रांची, राज्‍य ब्‍यूरो। दो साल पहले महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रचे जाने के मामले की जांच कर रही राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) ने रांची के नामकुम स्थित बगीचा टोली में फादर स्टेन स्वामी से गुरुवार को करीब ढाई घंटे तक पूछताछ की। हालांकि खबर लिखे जाने तक पूछताछ का ब्योरा उपलब्ध नहीं हो सका है। शुक्रवार तक एनआइए इस संबंध में खुलासा कर सकता है।

फादर स्टेन स्वामी से भीमा कोरेगांव हिंसा के मामले में तीसरी बार पूछताछ हो रही है। पूर्व में दो बार महाराष्ट्र पुलिस उनके आवास पर धमक चुकी है। सबसे पहले 28 अगस्त 2018 को महाराष्ट्र पुलिस उनके आवास पर पहुंची थी। तह पुलिस ने उनके आवास से लैपटॉप, पेन ड्राइव, सीडी, मोबाइल सहित कई दस्तावेज जब्त किए गए थे। दूसरी बार भी महाराष्ट्र पुलिस ने ही पूछताछ की थी।

इस वर्ष जनवरी महीने में इस केस को एनआइए ने टेकओवर किया था। इस मामले में एनआइए की टीम ने पहली बार फादर स्टेन स्वामी से पूछताछ की है। खुद को मानवाधिकार कार्यकर्ता बताने वाले फादर स्टेन स्वामी पर आरोप है कि उनके और उनके साथियों के भड़काऊ भाषण के बाद ही 2018 में भीमा कोरेगांव में हिंसा भड़की थी।

रैली में तय हुई थी हिंसा की पटकथा, माओवादियों का था हाथ

एक जनवरी 2018 को पुणे के पास स्थित भीमा कोरेगांव में हिंसा भड़की थी। इससे एक दिन पहले वहां यलगार परिषद के बैनर तले एक रैली हुई थी और इसी रैली में हिंसा भड़काने की भूमिका बनाई गई थी। इस संगठन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रचने का आरोप भी लगा था। पुलिस ने इससे संबंधित साक्ष्य भी बरामद किया थे। साथ ही कई लोगों को गिरफ्तार भी किया गया था। दावा किया गया था है कि यलगार परिषद की रैली को 300 से ज्यादा संगठनों ने समर्थन दिया था।

इस रैली के बाद संसावाड़ी में हिंसा भड़क उठी थी। कुछ क्षेत्रों में पत्थरबाजी की घटना हुई। उपद्रव के दौरान एक नौजवान की जान भी गई थी। पुलिस का दावा है कि यलगार परिषद सिर्फ एक मुखौटा था और माओवादी इसे अपनी विचारधारा के प्रसार के लिए इस्तेमाल कर रहे थे।

इस घटना में पुणे पुलिस ने गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, वरवर राव, अरुण फरेरा और वरनॉन गोन्‍जाल्विस को गिरफ्तार कर लिया था। पुणे पुलिस ने अदालत में कहा था कि गिरफ्तार किए गए पांचों लोग प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) के सदस्य हैं और यलगार परिषद देश को अस्थिर करने की उनकी कोशिशों का एक हिस्सा था।

क्या है यलगार परिषद

भीमा कोरेगांव का लिंक ब्रिटिश हुकूमत से है। यह पेशवाओं के नेतृत्व वाले मराठा साम्राज्य और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुए युद्ध के लिए जाना जाता है। इस रण में मराठा सेना बुरी तरह से पराजित हुई थी। मराठा सेना का सामना ईस्ट इंडिया कंपनी के महार (दलित) रेजीमेंट से हुआ था। इसलिए इस जीत का श्रेय महार रेजीमेंट के सैनिकों को जाता है। तब से भीमा कोरेगांव को पेशवाओं पर महारों यानी दलितों की जीत का रण माना जाने लगा।

इसे एक स्मारक के तौर पर स्थापित किया गया और हर वर्ष दलित समुदाय के लोग यहां एक जनवरी को इस जीत का उत्सव मनाते हैं। एक जनवरी 2018 से एक दिन पहले 31 दिसंबर 2017 को इस युद्ध की 200वीं सालगिरह थी। 'भीमा कोरेगांव शौर्य दिन प्रेरणा अभियान' के बैनर तले कई संगठनों ने मिलकर एक रैली का आयोजन किया था। इसका नाम 'यलगार परिषद' रखा गया।

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