारा काम चल रहा। संघ के स्वयंसेवक भी पानी बचाना, प्लास्टिक सुरक्षित रखना, पेङ लगाना इन बातों को लोगों में आदत डालने का प्रयास कर रहे हैं। सिंगल यूज प्लास्टिक को छोड़ना होगा।  सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि चिकित्सा ऐसी हो जो सस्ती हो, सुलभ हो, वह गांव में भी उपलब्ध हो सके।

अर्थव्यवस्था को पहले से अधिक गति देने की चुनौती है

भागवत ने कहा कि कोरोना के कारण देश को नुकसान हुआ। देश की आर्थिक स्थिति खराब हुई है। लेकिन उसको पूरा करते हुए अर्थतंत्र को पहले से भी अधिक गति देने एवं आगे बढ़ाने की चुनौती हम लोगों के सामने है। उसके लिए चिंतन तथा प्रयास भी चल रहे हैं। परंतु यह हमारे लिए अपने स्व पर आधारित तंत्र का चिंतन- मनन तथा रचना करने का अवसर ही बन सकता है । आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति की उन्होंने तारीफ करते हुए कहा कि कोरोना वायरस ने दिखा दिया कि हमारे स्व की परंपरा से आए हुए दृष्टि व ज्ञान आज भी उपयोगी है। आयुर्वेदिक औषधियों की कोरोना वायरस के उपचार में प्रभावी भूमिका रही। कहा, समाज में स्व का जागरण व आत्मविश्वास बढ रहा है। श्रीराम मंदिर के लिए धन संग्रह के समय यह दिखा जब सभी वर्ग के लोगों ने खुलकर समर्थन किया। हमारे खिलाड़ियों ने टोकियो में ओलिंपिक और पैरा ओलिंपिक में बेहतर प्रदर्शन किया।

हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर समाज को सौंपा जाना चाहिए

संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण की चर्चा करते हुए कहा कि कुछ मंदिर सरकारी नियंत्रण में है तो कुछ मंदिर समाज के नियंत्रण में। समाज के नियंत्रण में जो मंदिर हैं उनमें कई अच्छे से चल रहे हैं। सेवा का भी काम कर रहे हैं । सरकारी नियंत्रण में जो मंदिर हैं उनकी चल अचल संपत्ति का दूसरे को बेचे जाने की घटनाएं सामने आई हैं। इस पर रोक लगनी चाहिए । हिंदू मंदिरों की संपत्ति का विनियोग भगवान की पूजा तथा हिंदू समाज की सेवा तक कल्याण के लिए हो, यह भी उचित और आवश्यक है। इस विचार के साथ हिंदू समाज के मंदिरों का संयोग, व्यवस्थापन व संचालन करते हुए मंदिर फिर से समाजसेवी संस्कृति के केंद्र बने । हिंदू समाज को भी चिंता करनी होगी वह मंदिरों का संचालन कैसे करेंगे।

कश्मीर में धारा 370 हटने के बाद परिस्थितियां बदली हैं

कश्मीर की चर्चा करते हुए कहा कि धारा 370 हटने के बाद परिस्थितियां बदली हैं। परंतु वहां के लोगों में भी हम भारत माता के संतान हैं, यह भाव जगाना होगा। उनके मनोबल गिराने के जो प्रयास चल रहे हैं, इस पर ध्यान देना होग। संघ प्रमुख ने कहा कि सरकार अपना काम करती हैं लेकिन समाज की सहभागिता महत्वपूर्ण होती है । कई समस्याओं का निदान तो केवल समाज की पहल से ही संभव हो सकता है । इसलिए अपने प्राचीन काल से चलते आए सनातन राष्ट्र के अमर सत्य की जानकारी समझदारी पूरे समाज में ठीक से बननी चाहिए । भारत की सभी भाषा, पंथ, प्रांतीय विविधताओं की पूर्ण स्वीकृति सम्मान तथा विकास के संपूर्ण अवसर सहित एक राष्ट्रीयता के सनातन सूत्र में गूंथकर जोड़ने वाली हमारी संस्कृति है।

इसके अनुरूप हमें बनना चाहिए। अपने मत, पंथ, भाषा जाति आदि छोटी पहचानो में संकुचित न हो बाहर से आए हुए सभी संप्रदायों के मानने वाले भारतीयों सहित सभी को यह समझना होगा कि हमारी अध्यात्मिक मान्यताओं, पूजा की पद्धति की विशेषता के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार से हम एक सनातन राष्ट्र, एक समाज, एक संस्कृति में पले बढे समान पूर्वजों के वंशज हैं।

उस संस्कृति के कारण ही हम सब अपनी उपासना करने के लिए स्वतंत्र हैं। अपने मन से हर कोई यहां अपनी उपासना तय कर सकता है। यह सही है कि आक्रमणकारियों के साथ ही कुछ उपासनाएं भी भारत आईं, परंतु यह सत्य है कि आज भारत में उन उपासनाओं को मानने वालों का रिश्ता आक्रामकों से नहीं देश की रक्षा करने के लिए उनसे संघर्ष कृने वाले हिंदू पूर्वजों से है। उन्होंने हसन खा मेवाती , हकीम खान सूर, खुदाबख्श तथा गौस खान जैसे वीरों की और अशफाक उल्ला खान जैसे क्रांतिकारियों की चर्चा की। ये सभी देश के लिए अनुकरणीय हैं। उन्होंने कहा कि हमें अलगाव की मानसिकता से बाहर निकल कर के देखना होगा। हिंदू जब सशक्त, बलशाली और जागृत होगा तब सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा।

Edited By: Kanchan Singh