रांची, राज्य ब्यूरो। झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के नए अध्यक्ष के लिए अंतिम तौर पर नामों की सूची लेकर प्रदेश कांग्रेस प्रभारी आरपीएन सिंह आलाकमान को सौंपेंगे और इन्हीं में से किसी एक के नाम पर मुहर लगनी तय है। इसके लिए आरपीएन 19 अगस्त को रांची पहुंच रहे हैं। यहां से 20 अगस्त की शाम वे नई दिल्ली लौटेंगे। इस दौरान तमाम सीनियर नेताओं से वे परामर्श करेंगे। सोनिया गांधी के हाथ में कमान आने से इस बात की संभावना अधिक है कि राज्य में आदिवासी-मुस्लिम फॉर्मूले को कायम रखा जाए।

युवा आदिवासी नेता अथवा किसी मुस्लिम के हाथ में भी पार्टी कमान सौंप सकती हैं। हालांकि पूर्व अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार ने जिन पांच लोगों के खिलाफ आरोप लगाते हुए आलाकमान को अपना इस्तीफा सौंपा था, उन्हीं लोगों का नाम अध्यक्ष पद के लिए आगे चल रहा है। ऐसे में देखना यह है कि अध्यक्ष को लेकर डॉ. अजय कुमार के आरोपों पर पार्टी कितना ध्यान देती है, कितना नहीं?

चर्चा में आगे जिनके नाम, उन पर परिवारवाद के आरोप

सुबोधकांत सहाय, रामेश्वर उरांव, फुरकान अंसारी, ददई दुबे व प्रदीप कुमार बलमुचु ही वे पांच नाम हैं जिनसे भिड़कर पूर्व अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार को इस्तीफा देना पड़ा। इनमें से चार लोगों के नाम प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर चल रहा है। सभी पर परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप पूर्व अध्यक्ष लगा चुके हैं। ऐसे में इनमें से किसी एक का चयन डॉ. अजय के सामने बड़ी मुश्किलें खड़ी कर सकता है। इनके अध्यक्ष रहते डॉ. अजय कुमार पार्टी में उतनी सक्रियता से काम नहीं कर पाएंगे।

...तो पार्टी से विदा भी हो सकते हैं डॉ. अजय

सूत्र बताते हैं कि डॉ. अजय कुमार के आरोपों पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। वहीं दूसरी तरफ जिन लोगों के नाम अध्यक्ष के लिए आगे हैं, उनमें से कोई अध्यक्ष बनता है तो हालात अच्छे नहीं रह जाएंगे। ऐसे में अधिक संभावना है कि डॉ. अजय कुमार पार्टी छोड़ दें। ऐसे भी भाजपा का एक तबका उन्हें पार्टी में शामिल करने के लिए सक्रिय हो चुका है।

झारखंड विकास मोर्चा से अपना राजनीतिक कॅरियर शुरू करनेवाले डॉ. अजय कुमार के बारे में यह धारणा है कि उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें किसी पार्टी में रोककर नहीं रखा जा सकता। जमशेदपुर के तेजतर्रार एसपी के रूप में अपनी पहचान बनाने के बाद उन्होंने त्यागपत्र देकर प्राइवेट कंपनी में काम किया और फिर राजनीति में शामिल हो गए।

सुखदेव-आलमगीर पर कोई विवाद नहीं

सुखदेव भगत और आलमगीर आलम दो ऐसे नाम हैं जिनपर अधिक विवाद नहीं होना है। इसके पूर्व सुखदेव भगत को सोनिया गांधी ने ही अध्यक्ष पद का जिम्मा सौंपा था। वहीं आलमगीर आलम विधायक के तौर पर लोकप्रियता हासिल किए हुए हैं। सूत्र बताते हैं कि इन दोनों के नाम पर फिलहाल कम विवाद हो सकता है। हालांकि सुखदेव भगत के कार्यकाल में भी सुबोधकांत सहाय के गुट ने पूरा विरोध किया था।

विवाद कम हो तो कारगर साबित होगा सुबोधकांत का लंबा अनुभव

राजनीति में सुबोधकांत सहाय का लंबा अनुभव पार्टी के लिए कारगर साबित हो सकता है लेकिन कांग्रेस को यह सुनिश्चित करना होगा कि विवाद कम हो। अब तक कई अध्यक्षों का विरोध कर चुके सुबोधकांत सहाय के खिलाफ पार्टी के कई नेता लगे हुए हैं। सहाय का नाम सामने आते ही विरोधी भी सक्रिय हो जाते हैं।

Posted By: Sujeet Kumar Suman

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