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बच्चों को चिड़चिड़ा और गुस्सैल बना रहा फोन, झारखंड में RINPAS की चौंकाने वाली रिसर्च

Published: Sun, 20 Sep 2026 07:49 PM (IST)Updated: Sun, 20 Sep 2026 08:08 PM (IST)

रांची के रिनपास शोध में सामने आया है कि मोबाइल का अत्यधिक उपयोग किशोरों में सामाजिक अलगाव, पारिवारिक संवाद में कमी और पढ़ाई में गिरावट का कारण बन रहा है।

बच्चे हो रहे गुस्सैल। (जागरण)

बच्चे हो रहे गुस्सैल। (जागरण)

HighLights

  1. मोबाइल की लत से किशोरों में सामाजिक अलगाव बढ़ रहा है।

  2. रिनपास शोध में डिजिटल डिवाइस के अत्यधिक उपयोग के प्रभाव सामने आए।

  3. थेरेपी और आउटडोर गतिविधियों से आत्म-नियंत्रण में सुधार संभव।

अनुज तिवारी, रांची। मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल उपकरणों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल किशोरों के सामाजिक और पारिवारिक जीवन को प्रभावित कर रहा है।

रांची इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो-साइकियाट्री एंड एलाइड साइंसेज (रिनपास) के क्लिनिकल साइकोलाजी विभाग के शोध में सामने आया है कि डिजिटल डिवाइस की लत से किशोरों में सामाजिक अलगाव बढ़ने, परिवार के साथ बातचीत घटने, नींद प्रभावित होने और पढ़ाई में गिरावट जैसी समस्याएं देखी गईं।

कई किशोरों को अपनी भावनाओं को संभालने में भी कठिनाई हुई। यह शोध क्लिनिकल साइकोलाजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अमूल रंजन सिंह और शोधार्थी देबालिना दास ने किया है।

शोध इसी वर्ष अप्रैल में इंडियन जर्नल आफ साइकियाट्री में प्रकाशित हुआ। इसमें किशोरों में प्रौद्योगिकी व्यसन के मनो-सामाजिक प्रभाव और उपचार के बाद होने वाले बदलावों का अध्ययन किया गया।

अध्ययन के लिए 13 से 18 वर्ष के 300 किशोरों का सर्वे किया गया। इनमें से मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल से जुड़ी परेशानियों वाले 113 किशोरों पर विस्तृत अध्ययन किया गया।

इनमें 52 लड़के और 61 लड़कियां थीं। करीब 35 प्रतिशत बच्चों में तकनीक के अत्यधिक इस्तेमाल से जुड़ी परेशानियां सामने आईं। इन किशोरों में से 20 ऐसे थे, जिनका स्क्रीन टाइम प्रतिदिन पांच से छह घंटे तक था।

अन्य बच्चों का स्क्रीन टाइम तीन से पांच घंटे के बीच रहा। अभिभावकों ने बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा बढ़ने और पढ़ाई प्रभावित होने जैसे बदलाव महसूस किए थे।

समस्या का एहसास, फिर भी नियंत्रण मुश्किल

शोध में सामने आया कि कई किशोरों को यह पता था कि वे मोबाइल का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं, इसके बावजूद वे इसे नियंत्रित नहीं कर पा रहे थे।

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क्लिनिकल साइकोलाजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अमूल रंजन सिंह।

इससे उनमें अपराधबोध, निराशा और डिजिटल माध्यम पर निर्भरता जैसी भावनाएं पैदा हुईं। अत्यधिक इस्तेमाल का असर केवल स्क्रीन टाइम तक सीमित नहीं रहा।

किशोर वास्तविक सामाजिक संपर्क से दूर होने लगे और परिवार के साथ संवाद भी कम हुआ। नींद में व्यवधान और पढ़ाई पर असर के साथ डिजिटल माध्यम के बिना भावनाओं को संभालने में परेशानी भी सामने आई।

दो माह थेरेपी, छह से आठ माह फालोअप

शोध के तहत किशोरों को दो महीने तक थेरेपी दी गई और काउंसिलिंग की गई। इसके बाद छह से आठ महीने तक फालोअप किया गया।

उपचार में मोबाइल इस्तेमाल करने की इच्छा को नियंत्रित करने, भावनाओं को संभालने, व्यवहार में बदलाव और नियमित दिनचर्या विकसित करने पर काम किया गया।

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फालोअप में किशोरों में आत्म-जागरूकता और आत्मनियंत्रण में सुधार देखा गया। वे डिजिटल डिवाइस के इस्तेमाल को नियंत्रित करने, भावनाओं को बेहतर ढंग से व्यक्त करने और नियमित दिनचर्या बनाने में पहले की तुलना में अधिक सक्षम हुए।

शोधकर्ताओं के अनुसार, उपचार में किशोर को केवल स्क्रीन टाइम कम करने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है। उसके भावनात्मक संघर्ष और बदलाव के लिए उसकी तैयारी को भी समझना जरूरी है।

आउटडोर गतिविधियां महत्वपूर्ण

शोध का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष किशोरों को मोबाइल से हटाकर आउटडोर गेम्स और अन्य सामाजिक गतिविधियों से जोड़ना रहा। शोधकर्ताओं के अनुसार खेल, दोस्तों के साथ समय और परिवार के साथ संवाद किशोरों को डिजिटल माध्यम पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकते हैं।

अभिभावकों को बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल की स्पष्ट समय-सीमा तय करने, पढ़ाई और सोने के समय मोबाइल से दूरी रखने तथा बच्चों के साथ नियमित संवाद बढ़ाने की सलाह दी गई है।

आठ सत्रों में व्यवहार परिवर्तन पर फोकस

शोध के तहत किशोरों के लिए आठ सत्रों का विशेष कार्यक्रम तैयार किया गया। इसमें डिजिटल आदतों और उनके जोखिमों की समझ, प्रेरक संवाद, तनाव सहने की क्षमता, समस्या समाधान, भावनाओं का नियमन और सकारात्मक सोच पर काम कराया गया।

इस बीच डिजिटल पहचान और वास्तविक जीवन की पहचान के बीच जहां संतुलन पर जोर दिया गया, वहीं अभिभावकों और किशोरों को साथ लेकर स्वस्थ डिजिटल आदतों के लिए साझा नियम और योजना तैयार की गई।

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