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अब गंभीर चोटों में नहीं काटना पड़ेगा अंग, RIMS रांची के डॉक्टरों ने 80000 में तैयार की स्वदेशी डिजिटल डिवाइस

By ANUJ TIWARIEdited By: Piyush Pandey
Published: Thu, 10 Sep 2026 06:18 PM (IST)

रिम्स के डॉक्टरों ने गंभीर चोटों में मांसपेशियों के भीतर दबाव मापने के लिए एक कम लागत वाली स्वदेशी डिजिटल डिवाइस विकसित की है।

डिजिटल डिवाइस और डॉ. अरुणव राय। (जागरण)

डिजिटल डिवाइस और डॉ. अरुणव राय। (जागरण)

HighLights

  1. रिम्स ने गंभीर चोटों के लिए स्वदेशी डिजिटल डिवाइस बनाई।

  2. यह उपकरण मांसपेशियों के भीतर दबाव सटीक मापेगा।

  3. पुरानी तकनीकों की तुलना में अधिक सटीक और किफायती।

अनुज तिवारी, रांची। सड़क दुर्घटना में पैर कुचल गया हो, भारी मलबे में हाथ दब गया हो या किसी गंभीर फ्रैक्चर के बाद मांसपेशियों के भीतर दबाव लगातार बढ़ रहा हो, ऐसे मामलों में डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है यह पता लगाना कि दबाव कितना बढ़ चुका है और मरीज को तत्काल ऑपरेशन की जरूरत है या नहीं।

इसी चुनौती से निपटने के लिए रिम्स के डॉक्टरों ने कम लागत में स्वदेशी डिजिटल डिवाइस तैयार की है। यह उपकरण मांसपेशियों के भीतर बनने वाले दबाव (कंपार्टमेंट प्रेशर) को मापने और उसकी निगरानी में सक्षम है।

दरअसल, गंभीर दुर्घटना या चोट के बाद मांसपेशियों से घिरे हिस्से में सूजन अथवा रक्तस्राव के कारण दबाव बढ़ने लगता है। इस स्थिति को एक्यूट कंपार्टमेंट सिंड्रोम कहा जाता है।

बढ़ा हुआ दबाव नसों और मांसपेशियों तक रक्त की आपूर्ति प्रभावित कर देता है। यदि छह से आठ घंटे के भीतर इसका सही आकलन कर उपचार नहीं किया जाए तो नसों और मांसपेशियों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है और गंभीर स्थिति में अंग तक काटना पड़ सकता है।

डिवाइस इसी महत्वपूर्ण चिकित्सकीय निर्णय में डॉक्टरों की मदद करेगी। खास बात यह है कि करीब 80 हजार रुपये की लागत में तैयार इस तकनीक को विकसित करने का पूरा खर्च शोधकर्ताओं ने स्वयं वहन किया है।

पुरानी तकनीक की जगह लेगी नई प्रणाली

वर्तमान में कंपार्टमेंट प्रेशर मापने के लिए कई दशक पुरानी तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें सुई और मैनुअल रीडिंग के माध्यम से दबाव मापा जाता है।

इस प्रक्रिया में कई बार सुई चुभानी पड़ती है और अलग-अलग व्यक्ति द्वारा रीडिंग लेने के कारण परिणामों में अंतर भी आता है।

Digital Device

डिजिटल डिवाइस।

नई डिजिटल प्रणाली इन कमियों को दूर करते हुए अधिक सटीक, वस्तुनिष्ठ और लगातार निगरानी की सुविधा देती है। शोधकर्ताओं के मुताबिक अगले चरण में इसे पूरी तरह डिजिटल बनाने पर काम चल रहा है, ताकि भविष्य में मरीज को सुई चुभोने की भी आवश्यकता न पड़े।

इसके लिए एसआरएम विश्वविद्यालय, चेन्नई, जर्मनी की एक विश्वविद्यालय तथा देश के अन्य शैक्षणिक संस्थानों के विशेषज्ञों से तकनीकी सहयोग लिया जा रहा है।

कुछ यूं हुई शोध यात्रा की शुरुआत

रिम्स के प्लास्टिक सर्जरी विभाग के वरिष्ठ रेजिडेंट डा. अरुणव राय के अनुसार तब वह एमएस (जनरल सर्जरी) कर रहे थे। इस दौरान गंभीर दुर्घटना के मरीजों की चिकित्सकीय प्रक्रिया के क्रम में उन्हें होने वाली पीड़ा ने उनकी टीम को काफी द्रवित किया।

खासकर छोटे बच्चों और किशोरों की परेशानी ने उन्हें इस दिशा में सोचने को विवश किया। इसके बाद डॉ. बिनय कुमार और डॉ. निशिथ एक्का के मार्गदर्शन और डॉ. साकेत वर्मा, डॉ. पंकज बोदरा व अन्य के सहयोग से इस स्वदेशी उपकरण के प्रारूप को विकसित करने में सफल हो पाया।

जनवरी 2025 में शुरू हुआ शोध

डॉ. अरुणव ने बताया कि सबसे बड़ी चुनौती एक चिकित्सकीय विचार को भरोसेमंद, व्यावहारिक और किफायती उपकरण में बदलना था। इसके लिए कई चरणों में परीक्षण और सुधार किए गए।

डिवाइस तैयार करने का काम जनवरी 2025 में शुरू हुआ और करीब एक वर्ष आठ महीने की मेहनत के बाद प्रोटोटाइप तैयार हुआ। शोधकर्ताओं के अनुसार सबसे पहले दूसरे राज्यों के अस्पतालों में काम कर रहे अपने परिचित डॉक्टरों से संपर्क किया गया और बाजार में उपलब्ध तकनीक की जानकारी जुटाई गई।

इसके बाद इंटरनेट के माध्यम से विभिन्न विकल्पों की तलाश शुरू हुई। कई राज्यों से प्रोटोटाइप मंगाकर उनका परीक्षण किया गया।

इसी प्रक्रिया में चेन्नई के सेंसर ने सबसे सटीक परिणाम दिए। इसके बाद शोध के लिए इसी सेंसर को चुना गया। उपकरण में इस्तेमाल होने वाली विशेष नीडल के लिए जर्मनी की तकनीक को चुना गया।

शोधकर्ताओं के अनुसार, जर्मनी में निर्मित नीडल की मोटाई कम और त्वचा के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल होने के कारण उसका चयन किया गया।

नियामकीय मंजूरी के बाद होगा क्लीनिकल ट्रायल

शोधकर्ताओं के अनुसार डिवाइस का रिसर्च प्रोटोकाल तैयार कर केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) को भेजा गया है।

नियामकीय मंजूरी मिलने के बाद संस्थागत आचार समिति (एथिक्स कमेटी) से अनुमति लेकर क्लीनिकल ट्रायल शुरू किया जाएगा।

रिम्स निदेशक डॉ. डीके सिन्हा के अनुसार यदि क्लीनिकल परीक्षण सफल रहते हैं तो कम लागत वाली यह मेड इन इंडिया तकनीक देशभर के सरकारी और निजी अस्पतालों में ट्रामा उपचार की दिशा बदलने वाली महत्वपूर्ण चिकित्सा उपलब्धि बन सकती है।

आवश्यक स्वीकृतियों और चिकित्सकीय परीक्षणों के बाद इसे बाजार में लाने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। हमारा लक्ष्य एक ऐसा स्वदेशी उपकरण बनाना है जो मौजूदा विकल्पों की तुलना में काफी किफायती हो।

कुछ यूं काम करता है उपकरण

यह उपकरण दबाव मापने के लिए ईएसपी 32 माइक्रोकंट्रोलर (सेंसर प्रोसेसर) का उपयोग करता है। एमपीएक्स 5010 डीपी नामक सेंसर प्रोसेसर दबाव को मापता है।

सेंसर को मरीज के शरीर से आइवी ट्यूबिंग द्वारा जोड़ा जाता है। ट्यूबिंग फैशियल कम्पार्टमेंट का दबाव सेंसर तक पहुंचाती है। ईएसपी 32 सेंसर से प्राप्त संकेत को दबाव के मान में बदलता है। इससे कम्पार्टमेंट के दबाव की सरल और निरंतर निगरानी की जा सकती है।

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