रांची, [अमन मिश्रा]। अनलॉक हुए करीब तीन सप्ताह होने को आए लेकिन लोगों का दिमाग अभी भी लॉकडाउन है। संसाधन खोने के डर ने तनाव बढ़ा दिया है। लोगों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा और नेगेटिव विचार हावी है। मानसिक आरोग्यशाला रिनपास के चिकित्सा अधीक्षक का कहना है कि 30 फीसद मरीज बढ़ गए हैं हाल के दिनों में, ये सभी तनाव से ग्रस्त हैं। फोन पर लोगों की काउंसलिंग की जा रही है। लोगों को नौकरी जाने, बिजनेस ठप होने और बचत डूबने की आशंका है। यह लोगों की परेशानी बढ़ा रहा है। घरेलू हिंसा भी बढ़ गई है। और तो और स्कूल कॉलेज से दूर रहने के कारण बच्चे भी चिड़चिड़े हो रहे, लगातार फोन ने भी असर डाला।

नींद नहीं आना, भूख न लगना पहला लक्षण

नींद न आना और भूख न लगना, बार-बार रोने का मन होना या फिर बिना कारण किसी काम को बार-बार करना जैसी समस्या लोगों में बढ़ रही है। गुस्सा सातवें आसमान पर होने से महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हो रही हैं। बच्चों पर भी छोटी बातों पर हाथ उठाए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं।

दूसरे काम में मन लगाएं, बात करें

रिनपास के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. विनोद कुमार ने बताया कि हर रोज लगभग 15 लोग फोन कर अपनी परेशानी बता रहे हैं। इसमें 70 फीसद कॉल ऐसे हैं जिन्हेंं पहले से कोई न कोई मानसिक रोग रहा है। ऐसे में इस समय उनकी तकलीफ और भी बढ़ रही है। खास बात ये है कि जो नई कॉल है उसमें 30 फीसद ऐसे लोग हैं जो लॉकडाउन से पहले सामान्य थे लेकिन अब उनमें गुस्सा, घबराहट, व्यवहार में परिवर्तन, सिरदर्द जैसी समस्याएं होने लगी हैं।

यह कहा जा सकता है कि उनमें मानसिक रोग की उपज होने लगी है। उन्होंने सलाह दी कि जब भी अवसाद महसूस हो तो अपने मन को दूसरे कामों में लगाने की कोशिश करें न कि उसी के बारे ज्यादा सोचते रहें। दूसरों से बात करने से भी परेशानी नहीं घेरती। बच्चे परेशान लगें तो उनसे बात करें। वे दिन भर फोन पर ही नहीं लगे रहें यह ध्यान दें।

राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) के मनोरोग चिकित्सक डॉ. मेजर अजय कुमार बाखला बताते हैं कि लॉकडाउन की अवधि लंबी होने के चलते घरों में कैद लोगों की दिनचर्या में बदलाव का असर मनोविकार के रूप में सामने आने लगा है। लॉकडाउन खुलने के बावजूद ये लोग असहज महसूस कर रहे हैं। ऐसे लोगों को सलाह देकर मदद की जा रही है।

Posted By: Sujeet Kumar Suman

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