रांची, राज्य ब्यूरो। झारखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डा. रवि रंजन व जस्टिस एसएन प्रसाद की अदालत में शुक्रवार को सहायक अभियंता नियुक्ति मामले में एकल पीठ के आदेश के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई हुई। सभी पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने कहा कि एकल पीठ का आदेश बिल्कुल सही है। इसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। इसलिए प्रार्थी की याचिका खारिज की जाती है। एकल पीठ के आदेश के खिलाफ रवि शंकर सिंह खंडपीठ में चुनौती दी थी।

सुनवाई के दौरान प्रार्थी के अधिवक्ता की ओर से अदालत को बताया कि सहायक अभियंता नियुक्ति के लिए जेपीएससी ने विज्ञापन जारी किया था। प्रार्थियों ने भी आवेदन दिया था। चयनित भी हुए थे, लेकिन उन्हें साक्षात्कार के लिए नहीं बुलाया गया है। जेपीएससी नियुक्ति नियमावली 2012 के अनुसार विज्ञापन के लिए जारी पद के न्यूनतम ढाई गुणा चयनित अभ्यर्थियों को साक्षात्कार में बुलाया जाना अनिवार्य है, लेकिन जेपीएससी ने 1.8 गुना अभ्यर्थियों को ही साक्षात्कार के लिए बुलाया है। ऐसा करना नियमावली और विज्ञापन की शर्तों का उल्लंघन है। एकल पीठ ने अपने आदेश में कहा था कि जेपीएससी ने नियमानुसार ही अभ्यर्थियों को बुलाया है। इसमें कोई त्रुटि नहीं है। इसलिए अदालत इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी। इस आदेश के खिलाफ खंडपीठ में याचिका दाखिल की गई थी।

प्राथमिक शिक्षकों ने भी उठाई नियुक्ति में आरक्षण की मांग

उधर, प्राथमिक शिक्षकों ने भी प्लस टू स्कूलों में स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति में आरक्षण की मांग उठाई है। झारखंड प्रगतिशील शिक्षक संघ ने कहा है कि झारखंड कर्मचारी चयन आयोग द्वारा स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति के लिए जो विज्ञापन निकाला गया है, उसमें माध्यमिक विद्यालयों में कार्यरत स्नातक प्रशिक्षित शिक्षकों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित की गई है लेकिन इसमें मध्य विद्यालयों में कक्षा छह से आठ में अध्यापन हेतु नियुक्त एवं कार्यरत स्नातक प्रशिक्षित शिक्षकों को आरक्षण नहीं दिया गया है। इससे आवश्यक योग्यता रखनेवाले शिक्षक आरक्षण के लाभ से वंचित हो रहे हैं।

संघ ने चतरा में उपायुक्त द्वारा शिक्षकों के वेतन रोकने की कार्रवाई का विरोध करते हुए कहा है कि जो शिक्षक प्रतिनियुक्ति पर थे, उनका भी वेतन बायोमिट्रिक उपस्थिति नहीं बनने को लेकर रोका गया है। संघ के अध्यक्ष आनंद साहू तथा महासचिव बलजीत ङ्क्षसह ने कहा कि शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यों से अभी तक मुक्त नहीं किया जा सका है। दूसरी तरफ, किसी भी मामले में अधिकारियों की लापरवाही होने पर शिक्षकों को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।

Edited By: M Ekhlaque