रांची, [संदीप कुमार]। Ranchi Hindpiri Coronavirus सात कोरोना पॉजिटिव मामले सामने आने के बाद राजधानी रांची का हिंदपीढ़ी इलाका चर्चा में है। इस मुस्लिम आबादी बहुल इलाका की  पहचान आजादी से पूर्व और उसके काफी बाद हिंदुओं के गढ़ के तौर पर थी। उससे भी कई सौ साल पूर्व यह मुंडाओं का इलाका था। जानकारों के अनुसार मुंडाओं ने ही इसका नाम रखा इंदि पीढ़ी। इंदि मतबल पर्व। पिड़ी मतलब मैदान। यही नाम बाद में बदलकर हिंदपीढ़ी हो गया। मुंडाओं के बाद, उरांव बसे फिर हिंदू, फिर मुस्लिम। पिछले चार पांच दशक में यह इलाका मुस्लिम बहुल हो गया। कुछ मौकों पर तनाव के बाद हिंदू परिवार यहां से पलायन कर गए। हिंदुओं ने औने-पौने भाव में घर बेचे। कभी दस में सात घर थे हिंदुओं के, आज अंगुलियों पर गिने जाते हैं मकान।

मुस्लिमों का सबसे सघन मुहल्‍ला

हिंदपीढ़ी। रांची का यह मुहल्ला इन दिनों हर किसी की जुबान पर है। तब्लीगी जमात से जुड़े 26 लोग यहां की एक मस्जिद से पकड़े गए, इनमें कई विदेशी थे। इन्हीं में से एक मलेशियाई महिला कोरोना पीडि़त मिली और झारखंड के माथे पर कोरोना के कलंक का पहला टीका लगा। कुछ दिनों बाद एक स्थानीय महिला भी कोरोना पीडि़त पाई गई। लॉकडाउन के बाद भी मुस्लिम बहुल इस मुहल्ले की गलियां वीरान नहीं हुई थीं। लेकिन दो कोरोना पीडि़तों की पुष्टि से हर दिल में समाए खौफ और प्रशासन की सख्ती ने असर दिखाया है। लोग दरवाजों के भीतर कैद हैं। आज यह मोहल्ला जरूर मुस्लिम आबादी बहुल है लेकिन पहले ऐसा नहीं था। मुस्लिमों के चुनिंदा घर के बीच यहां हिंदुओं की सघन आबादी थी। मुहल्‍ला  हिंदपीढ़ी कब बना इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है लेकिन आजादी के समय से ही नगर निगम आदि जगहों पर हिंदपीढ़ी मोहल्ले का उल्लेख अवश्य है।

उच्‍चारण की दुविधा ने बदला नाम

मुंडा समाज के एक जानकार का दावा है कि हिंदपीढ़ी के नाम से प्रचलित इलाका का असली नाम कई सौ साल पूर्व इंदि पिड़ी था। इंदि पर्व को कहते हैं। पिड़ी माने मैदान। यह इलाका मैदानी हुआ करता था। इसलिए इसे "इंदि पिड़ी" कहा जाता था। निश्चित तौर पर मुंडा यहां पर्व मनाते होंगे बड़े से मैदान में। यह मुंडा बहुल गांव था। गैर मुंडाओं को मुंडारी के सटीक उच्चारण की दुविधा ने इसे हिंदपीढ़ी नाम दे दिया।

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शहर के बीचोबीच है इलाका

एक ओर शहर की हृदयस्थली मेन रोड तो दूसरी ओर हरमू नदी। यह इस मोहल्ले की खूबसूरती है। बड़ा तालाब के पास बड़ी सी खाली जमीन हुआ करती थी जिसे लोग आदिवासी ग्राउंड कहते थे। लेकिन समय के झोंकों के साथ यह सब भर गया। कुछ लोगों ने आदिवासी महिलाओं से शादी कर जमीन अपने नाम कर ली तो कुछ पर जमीन माफिया का कब्जा हो गया।

सालता है दर्द

1992 में यहां से पलायन करने वाले विजेंद्र ठाकुर ने बताया कि वहां ऐसा माहौल हो गया था कि रहना संभव नहीं था इसलिए हमलोगों ने मोहल्ला छोडऩे का निर्णय लिया। अब तो बस यादें ही रह गई हैं। जब किसी गलत हरकत के कारण मुहल्ले का नाम अखबारों में पढ़ता हूं तो अफसोस होता है। इसी वर्ष मुहल्ला छोडऩे वाले एक परिवार ने कहा कि पहले खूब अपनापन था हमारे बीच। लेकिन फिर सब खत्म हो गया। त्योहारों पर जश्न मनाना और क्रिकेट में भारत की जीत पर पटाखा फोडऩा भी लोगों को खलने लगा।

भाईचारगी नहीं रही तो संपत्ति औने-पौन भाव में बेचकर निकल गया। मेरा पुराने मुहल्ले के लोगों पर कोरोना का खतरा मंडरा रहा है यह सोचकर तकलीफ होती है। उम्मीद करता हूं कि यहां जल्द हालात सुधर जाएंगे। यहां की आबादी को इस मामले की सबक लेने की जरूरत है ताकि आगे कभी वे मुश्किल में न पड़ें।

Posted By: Alok Shahi

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