रांची, शक्ति सिंह। रेलवे का डब्ल्यूएजी -9 इंजन का हाइटेक होना ही उसकी कमजोरी बन रही है। बारिश और ठंड के मौसम में चढ़ान की स्थिति में रेल इंजन के पहियों की फिसलन रोकने के लिए यह तकनीक लाई गई थी। अब यह तकनीक ट्रेनों की रफ्तार में बाधक बनने लगी है। अपने साथ अन्य ट्रेनों की गति पर भी ये ट्रेनें असर डाल रही हैं।

पहिया स्लिप होने की स्थिति में ट्रेन की गति खुद-ब-खुद धीमी हो जाती है और चढ़ाई नहीं करने के कारण ट्रेन बीच सेक्शन में ही खड़ी हो जाती है। इस कारण सेक्शन जाम हो जाता है और आवागमन प्रभावित हो जाता है।

रांची रेल मंडल में ऐसे कई मामले देखने को मिले हैं। मंडल में ऐसे कई सेक्शन हैं, जहां अक्सर ट्रेन चढ़ाई नहीं होने के कारण खड़ी हो जाती है। रांची -टाटी, मुरी और ओरगा सहित अन्य सेक्शनों में चढ़ाई के दौरान ऐसा देखने को मिलता है। यह समस्या तभी आती है, जब ट्रैक पर बारिश का पानी और ओस के कारण नमी व फिसलन जैसी स्थिति रहती है।

पटरियों को बचाने का था उद्देश्य : ट्रैक को बचाने और अधिक से अधिक माल ढुलाई के लिए रेलवे इस पावरफुल इंजन का इस्तेमाल कर रहा है। अक्सर डब्ल्यूएजी-7 इंजन चढ़ान में चढ़ाई नहीं करने के कारण व्हील स्लिप की शिकायत होती है।

इससे ट्रेन की पटरियों को भारी नुकसान होता था और उसे बदलना पड़ता था। डब्ल्यूएजी -9 में ऐसा नहीं है। पटरियों पर व्हील स्लिप न हो, इसके लिए डब्ल्यूएजी-9 को लाया गया, जो व्हील स्लिप की अवस्था में पहुंचने पर उसकी गति कम हो जाए, लेकिन चढ़ाई नहीं करने की स्थिति में सेक्शन पूरी तरह से प्रभावित रहती है।

रांची मंडल के अधिकतर सेक्शन में है चढ़ाई : रांची रेल मंडल के अधिकतर सेक्शन चढ़ाई से भरा हुआ है। टांटी कनरवां सेक्शन, रांची-मुरी सेक्शन, बरकाकाना सेक्शन सहित अन्य सेक्शन चढ़ाई से भरा हुआ है। इस कारण ट्रेन चढ़ाई में हांफने लगते हैं।

बैंकिंग की पड़ती है आवश्यकता : जब मालगाड़ियां चढ़ान में चढ़ाई नहीं कर पाती है, तो ऐसी अवस्था में कई बार बैंकिंग की आवश्यकता पड़ती है। बैंकिंग यानि एक अतिरिक्त इंजन की आवश्यकता पड़ती है, जो पीछे से ट्रेन को धकेलकर चढ़ाई पार कराती है। बैंकर की सुविधा सभी जगह नहीं होने के कारण दूसरे सेक्शन में भेजना पड़ता था। इतनी देर तक सेक्शन जाम रहता था।

क्यू-51 का कुछ लोको पायलट करते हैं इस्तेमाल : रांची रेल मंडल के मनाही के बाद भी कुछ लोको पायलट नियमों का उल्लंघन कर क्यू-51 का गलत इस्तेमाल करते हैं, जिस वजह से ट्रेन चढ़ाई में चढ़ तो जरूरत जाती है, लेकिन, पटरियों को नुकसान करते हुए चढ़ती है।

क्यू-51 एक रिले है, जिसका इस्तेमाल लोको पायलट सिस्टम को बाइपास करने के लिए कर लेते हैं। इसमें ट्रेन की ताकत कम नहीं होती है। उसी रफ्तार में चढ़ान पर चढ़ाई करती है। हालांकि इससे इंजन पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

इंजन में सैंडर खराब रहने पर चढ़ाई करने में होती है परेशानी : कई इंजन ऐसे हैं, जिनका सैंडर (बालू से भरा बॉक्स) खराब रहने के कारण पटरियों पर बालू नियमित तरीके से नहीं गिर पाती है। दरअसल इसका इस्तेमाल चढ़ाई के दौरान किया जाता है, जब पटरियों पर व्हील स्पिल की शिकायत रहती है। सैंडर बॉक्स के खराब रहने से लोको पायलट को काफी परेशानी होती है।

पटरी की सुरक्षा के लिए सही : देखिए व्हील स्लिप के कई कारण होते हैं। बारिश और ट्रैक में शीत होने पर यह समस्या होती है। लेकिन, पटरियों पर यह दोनों न हो तो, डब्ल्यूएजी - 9 को किसी भी तरह की परेशानी नहीं होती है। पटरियों पर व्हील स्लिप न हो इसलिए यह नई पद्धति को डब्ल्यूएजी -9 में विकसित किया गया है, जो पटरी की सुरक्षा और रेलवे के लिए सही है।

अवनीश कुमार, सीनियर डीसीएम

कब-कब सेक्शन में : छह अगस्त - टाटी कनरवां सेक्शन में खड़ी हो गई, जहां बैंकिंग की मदद से सेक्शन पार करवाया गया।

आठ अगस्त - ओरगा सेक्शन में ट्रेन को चढ़ाने के लिए बैंकिंग की मदद ली गई।

25 अगस्त - महाबुआंग स्टेशन के निकट भी यही समस्या देखने को मिली थी

25 अगस्त - - मुरी सेक्शन में एक्सेस लोड की वजह से समस्या खड़ी हुई थी

Posted By: Jagran

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