JMM की बदलती रणनीति, असम के बाद बंगाल में भी कांग्रेस से बनाई दूरी; क्या झारखंड में बदलेगा राजनीतिक समीकरण?
झामुमो असम और बंगाल में कांग्रेस से दूरी बनाकर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक रणनीति के संकेत दे रहा है। यह कदम ...और पढ़ें
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हेमंत सोरेन। (फाइल फोटो)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने हाल के दिनों में जिस तरह असम के बाद बंगाल में भी कांग्रेस से दूरी बनाते हुए अपनी स्वतंत्र राजनीतिक रणनीति के संकेत दिए हैं, उसने विपक्षी गठबंधन की आंतरिक राजनीति को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।
राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ एक मंच पर खड़े दिखने वाले दलों के बीच राज्यों में बदलते समीकरण अब अलग तस्वीर पेश करने लगे हैं।
झामुमो का यह रुख इस बात का संकेत माना जा रहा है कि पार्टी अब अपनी राजनीतिक ताकत का स्वतंत्र आकलन कर रही है और भविष्य की राजनीति में अपनी भूमिका को नए तरीके से परिभाषित करना चाहती है।
बंगाल में झामुमो ने कांग्रेस के साथ खड़े होने के बजाय तृणमूल कांग्रेस के प्रति नरम रुख दिखाया। बंगाल में पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह केवल राष्ट्रीय गठबंधन की मजबूरियों के आधार पर निर्णय नहीं लेगी, बल्कि हर राज्य में स्थानीय परिस्थितियों और अपने संगठनात्मक हितों को प्राथमिकता देगी।
इससे पहले असम में भी सीट बंटवारे और राजनीतिक सम्मान को लेकर झामुमो ने कांग्रेस से असहमति जताई थी, जिसने दोनों दलों के रिश्तों में खटास के संकेत दिए थे।
सीमित क्षेत्रीय दल की धारणा को तोड़ने की मुहिम
झामुमो के भीतर यह धारणा मजबूत हो रही है कि पार्टी को केवल झारखंड तक सीमित क्षेत्रीय दल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
आदिवासी राजनीति, पूर्वी भारत में सामाजिक आधार और संगठनात्मक विस्तार की संभावनाओं को देखते हुए पार्टी नेतृत्व अब राष्ट्रीय विपक्षी राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाना चाहता है।
यही वजह है कि पार्टी अब कांग्रेस के साथ संबंधों में भी संतुलन बनाकर चलना चाहती है ताकि सहयोग बना रहे लेकिन राजनीतिक पहचान सुदृढ़ हो।
झारखंड की राजनीति में भी असर
झामुमो का यह बदला हुआ रुख झारखंड की राजनीति में भी असर डाल सकता है। फिलहाल राज्य में झामुमो और कांग्रेस सत्ता साझेदार हैं और दोनों दल भाजपा के खिलाफ एक साथ खड़े हैं।
लेकिन दूसरे राज्यों में बढ़ती दूरी भविष्य में सीट बंटवारे, नेतृत्व और राजनीतिक प्रभाव को लेकर नए तनाव पैदा कर सकती है। खासकर आगामी चुनावों से पहले दोनों दलों के बीच शक्ति संतुलन का सवाल अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।
झामुमो के इस नए राजनीतिक संकेत ने साफ कर दिया है कि पार्टी अब राष्ट्रीय गठबंधन में केवल सहयोगी की भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि वह अपनी ताकत और जनाधार के आधार पर राजनीतिक फैसले लेने के लिए तैयार है।
असम और बंगाल के घटनाक्रम ने यह संदेश दिया है कि आने वाले समय में झामुमो अपनी शर्तों पर राजनीति करने की दिशा में और आगे बढ़ सकता है।
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