रांची, [जागरण स्‍पेशल]। रांची के बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा में बंद 58 कैदी गुरुवार को रिहा कर दिए गए। झारखंड राज्य सजा पुनरीक्षण पर्षद की अनुशंसा पर सीएम की स्वीकृति के बाद ये कैदी रिहा किए गए। रिहा किए गए सभी कैदी हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा पाने वाले हैं जो कम से कम 14 साल की सजा पूरी कर चुके हैं। जेल से रिहा होते ही सभी कैदी अपनों से मिले। किसी का बेटा, किसी का भाई, किसी की पत्नी लेने पहुंची थी। अपनों से मिल सभी के आंसू छलक उठे थे। इनमें दो ऐसे कैदी भी रिहा हुए, जो अपना पता भूल चुके हैं। इनमें गुमला निवासी एतवा खडिय़ा और गढ़वा निवासी लखन भुईयां हैं। इन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे कहां जाएं। बाद में संबंधित जिले के अन्य कैदियों के साथ वाहन में बैठाकर भेजा गया। उनके जिले के अन्य कैदियों ने उन्हें घर छोडऩे की बात कह साथ ले गए। दोनों ने बताया कि वे 25 से 30 साल से वे जेल में थे। उनसे मिलने कोई जेल नहीं आता था।

 

बेटा दो माह का था, 22 साल के बाद पिता को लेने पहुंचा...

रिहा हुए कैदियों में एक ऐसा है, जो हत्या के केस में जेल गया तब दो माह के बेटे को छोड़ा था। कैदी खूंटी निवासी निताई मुंडा है। उसका बेटा घसिया मुंडा पिता को लेने पहुंचा था। 22 साल बाद वह पिता को छुड़ाने के लिए जेल पहुंचा था। बेटे को देख वह एकटक होकर देखता रहा। पिता और बेटा दोनों की आंखों में आंसू छलक उठे थे। 

जेल जाने पर पत्नी छोड़ गई

रिहा हुए कैदियों में एक कैदी की कहानी अजीब है। हत्या के मामले में जब वह जेल जा रहा था, तब शादी के एक साल हुए थे। जेल जाने के बाद पत्नी छोड़ गई। दूसरे के साथ शादी रचा ली। इसी तरह सभी की अलग-अलग कहानियां हैं। महेंद्र सिंह ने पत्नी की हत्या कर दी थी। 

जेल के भीतर मजदूरी कर बनवाया घर

गुमला निवासी कैदी किस्तो उरांव ने जेल के भीतर रहकर बड़ा काम किया है। जेल के भीतर मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवार को पैसे भेजता रहा। इससे पत्नी पैसे को बचाकर रहने लायक घर बना ली। घर वाले उनसे मिलने जब आते थे, तब जरूरत के पैसे ले जाया करते थे। जबकि अन्य कैदियों के परिजन पैसे देने के लिए जेल गेट पर पहुंचते हैं। जेल पहुंचकर उनकी जरूरतों के लिए पैसे लिया करते थे। 

ये कैदी हुए रिहा

  1. रांची के छोटे वर्मा, लखन महतो, दूती मुंडा, लेटे उरांव, मदन मोहन, लाल मुंडा, महेंद्र सिंह उर्फ सुकर सिंह, फुलेंद्र महतो, लालू महतो, तेजू कुमार, मुकेश नायक, राजू खोया, देबू महतो, जिउता मुंडा
  2. खूंटी निवासी सुकरा बरजो, चमरा मुंडा, जूरा मुंडा, निताई मुंडा, सामुएल आइंद, घासिया मुंडा, रिसा मुंडा
  3. गुमला निवासी एतवा खडिय़ा, ठुंगरू उरांव, बिरसाई खडिय़ा, बालेश्वर उरांव, चुइयूं उरांव उर्फ राजकेश्वर उरांव, जयराम भगत, आजाद अंसारी, किस्तो उरांव, मिनू उरांव, बिलिचिदान कुजूर, नुनू उर्फ नागेश्वर सिंह, लगन गोप, जोहन एक्का, नान्हू साहू, चंदर साहू, रतिया खडिय़ा।
  4. चाईबासा निवासी सिंहराय लागुरी, बोयो बारी।
  5. गढ़वा निवासी लखन भुईयां
  6. एवं पलामू निवासी रामरतन सिंह,
  7. लातेहार सीटन भुइयां,
  8. सरायकेला निवासी गुरुवा मुंडा, बुधराम सोरेन, मदन कैबर्त,
  9. सिमडेगा निवासी जेवियर किंडो, अब्राहम लकड़ा, जलसू रौतिया
  10. पूर्वी सिंहभूम निवासी सिंगराई हांसदा
  11. बिहार का सिवान जिला निवासी शाहनवाज अहमद। 

जेपी कारा से 26 बंदी किए गए रिहा, भर आई आंखें

राज्य सरकार और पुनरीक्षण बोर्ड के निदेश के आलोक में गुरुवार को हजारीबाग के जेपी कारा में बंद 26 बंदियों को रिहा कर दिया गया। ये बंदी आजीवन कारावास की सजा काट रहे थे और पिछले 17 सालों से जेल में बंद थे। रिहाई के दौरान जेपी कारा द्वारा बंदियों को फूल माला पहनाकर विदा किया गया। उनके परिजन जेपी कारा के बाहर उनके इंतजार मे खड़े थे। जेपी कारा से रिहा होते ही बंदियों की आखें भर आईं। वहीं, परिजनों से मिलते ही बंदी फफक कर रो पड़े। जेल प्रशासन की ओर से बंदियों को नवजीवन की बधाई दी और उन्हें किताब दिया गया। रिहा हुई बंदी हत्या जैसे गंभीर मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे थे।

बंदियों में हजारीबाग, बोकारो, धनबाद, नवादा, गिरिडीह, दूमका, जामताड़ा, गुमला के लोग शामिल थे। ज्ञात हो कि एक नवंबर 2019 को बोर्ड की बैठक में इन बंदियों की समीक्षा की गई थी। समीक्षा के उपरांत इन्हें छोडऩे का निदेश जारी किया गया था। इनमें राधा महली नागफेनी गुमला, विजय लाल वर्णवाल  कतरास धनबाद, बाबुलाल उर्फ  बाबुधन मुर्मू दूमका, चुनका बास्की बोरियो साहिबगंज, दासो मियां जामताड़ा, मुंशी महतो कोडरमा, महाबीर रजक काशीचक नवादा, गुड्डू पांडेय गोमिया बोकारो,  तेजो साव रसोईया धमना चौपारण, विश्वनाथ रवानी, धनबाद, नयन महतो बोकारो, लालमोहन महतो जरीडीह बोकारो, जीतलाल महतो बोकारो, होरिल पंडित गिरिडीह, बुधन पंडित गिरिडीह, वशिष्ठ साव बोकारो, सदीक मियां कटकमसांडी हजारीबाग, मोती राम बेसरा टुंडी धनबाद, मैनेजर करमाली मांडू, राजेंद्र यादव जमुआ गिरिडीह, रामचंद्र राय, धनवार, मो. इम्तियाज सदर हजारीबाग, बिरजू भुईंया  रामगढ़, बब्लू साव बोकारो शामिल हैं।

जेल प्रशासन ने फूल-माला पहनाकर श्याम, बुधन व किती को गेट के बाहर छोड़ा

आजीवन कारावास की सजा काट रहे चाईबासा मंडल कारागार के तीन बंदियों को गुरुवार को आजाद कर दिया गया। जेल प्रशासन ने किती बिरुवा, श्याम बिरुवा और बुधन केराई को जेल की कानूनी प्रक्रियाएं पूरी करने के बाद शाम चार बजे रिहा कर दिया। रिहाई की सूचना इनके परिवार वालों को पूर्व में ही दे दी गई थी। श्याम व बुधन को लेने के लिए उनका मित्र जगन्नाथ प्रधान और किती बिरुवा को लेने उसका भाई मुन्ना बिरुवा आया था। तीनों को जेलर बबलू गोप माला पहनाकर स्वयं बाहर तक छोडऩे आए। तीनों को यह कहा गया कि पहले जो जुर्म किया था, उसकी सजा मिल गई है। अब समाज में जाकर अच्छा काम करें। जेल में जो भी हुनर सीखा है उसे जीवन में आगे बढऩे के लिए उपयोग में लायें। जेलर बबलू गोप ने बताया कि तीनों जेल में बहुत अच्छी बागवानी करते थे। मेंटेनेंस के काम में भी तीनों निपूर्ण हैं। उम्मीद करते हैं अपने इस हुनर की बदौलत तीनों जीवन में अब आगे बढ़ेंगे।

चाईबासा के जेल अधीक्षक जितेंद्र कुमार ने बताया कि झारखंड राज्य पुनरीक्षण पर्षद की अनुशंसा पर मुख्यमंत्री ने आजीवन कारावास की सजा काट रहे राज्य के विभिन्न जेलों में बंद कुल 139 बंदियों को रिहा करने के लिए अपनी स्वीकृति दी थी। इनमें चाईबासा मंडलकारा के ये तीन बंदी भी शामिल थे। ऊपर से आदेश आने के बाद गुरुवार को चक्रधरपुर के श्याम केराई, बुधन केराई व मंझारी के किती बिरुवा को रिहा कर दिया गया है। मालूम हो कि उमक्रैद की सजा काट रहे कैदियों को चाईबासा जेल से संभवत: पहली बार समय पूर्व रिहा किया गया है। 

20 साल जेल में रहे बुधन, श्याम व किती

बुधन सिंह केराई और श्याम केराई 18 नवंबर 1999 से चाईबासा मंडल कारा में बंद थे। दोनों एक ही परिवार के सदस्य हैं। दोनों के खिलाफ चक्रधरपुर थाने में वर्ष 1999 में धारा 302, 149 व 148 के तहत मामला दर्ज हुआ था। 16 अक्टूबर 2003 को न्यायालय ने दोनों को दोषी पाते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। 20 साल तक जेल में रहने के बाद अब दोनों रिहा हुए हैं। मंझारी निवासी किती बिरुवा के खिलाफ वर्ष 2000 में मंझारी थाना में हत्या का मामला दर्ज हुआ था। 23 मई 2001 में किती चाईबासा मंडलकारा में भेजा गया था। 19 नवंबर 2003 को न्यायालय ने इसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

Posted By: Alok Shahi

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस