राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार के लिए ठोस निर्णय की बड़ी आवश्यककता है। सरकार प्राथमिकता तय कर ले तो रांची में विकास की अपार संभावनाएं हैं। शहर में सूबे का सबसे बड़ा चिकित्सकीय संस्थान रिम्स (राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान)है। यहां राज्य ही नहीं दूसरे प्रदेशों से भी मरीज चिकित्सा के लिए पहुंचते हैं, लेकिन, जिन मरीजों का उपचार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और जिला के अस्पताल में संभव है, वह भी रिम्स पहुंच रहे हैं।

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ऐसे में मरीजों के बढ़ते दबाव के बीच बेहतर चिकित्सा सुविधा प्रदान करना चुनौती के समान है। सुधार के लिए सरकार को नीतिगत फैसले के तहत यह तय करना चाहिए कि बीमारी अनुसार संबंधित स्वास्थ्य केंद्र में इलाज सुनिश्चित हो। हर बीमारी को बड़े संस्थान में रेफर करना उचित नहीं है। छोटे स्वास्थ्य केंद्रों में भी मरीज को बेहतर चिकित्सा सुविधा मिल सकती है।

सबसे बड़ा मुद्दा है राज्य के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स को एम्स की तर्ज पर डेवलप करना। वर्तमान में इस अस्पताल में प्राइमरी, सेकेंडरी और टर्शयरी तीनों प्रकार के मरीज पहुंच रहे हैं, जिससे स्पेशियलिटी विंग का पूरा इस्तेमाल उभर नहीं पा रहा है। फिलहाल दो-दो सुपर स्पेशलियलिटी वार्ड है। लेकिन इनके संचालन पर कभी-कभी सवाल उठ जाता है। इसके पीछे एक ही कारण है कि यह निर्धारित नहीं किया गया है कि आखिर इस अस्पताल का करना क्या है।

 

जिलों के डॉक्टर के वश के बाहर हो जाए तब रेफर हो मामला

अभी सभी जिलों से मरीज रेफर होकर रिम्स पहुंच रहे हैं और इनमें अधिसंख्य मामले ऐसे होते हैं, जिनका इलाज जिला स्तर पर हो जाना चाहिए। जिलों में यह ट्रेंड बन गया है, मरीज थोड़ा भी गंभीर हुआ तो उसे सीधे रिम्स भेज दिए। इस आचरण पर निगरानी रखनी होगी। रिम्स को बड़ा बनाने के लिए इसके साथ बड़ों जैसा व्यवहार करना होगा। इसकी भी पहचान करनी होगी कि क्या प्राथमिक, रेफरल और जिला स्तर पर काबिल चिकित्सक नहीं हैं, जो मरीज सीधे यहां पहुंचता है।

भीड़ से न इलाज न विशेषज्ञता

रिम्स में मरीजों की भीड़ से सबको नुकसान है। इलाज ठीक से नहीं हो पा रहा है, तो यहां अध्ययनरत पीजी छात्रों को भी वह विशेषज्ञता हासिल नहीं हो पा रही। इमरजेंसी वार्ड का हाल बुरा है और पूरे झारखंड के मामले रांची आते हैं। अगर यही स्थिति रखनी है तो इस वार्ड को 200 बेड का बनाकर मैनपावर बढ़ाना चाहिए। इससे मरीजों को जमीन पर रखकर इलाज करने से मुक्ति मिलेगी। यह मरीज, डॉक्टर और परिजन सभी के लिए कष्टकारी है।

हाल के दिनों में देखा गया कि संसाधनों का सही तरीके से उपयोग नहीं हो पा रहा है। छोटी-छोटी बीमारी होने पर 108 नंबर पर कॉल कर एंबुलेंस को बुलाया जाता है। इसके बाद एंबुलेंस के माध्यम से मरीज को रिम्स में लाकर छोड़ दिया जाता है। रिम्स एक शिक्षण संस्थान है। यहां पर मरीजों के इलाज के साथ-साथ पढ़ाई भी कराया जाता है।

अगर, यहां से डॉक्टर अच्छी शिक्षा लेकर निकलते है, तो उनके इस ज्ञान का फायदा प्रत्यक्ष तौर पर मरीजों को मिलेगा। सरकार को इस ओर भी विशेष ध्यान देने की भी जरूरत है। रिम्स को बेहतर सुविधा मिलेगी, तो मरीजों को इसको ज्यादा फायदा मिलेगा।

-डॉ. तुलसी महतो

 

(डॉ तुलसी महतो , रिम्‍स रांची में एफएमटी के एचओडी हैं)

By Krishan Kumar