विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

Mudma Jatra 2026: मुड़मा जतरा में क्यों जुटते हैं 40 पड़हा के प्रतिनिधि? जानिए झारखंड के इस ऐतिहासिक मेले की खासियत

By Mansi KumariEdited By: Mansi Kumari
Published: Sat, 24 Oct 2026 09:19 PM (IST)

रांची के मांडर में 27 और 28 अक्टूबर को ऐतिहासिक मुड़मा जतरा लगेगा, जिसमें पारंपरिक पूजा, नाच-गान और आदिवासी संस्कृति ...और पढ़ें

मुड़मा जतरा में 40 पड़हा की परंपरा मुख्य आकर्षण।

मुड़मा जतरा में 40 पड़हा की परंपरा मुख्य आकर्षण।

HighLights

  1. मुड़मा जतरा में 40 पड़हा की परंपरा मुख्य आकर्षण।

  2. झंडा मिलन, जतरा खूंटा पूजा आदिवासी संस्कृति का प्रतीक।

  3. उरांव-मुंडा समुदाय के सहयोग की लोककथा पर आधारित मेला।

डिजिटल डेस्क, रांची। रांची से करीब 30 किलोमीटर दूर मांडर में 27 और 28 अक्टूबर को ऐतिहासिक मुड़मा जतरा लगेगा। इस मेले में हर साल की तरह पारंपरिक पूजा, नाच-गान और खरीद-बिक्री के साथ आदिवासी संस्कृति की झलक देखने को मिलेगी। मुड़मा जतरा की खास पहचान 40 पड़हा की परंपरा है।

इसमें अलग-अलग गांवों के प्रतिनिधि और पारंपरिक पदाधिकारी जुटते हैं। ढोल, नगाड़े और मांदर की थाप के बीच होने वाला झंडा मिलन इस आयोजन का प्रमुख आकर्षण है।

मुड़मा जतरा के पीछे है पुरानी लोककथा

मुड़मा जतरा की शुरुआत को लेकर एक लोककथा प्रचलित है। इसके मुताबिक, मुगलों के आक्रमण के बाद रोहतासगढ़ छोड़ने को मजबूर हुए उरांव समुदाय के लोग सोन नदी पार कर पलामू के रास्ते छोटानागपुर पहुंचे थे। मुड़मा क्षेत्र में उनकी मुलाकात पहले से रह रहे मुंडा समुदाय के सरदारों से हुई। लोकपरंपरा के अनुसार, मुंडा सरदारों ने उन्हें यहां के पश्चिमी वन क्षेत्र में बसने और खेती करने की अनुमति दी थी।

इस कथा को उरांव और मुंडा समुदायों के बीच सहयोग और भाईचारे की याद के तौर पर देखा जाता है। हालांकि, यह मौखिक इतिहास पर आधारित विवरण है। इसके सभी घटनाक्रमों की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि होना अभी अलग शोध का विषय है।

40 पड़हा क्या है और कैसे काम करती है व्यवस्था

पड़हा छोटानागपुर क्षेत्र के उरांव आदिवासी समाज की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था है। इसमें कई गांव मिलकर एक बड़े सामाजिक संगठन का हिस्सा बनते हैं। पुराने समय में इस व्यवस्था के जरिए सामाजिक विवादों को सुलझाने, रीति-रिवाजों को बनाए रखने और गांवों के बीच तालमेल कायम रखने में मदद मिलती थी।

मुड़मा जतरा में 40 पड़हा की खास भूमिका मानी जाती है। इस व्यवस्था में पड़हा राजा, दीवान, महतो, कोटवार और पाहन जैसे पारंपरिक पदाधिकारी शामिल होते हैं। पड़हा राजा सभा का नेतृत्व करते हैं, दीवान व्यवस्था से जुड़े कामों में सहयोग देते हैं और महतो तथा कोटवार स्थानीय सामाजिक व्यवस्था में अपनी भूमिका निभाते हैं।

वहीं, पाहन धार्मिक अनुष्ठान कराते हैं। यह पारंपरिक व्यवस्था है, जिसके पदों और जिम्मेदारियों का निर्धारण स्थानीय रीति-रिवाजों से होता है।

जतरा खूंटा पर होती है पारंपरिक पूजा

मुड़मा जतरा में जतरा खूंटा का विशेष महत्व है। इसे शक्ति खूंटा भी कहा जाता है। परंपरा के अनुसार, इसे सखुआ यानी साल के पेड़ के तने से तैयार किया जाता है। यहां सरना धर्मगुरु और अलग-अलग पड़हा के पाहन पूजा-अर्चना करते हैं। इस दौरान प्रकृति, पूर्वजों और सामुदायिक आस्था को विशेष महत्व दिया जाता है।

जतरा खूंटा की पूजा से जुड़ी परंपराओं में मुर्गों की बलि का भी उल्लेख मिलता है। हालांकि, इस प्रथा का मौजूदा स्वरूप क्या है, इसकी पुष्टि आयोजकों से करना जरूरी होगा।

झंडा मिलन में दिखती है अलग-अलग गांवों की भागीदारी

मुड़मा जतरा में विभिन्न गांवों के लोग अपने पारंपरिक परिधानों में पहुंचते हैं। इन समूहों को खोड़हा कहा जाता है। अलग-अलग पड़हा के प्रतिनिधि अपने झंडों और पारंपरिक प्रतीकों के साथ शामिल होते हैं। इसी सामूहिक आयोजन को झंडा मिलन कहा जाता है।

इन समूहों से हाथी, घोड़े, बाघ, मगरमच्छ, मछली, नाव और छाता जैसे प्रतीक भी जुड़े होते हैं। मांदर, ढोल और नगाड़े की आवाज के बीच होने वाला यह आयोजन मेले की पहचान का हिस्सा है।

लकड़ी के हाथी-घोड़े पर बैठने का भी है नियम

मुड़मा जतरा में लकड़ी से बने हाथी और घोड़े भी देखने को मिलते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इन पर बैठने का अधिकार पड़हा राजा और कुछ अन्य पारंपरिक पदाधिकारियों को ही होता है। इस परंपरा को सामाजिक व्यवस्था में उनके पद और जिम्मेदारी से जोड़कर देखा जाता है।

मेले में पूजा के साथ होती है खरीदारी

मुड़मा जतरा में लोग केवल पूजा और सांस्कृतिक आयोजन के लिए ही नहीं जुटते, बल्कि यहां खरीदारी भी करते हैं। मेले में कृषि उपकरण, बर्तन, घरेलू उपयोग की वस्तुएं, कंबल और दूसरे सामानों की खरीद-बिक्री होती है। ग्रामीणों के लिए यह अपनी जरूरत का सामान लेने और दूसरे इलाकों से आए लोगों से मिलने का अवसर भी है।

मुड़मा जतरा की खासियत यही है कि इसमें धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक परंपराएं और ग्रामीण जीवन भी जुड़े हुए हैं। 27 और 28 अक्टूबर को मांडर में लगने वाला यह मेला उरांव और मुंडा समुदायों की लोकस्मृतियों और आदिवासी संस्कृति को करीब से समझने का अवसर देगा।