राज्य ब्यूरो, रांची : राज्य सरकार अब ऐसे आदिवासियों (अनुसूचित जनजाति) को आरक्षण देने पर रोक लगाने की तैयारी कर रही है, जिन्होंने अपना धर्म परिवर्तन कर लिया है और आदिवासियों के सामाजिक रीतिरिवाज व संस्कृति से दूर हो गए हैं। सरकार इसपर गहन मंथन कर रही है कि ऐसे लोगों को आदिवासी माना जाए या नहीं। इसपर सरकार ने महाधिवक्ता अजीत कुमार से राय मांगी थी। दरअसल सरकार के पास ऐसी सूचना है कि आरक्षण का वास्तविक लाभ धर्म परिवर्तन करने वाले धनी व संपन्न वर्ग के लोगों को मिल रहा है।

उनकी संतानें भी आरक्षण का लाभ उठाकर देश के बड़े-बड़े संस्थानों में शिक्षा पा रही है। दूसरी तरफ जिन गरीब आदिवासियों ने अपना धर्म परिवर्तन नहीं किया, वे सामाजिक असमानता के शिकार हो रहे हैं। उनको वास्तव में आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है। सरकार की मंशा है कि जाति प्रमाण पत्र निर्गत करने तथा निर्गत किए गए जाति प्रमाण पत्र की भी जांच कराई जाए। प्रमाण पत्रों की जांच करने की क्या प्रक्रिया पर भी महाधिवक्ता से राय मांगी गई है ताकि आरक्षण का लाभ सिर्फ वास्तविक आदिवासियों को ही मिल सके।

सरकार की चिंता जायज : महाधिवक्ता :

महाधिवक्ता अजीत कुमार ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों के आधार पर सरकार को इस संबंध में अपना मंतव्य भेजा है। प्रेषित मंतव्य में कहा गया है कि इसको लेकर सरकार की चिंता जायज है। यदि सरकार इस मामले में स्पष्ट निर्णय ले पाने में सफल होती है तो अनुसूचित जनजाति के एक बड़े वर्ग के लोगों को आरक्षण का वास्तविक लाभ मिल सकेगा। इससे धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों द्वारा आरक्षण में सेंधमारी पर भी रोक लगाने में सफलता मिलेगी।

धर्मातरण पर कड़ा कानून बना चुकी है सरकार :

राज्य सरकार पूर्व में धर्मातरण पर रोक के लिए सख्त कानून बना चुकी है। इस बाबत धर्म स्वतंत्र विधेयक को राज्यपाल ने मंजूरी दी। इस कानून के तहत धर्मातरण करने के पहले स्थानीय उपायुक्त को सूचनाएं देने के साथ-साथ कई कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा करना पड़ेगा। जबरन धर्मातरण पर जेल और जुर्माने का प्रावधान है। इस कानून के बाद जबरन धर्मातरण की दर्जनों शिकायत प्रशासन को मिली जिसपर तत्काल रोक लगाया गया। दोषियों के खिलाफ फौरी कार्रवाई भी की गई।

Posted By: Jagran

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