Sharad Purnima 2026: कोजागरी लक्ष्मी पूजा और 'लोख्खी पूजो' का उल्लास, जानिए महत्व, परंपरा और शुभ मुहूर्त
शरद पूर्णिमा पर रांची समेत बंगाल और मिथिला में कोजागरी लक्ष्मी पूजा व लोख्खी पूजो का उत्साह है, जहां मां लक्ष्मी के पृथ्वी पर विचरण करने की मान्यता है।

कोजागरी पर्व स्वच्छता, समृद्धि और पारिवारिक मंगल की कामना के साथ मनाया जाता है, जिसमें धान, फल और मिठाई का विशेष महत्व है।
HighLights
शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं।
कोजागरी पूजा स्वच्छता, समृद्धि और पारिवारिक मंगल का उत्सव है।
रांची, बंगाल, मिथिला में धान, फल, मिठाई से होती है पूजा।
जागरण संवाददाता, रांची। शरद पूर्णिमा की रात कुछ अलग होती है। आसमान में चांद अपनी पूरी आभा के साथ खिलता है, धरती पर चांदनी की सफेद चादर बिछ जाती है और वातावरण में एक ऐसी शांति उतर आती है, जिसमें प्रकृति भी जैसे कुछ पल ठहरकर अपने सौंदर्य को निहारती है।
देश के अलग-अलग हिस्सों में इस पूर्णिमा के अलग-अलग अर्थ हैं, लेकिन बंगाल और मिथिला क्षेत्र में इसका एक विशेष सांस्कृतिक रूप है- कोजागरी लक्ष्मी पूजा, जिसे बंगाली घरों में प्यार से ‘लोख्खी पूजो’ कहा जाता है।
राजधानी रांची समेत शहर के मिथिला और बंगाली वासियों में इस पर्व को लेकर जबरदस्त उत्साह का माहौल है। इस दिन घरों में पान, मखान और मिठाई बांटने की एक अनूठी परंपरा है।
यह केवल देवी लक्ष्मी की आराधना का पर्व नहीं है, बल्कि यह घर-आंगन की स्वच्छता, अन्न की समृद्धि, पारिवारिक मंगल, श्रम के सम्मान और जीवन में सुख-शांति की कामना का एक भव्य उत्सव भी है।
क्या है 'कोजागरी' शब्द के पीछे का लोकविश्वास?
‘कोजागरी’ शब्द के पीछे एक बहुत ही सुंदर लोकविश्वास जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात माता लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं और यह सवाल पूछती हैं- ‘को जागर्ति’ अर्थात् ‘कौन जाग रहा है...?’
इसी विश्वास और परंपरा से इस पर्व का नाम कोजागरी पड़ा। लोकपरंपरा में जागने का अर्थ केवल रातभर आंखें खुली रखना नहीं है, बल्कि अपने जीवन, अपने कर्म और अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहना भी है।
बिहार के कई हिस्सों, मसलन मिथिला और बंगाल में इस दिन घरों की विशेष साफ-सफाई की जाती है। आंगन में खूबसूरत अल्पना सजाई जाती है, चावल के घोल से मां लक्ष्मी के छोटे-छोटे चरण बनाए जाते हैं, दीप जलाए जाते हैं।
मां लक्ष्मी को धान, फल, मिठाई, नारियल तथा अन्य पारंपरिक भोग अर्पित किए जाते हैं। घर के द्वार पर बने वे छोटे-छोटे पदचिह्न केवल देवी के आगमन का प्रतीक नहीं होते, बल्कि वे इस आशा के भी निशान होते हैं कि घर में कभी अन्न की कमी न हो, परिवार में आपसी प्रेम हमेशा बना रहे और मेहनत करने वाले हाथ कभी खाली न रहें।
कृषि संस्कृति से जुड़ी है 'लोख्खी पूजो'
बंगाली संस्कृति में माता लक्ष्मी को प्यार से ‘लोख्खी’ कहा जाता है। उनकी कल्पना केवल सोने-चांदी और धन-दौलत तक ही सीमित नहीं है।
वे धान की बालियों में बसती हैं, भरे हुए अन्नागार में निवास करती हैं, रसोई की खुशहाली में महकती हैं और परिवार के संतोष में भी मौजूद रहती हैं।
बंगाल की कृषि-प्रधान जीवनशैली में धान केवल एक फसल नहीं, बल्कि जीवन का मुख्य आधार रहा है। इसलिए लोख्खी पूजो में धान, चावल, नारियल और मौसमी फल का विशेष स्थान होता है।
अल्पना में कमल के फूल, धान की बालियां और देवी के चरण उकेरने की परंपरा प्रकृति तथा समृद्धि के इसी गहरे संबंध को खूबसूरती से अभिव्यक्त करती है।
इस पूजा का असली सौंदर्य इसकी सादगी में है। कहीं इसका आयोजन बेहद भव्य तरीके से होता है, तो कहीं किसी छोटे-से घर के आंगन में मां की तस्वीर के सामने केवल एक छोटा-सा दीपक जलता है।
यह इस बात का प्रमाण है कि श्रद्धा का मूल्य सजावट की भव्यता से नहीं, बल्कि मन की सच्ची भावना से तय होता है।
चांदनी रात और अमृत वर्षा की लोकमान्यता
शरद पूर्णिमा का चांद सदियों से भारतीय साहित्य, लोकगीतों और लोकविश्वासों का एक अहम हिस्सा रहा है। वर्षाऋतु के बाद स्वच्छ आकाश, शीतल हवा और चांदनी से नहाई रात मनुष्य को सीधे प्रकृति के निकट ले जाती है।
लोकमान्यता है कि इस विशेष रात चंद्रमा की किरणों में विशेष अमृतमय गुण होते हैं। यही कारण है कि देश के कई क्षेत्रों में खीर बनाकर उसे पूरी रात चांदनी में रखने और अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की पुरानी परंपरा है।
बंगाल में भी कई परिवार अपनी पारिवारिक रीति-रिवाजों के अनुसार खीर या अन्य विशेष भोग तैयार करते हैं। इस शांत वातावरण और प्रकृति के साथ बिताए कुछ पल मन पर एक बेहद सकारात्मक और सुखद प्रभाव डालते हैं।
समृद्धि का वास्तविक अर्थ क्या है?
लोख्खी पूजो हमें एक ऐसा गहरा प्रश्न देती है, जिसका उत्तर केवल पूजा की थाली में नहीं मिलता- आखिर समृद्धि है क्या...?
क्या समृद्धि केवल बैंक खाते में जमा धन का नाम है? क्या बड़ा मकान, महंगी गाड़ी और भरा हुआ खजाना ही लक्ष्मी का वास्तविक आगमन है?
यदि घर में धन है, लेकिन अपनों के लिए समय बिल्कुल नहीं है; रसोई में अच्छा भोजन है, लेकिन पड़ोसी भूखा सोता है; जीवन में तमाम भौतिक सुविधाएं हैं, लेकिन मन में सच्चा संतोष नहीं है- तो क्या हम सचमुच समृद्ध हैं?
शायद लोख्खी पूजो का सबसे सुंदर और प्रासंगिक संदेश यही है कि धन जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन धन से भी बड़ा है उसका सही सदुपयोग। अन्न की पूजा तभी सार्थक होती है, जब किसी भूखे को भोजन मिले।
श्रम की पूजा तभी सार्थक होती है, जब हर मेहनतकश श्रमिक को उसका उचित सम्मान मिले। और माता लक्ष्मी की आराधना तभी पूर्ण मानी जाती है, जब घर की भौतिक समृद्धि के साथ-साथ मन में उदारता और सेवाभाव भी हो।
मां लक्ष्मी का स्वागत केवल दरवाजे पर सुंदर अल्पना बनाकर नहीं, बल्कि अपने व्यवहार में ईमानदारी, अपने काम में निष्ठा और अपने जीवन में संतुलन लाकर किया जाता है।
प्रकृति की समानता और घरेलू आत्मीयता
शरद पूर्णिमा की रात में चांद सबके आंगन पर एक जैसी रोशनी बिखेरता है। वह अमीर और गरीब के घर में कोई भेद नहीं करता। उसकी शीतल चांदनी किसी के पद, प्रतिष्ठा या बैंक बैलेंस की जांच नहीं करती।
प्रकृति की यही समानता हमें यह याद दिलाती है कि जीवन के कुछ सबसे मूल्यवान सुख पैसों से खरीदे नहीं जा सकते- जैसे परिवार के साथ बैठना, मां के हाथ का बना प्रसाद खाना, बच्चों की मासूम हंसी सुनना, पुराने दिनों को याद करना और शांत रात के खुले आकाश में चांद को निहारना।
बंगाल की लोख्खी पूजो में इसी घरेलू आत्मीयता और अपनापन की सोंधी सुगंध है। पूजा के बाद जब घर के सभी लोग आपस में प्रसाद बांटते हैं।
दीये की लौ धीमे-धीमे टिमटिमाती रहती है और बाहर पूर्णिमा का चांद अपनी शीतल रोशनी बिखेरता है, तब ऐसा महसूस होता है कि समृद्धि कोई दूर बैठी कोई देवी नहीं, बल्कि हमारे दैनिक जीवन में मौजूद उन छोटी-छोटी खुशियों का नाम है, जिन्हें हम अक्सर भागदौड़ में अनदेखा कर देते हैं।
मां लोख्खी से यही प्रार्थना है कि हर घर में अन्न का भंडार हो, हर मन में संतोष हो, हर श्रम को यथोचित सम्मान मिले और हर परिवार में प्रेम का यह दीपक हमेशा जलता रहे।
तिथि और मुहूर्त विवरण:
- पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 25 अक्टूबर को सुबह 11:55 बजे से
- पूर्णिमा तिथि समाप्त: 26 अक्टूबर को सुबह 9:41 बजे तक
- निशिता काल (पूजा का विशेष समय): रात 11:58 बजे से रात 12:47 बजे तक
