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'पता है गलती है, पर रोक नहीं पा रहे': परिवार से कट रहे किशोर, प्रभावित हो रही नींद; RINPAS के शोध में है समाधान

Published: Mon, 14 Sep 2026 08:00 AM (IST)Updated: Mon, 14 Sep 2026 10:13 AM (IST)

रिनपास के शोध में सामने आया है कि किशोरों में तकनीक की लत सामाजिक अलगाव, पारिवारिक संवाद में कमी और ...और पढ़ें

तकनीक की लत से जूझ रहे किशोरों में सामाजिक दूरी और नींद की समस्या।

तकनीक की लत से जूझ रहे किशोरों में सामाजिक दूरी और नींद की समस्या।

HighLights

  1. तकनीक की लत से किशोरों में सामाजिक अलगाव बढ़ रहा है।

  2. पारिवारिक बातचीत कम हुई और नींद भी प्रभावित हुई।

  3. उपचार से आत्मनियंत्रण और भावनात्मक संतुलन में सुधार आया।

अनुज तिवारी, जागरण, रांची। मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल तकनीक का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल किशोरों के लिए केवल समय की बर्बादी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर उनके सामाजिक संबंधों, पारिवारिक संवाद, नींद, पढ़ाई और भावनात्मक व्यवहार पर भी पड़ रहा है।

राजधानी स्थित रांची इंस्टीट्यूट आफ न्यूरो-साइकियाट्री एंड एलाइड साइंसेज (रिनपास) के क्लिनिकल साइकोलाजी विभाग से जुड़े शोध में तकनीक की लत से जूझ रहे किशोरों के मनो-सामाजिक प्रभाव और उपचार के बाद आए बदलावों का अध्ययन किया गया है।

शोध में पाया गया कि तकनीक का अत्यधिक इस्तेमाल किशोरों में सामाजिक दूरी बढ़ाने के साथ-साथ भावनाओं को नियंत्रित करने की क्षमता को भी प्रभावित करता है। यह शोध क्लिनिकल साइकोलाजी विभाग के प्रोफेसर डाॅ. अमूल रंजन सिंह और शोधार्थी देबालिना दास ने किया है, जिसमें यह तथ्य सामने आया है।

इनके शोध इंडियन जर्नल आफ साइकियाट्री में प्रकाशित हुआ है। शोध का शीर्षक किशोरों में प्रौद्योगिकी व्यसन (टेक्नोलाजी एडिक्शन) के मनोसामाजिक प्रभाव और उपचारात्मक परिवर्तन को समझना, एक गुणात्मक दृष्टिकोण है।

13 से 18 वर्ष के किशोरों पर हुआ अध्ययन

शोध के लिए 13 से 18 वर्ष की आयु के ऐसे किशोरों को चुना गया, जिनमें तकनीक के लगातार इस्तेमाल के कारण दैनिक जीवन के कामकाज पर महत्वपूर्ण असर पड़ रहा था। शोध में गुणात्मक अध्ययन पद्धति अपनाई गई। किशोरों से उपचार से पहले और उपचार के बाद अर्ध-संरचित साक्षात्कार किए गए।

बातचीत को रिकार्ड कर शब्दश लिखा गया और विषय आधारित विश्लेषण किया गया।किशोरों के लिए तैयार उपचार पद्धति में प्रेरणा बढ़ाने, भावनाओं को नियंत्रित करने, व्यवहार में बदलाव लाने, तकनीक के इस्तेमाल की इच्छा को नियंत्रित करने और नियमित दिनचर्या विकसित करने जैसी तकनीकों को शामिल किया गया।

शोध में किशोरों के लिए उनकी उम्र और जरूरत के अनुरूप उपचार पद्धति अपनाने पर जोर दिया गया। अध्ययन के दौरान सहमति और गोपनीयता से जुड़े मानकों का भी पालन किया गया।

तीन प्रमुख समस्याएं सामने आई

शोध के विश्लेषण में तीन प्रमुख विषय सामने आए। पहला था मनो-सामाजिक व्यवधान। प्रतिभागियों ने बताया कि अत्यधिक तकनीक इस्तेमाल के कारण उनमें सामाजिक अलगाव बढ़ा, परिवार के साथ बातचीत कम हुई और नींद प्रभावित हुई। इसके अलावा पढ़ाई में गिरावट और डिजिटल माध्यम से जुड़े बिना अपनी भावनाओं को संभालने में कठिनाई भी सामने आई।

दूसरी प्रमुख समस्या आंतरिक संघर्ष और असमंजस थी। किशोरों को यह एहसास था कि वे तकनीक का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद वे उसे नियंत्रित नहीं कर पा रहे थे।

इस स्थिति में अपराधबोध, निराशा और तकनीक पर निर्भरता जैसी भावनाएं देखने को मिलीं। यानी किशोर समस्या को समझ रहे थे, लेकिन उससे बाहर निकलने में खुद को असमर्थ पा रहे थे। तीसरा प्रमुख पक्ष उपचार के बाद आया सकारात्मक बदलाव था।

शोध में शामिल किशोरों ने धीरे-धीरे आत्मनियंत्रण और आत्म-जागरूकता में सुधार महसूस किया। तकनीक के इस्तेमाल की इच्छा को नियंत्रित करने, नियमित दिनचर्या बनाने और अपनी भावनाओं को व्यक्त करने जैसी तकनीकों से बदलाव में मदद मिली। चिकित्सक और किशोर के बीच सहयोगपूर्ण संबंध तथा मिलकर लक्ष्य निर्धारित करने से उपचार के प्रति उनकी रुचि और प्रेरणा भी बढ़ी।

केवल व्यवहार नहीं, भावनात्मक और पारिवारिक असर भी

शोधकर्ता डा. अमूल रंजन के अनुसार तकनीक की लत को केवल किसी व्यक्ति द्वारा मोबाइल या अन्य डिजिटल उपकरणों का ज्यादा इस्तेमाल करने की आदत के तौर पर नहीं देखा जा सकता। इसका असर भावनात्मक और सामाजिक संबंधों तक पहुंचता है।

अत्यधिक इस्तेमाल से किशोर वास्तविक सामाजिक संपर्क से दूर हो सकते हैं और अपनी भावनाओं को संभालने के लिए डिजिटल माध्यम पर अधिक निर्भर हो सकते हैं।

शोध में यह भी सामने आया कि उपचार तभी अधिक प्रभावी हो सकता है, जब किशोर को केवल तकनीक का इस्तेमाल कम करने के लिए नहीं कहा जाए, बल्कि उसके भावनात्मक संघर्ष, प्रेरणा, आत्मनियंत्रण और बदलाव के लिए उसकी तैयारी को भी समझा जाए।

किशोरों के अनुकूल उपचार से बदलाव संभव

शोधकर्ताओं ने पाया कि किशोरों के लिए बनाए गए अनुभव आधारित और उनकी उम्र के अनुकूल उपचार तरीकों से बदलाव की प्रक्रिया को मदद मिल सकती है। इसमें किशोर को अपनी समस्या समझने, खुद लक्ष्य तय करने और अपने व्यवहार पर नियंत्रण विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

शोध का निष्कर्ष है कि किशोरों में तकनीक की लत एक जटिल मनो-सामाजिक समस्या है, जिसे समझने के लिए केवल तकनीक के इस्तेमाल की अवधि देखना पर्याप्त नहीं है।

उपचार में किशोर की भावनात्मक जरूरतों को संबोधित करने, उसकी प्रेरणा बढ़ाने और आत्मनियंत्रण विकसित करने पर ध्यान देना जरूरी है। इससे व्यवहार में स्थायी और सकारात्मक बदलाव लाने में मदद मिल सकती है।

शोध में तकनीक की लत के ये असर सामने आए

  • सामाजिक अलगाव बढ़ना
  • परिवार के साथ बातचीत कम होना
  • नींद में व्यवधान
  • पढ़ाई में गिरावट
  • भावनाओं को नियंत्रित करने में परेशानी
  • तकनीक के अत्यधिक इस्तेमाल का एहसास होने के बावजूद उसे नियंत्रित न कर पाना
  • अपराधबोध और निराशा
  • तकनीक पर निर्भरता बढ़ना
  • उपचार के बाद आत्म-जागरूकता और आत्मनियंत्रण में सुधार
  • नियमित दिनचर्या विकसित करने में मदद
  • भावनाओं को बेहतर तरीके से व्यक्त करने की क्षमता बढ़ना
  • चिकित्सक और किशोर के सहयोग से उपचार के प्रति प्रेरणा बढ़ना