लोहरदगा, जागरण संवाददाता। संविधान हमें हक और अधिकार देता है, परंतु हमें अपने कर्तव्यों का भी ध्यान रखना चाहिए। देश और समाज के प्रति एक भारतीय का क्या कर्तव्य होना चाहिए। प्रजातंत्र का आशय जनता का जनता द्वारा और जनता के लिए चुनी हुई शासन व्यवस्था है। संविधान में भारत के संघीय संरचना के साथ-साथ शक्तियों का बंटवारा भी है, जो कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के रूप में है। इसी संविधान के माध्यम से हर भारतीय के लिए कुछ मौलिक अधिकार के साथ कर्तव्य भी निर्धारित हैं।

एक दूसरे के पूरक हैं अधिकार और कर्तव्य

भारत के संविधान में नागरिक द्वारा धर्म, जाति के आधार पर कोई भी भेदभाव निषेध है। साथ ही साथ विचारों को प्रकट करना संवैधानिक उपचार, शिक्षा का अधिकार मुख्य है। संविधान के अनुसार अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे के पूरक हैं, यानी कि यदि हम अपने अधिकार की मांग करते हैं, तो हमें अपने कर्तव्यों का भी निर्वहन करना चाहिए। इसके लिए सर्वप्रथम, एक भारतीय को देश के संकट के समय अपने व्यक्तिगत हित को त्याग कर देश में शांति एवं स्थायित्व के लिए कार्य करना अपेक्षित है। देश की सार्वजनिक जैसे रेलवे, सड़क, इमारत को ना तो नुकसान पहुंचाएं और यदि कोई ऐसा करता है तो उसे रोकना होगा।

दैनिक जागरण ने बच्चों के लिए चलाई मुहिम

वर्तमान में कोविड-19 के कारण लॉकडाउन से सभी शैक्षणिक संस्थान बंद रहे। बच्चों को यह संवैधानिक अधिकार है कि उन्हें शिक्षा मिले, पर परिस्थितिवश उन्हें पूर्ण शिक्षा नहीं मिल पा रही है। दीर्घ अवधि तक संस्थान बंद रहने के कारण ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था प्रारंभ किया गया, पर सभी बच्चों के पास मोबाइल फोन उपलब्ध नहीं होने के कारण वे पढ़ाई से वंचित हो जा रहे थे। ऐसे समय में भी यह आवश्यकता महसूस की गई कि बच्चों तक स्मार्टफोन पहुंचाई जाए। इसमें दैनिक जागरण ने एक बेहतर मुहिम चलाई। जिसमें पुलिस प्रशासन भी सहभागी बना था। यह एक सर्वश्रेष्ठ उदाहरण था कि एक भारतीय के लिए समाज के प्रति कर्तव्य का निर्वहन कैसे किया जाए।

शिक्षित समाज ही अपने अधिकार को समझता है

शिक्षा व्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए हम विभिन्न माध्यमों से प्रयास कर सकते हैं। शिक्षा के बिना देश के समुचित विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। स्कूल बंद हैं, ऑनलाइन कक्षाएं प्रारंभ हैं, ऐसे में हमें इसके लिए भी अपने आपको ढालना होगा। शिक्षा के सर्वांगीण विकास को लेकर हम छोटी-छोटी कोशिशों से परिस्थितियों को अपने रूप में ढाल सकते हैं। गांव-गांव जाकर बच्चों के साथ बातचीत, अभिभावकों को शिक्षा के प्रति प्रेरित करके और अपनी कोशिशों से शिक्षा को एक अलग मुकाम दिया जा सकता है। जरूरी नहीं कि स्कूल खुले रहें तभी बच्चों को संपूर्ण शिक्षा मिलेगी, हम अपनी कोशिशों से भी बच्चों को शिक्षा से जोड़े रख सकते हैं। जब तक समाज शिक्षित नहीं होगा, तब तक अधिकार और कर्तव्य के प्रति लोगों में संवेदनशीलता नहीं आएगी। संविधान के प्रति हमें ईमानदारी दिखाते हुए, अपने अधिकारों और कर्तव्यों की सही व्याख्या का ज्ञान भी होना चाहिए। शिक्षा के लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति की कोशिशें आवश्यक हो जाती हैं।

Edited By: Madhukar Kumar