गांधीजी की झारखंड यात्राएं: राष्ट्रपिता की पदचाप से झरिया के कोयला खदानों से लौह नगरी तक जागी आजादी की लौ
महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर झारखंड में उन्हें याद किया गया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और बाबूलाल मरांडी ने बापू को ...और पढ़ें

मोरहाबादी मैदान, बापू वाटिका स्थित गांधी जी की प्रतिमा पर राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार एवं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी।
HighLights
1917 में रांची आगमन, चंपारण सत्याग्रह की रणनीति बनी।
मजदूरों, हरिजनों के उत्थान हेतु गांधीजी का अथक प्रयास।
डिजिटल डेस्क, रांची। आज महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर पूरा देश बापू को याद कर रहा है। झारखंड में भी राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने राष्ट्रपिता को नमन किया।
सोरेन ने सोशल मीडिया पर लिखा, "बापू का सत्य, अहिंसा और न्याय का मार्ग हमारे लोकतंत्र की आधारशिला है," जबकि मरांडी ने शत-शत नमन करते हुए उनकी विरासत को याद किया।
इस मौके पर गांधीजी की झारखंड यात्राओं को याद करना प्रासंगिक है। एक ऐसी भूमि जहां कोयला की कालिमा और किसानों की पीड़ा के बीच उन्होंने अहिंसा की मशाल जलाई। तत्कालीन बिहार के हिस्से रहे झारखंड में गांधीजी की कम से कम छह प्रमुख यात्राएं दर्ज हैं, जो चंपारण सत्याग्रह से लेकर रामगढ़ कांग्रेस तक फैली हैं।
इनमें रांची, जमशेदपुर, हजारीबाग, देवघर, झरिया (धनबाद) और डालटनगंज जैसे इलाकों में उन्होंने मजदूरों, किसानों और हरिजनों से संवाद किया, फंड संग्रह किया और सामाजिक सुधारों को गति दी।
कोयला उद्योगपतियों से मिले दान से लेकर हिंसक विरोध तक, ये यात्राएं गांधीजी की विरासत का जीवंत हिस्सा हैं। आइए, क्रमवार इन ऐतिहासिक पड़ावों पर नजर डालते हैं।
1917: चंपारण की राह में रांची
गांधीजी की झारखंड से पहली मुलाकात 4 जून 1917 को हुई, जब वे वर्धा आश्रम से चंपारण जा रहे थे। रांची पहुंचकर उन्होंने स्थानीय नेताओं से चर्चा की और चंपारण के नील किसानों के शोषण पर रणनीति बनाई।
इसी साल जमशेदपुर (तत्कालीन कालिमाटी) से गुजरते हुए उन्होंने किसानों की दुर्दशा पर ध्यान केंद्रित किया। यह यात्रा सत्याग्रह की नींव रखने वाली थी, जिसने गांधीजी को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
1921: असहयोग की लहर झरिया तक
1921 में असहयोग आंदोलन के सिलसिले में गांधीजी झरिया (धनबाद) पहुंचे, जहां कोयला मजदूरों की समस्याओं पर फोकस किया। उन्होंने सार्वजनिक सभाओं में अहिंसा और स्वदेशी का प्रचार किया, जिससे मजदूरों में जागृति आई।
इसी साल नवंबर में झरिया में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस का दूसरा सत्र हुआ, जो गांधीजी के प्रभाव से प्रेरित था। हालांकि फंड संग्रह अपेक्षाकृत कम रहा, लेकिन यह दौरा झारखंड के औद्योगिक क्षेत्र को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने वाला साबित हुआ।

जब जमशेदपुर आए थे गांधी जी, युनाइटेड क्लब में लगी बापू की तस्वीर। (सौजन्य: सुरेश संथोलिया)
1925: जमशेदपुर में मजदूरों से संवाद
सितंबर 1925 में गांधीजी रांची पहुंचे, जहां खादी और ग्रामोद्योग जैसे रचनात्मक कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया। हजारीबाग में सरस्वती देवी और अन्य नेताओं ने उनका स्वागत किया।
जमशेदपुर में उन्होंने टाटा वर्कर्स यूनियन की नींव रखी, मजदूरों की समस्याएं सुनीं और यूनाइटेड क्लब में सभा को संबोधित किया।टाटा परिवार की सराहना की और देवघर में हरिजनों को मंदिर प्रवेश की परंपरा की प्रशंसा की। राजेंद्र प्रसाद और फ्रंटियर गांधी उनके साथ थे।
1927: डालटनगंज में दलित उत्थान का आह्वान
1927 में गांधीजी डालटनगंज (पलामू) पहुंचे, जहां राजेंद्र प्रसाद के साथ दलित उत्थान पर फोकस किया। ग्रामीण समुदायों से बातचीत की और राष्ट्रीय एकता पर जोर दिया। यह यात्रा झारखंड के पिछड़े इलाकों में गांधीवादी विचारों को फैलाने में सहायक रही।
1934: देवघर में खतरे का सामना
1934 में गांधीजी झरिया (धनबाद) पहुंचे, जहां हरिजन उत्थान और राष्ट्रीय शिक्षा के लिए फंड संग्रह किया। स्थानीय लोगों ने 60 हजार रुपये दान दिए, जिसमें कोयला उद्योगपतियों और मारवाड़ी व्यापारियों का बड़ा योगदान था।
जमशेदपुर में जवाहरलाल नेहरू के साथ स्टील वर्क्स का दौरा किया और हरिजन बस्तियों में धन संग्रह किया। लेकिन देवघर में 25 अप्रैल को जसीडीह स्टेशन पर पंडों ने लाठियों से हमला किया, कारण था हरिजन मंदिर प्रवेश अभियान। गांधीजी की अहिंसा ने स्थिति को शांत किया।

(पुण्यतिथि पर रांची में बापू वाटिका स्थित महात्मा गांधी प्रतिमा स्थल पर कलाकारों ने बापू के प्रिय भजन एवं रामधुन प्रस्तुत किये। फोटो: संजय सुमन)
1940 में रामगढ़: झारखंड का ऐतिहासिक क्षण
1940 में गांधीजी की अंतिम प्रमुख यात्रा रांची में हुई, जहां रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया। कोकर में जायसवाल परिवार के घर रुके। कार से रामगढ़ गए। खादी प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। नेहरू, पटेल जैसे नेताओं के साथ यह सत्र स्वतंत्रता की दिशा तय करने वाला था।
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ चौधरी कहते हैं- गांधीजी की झारखंड यात्राएं स्वतंत्रता संग्राम को मजबूत करने के साथ-साथ सामाजिक न्याय, मजदूर अधिकार और हरिजन उत्थान पर केंद्रित रहीं। आज उनका कमरा और कार संरक्षित हैं।
झरिया की खदानें उनकी स्मृतियों को सहेजे हुए हैं। ये यात्राएं झारखंड की विरासत को रोशन करती रहेंगी, युवाओं को प्रेरित करती हुईं।
