रांची, [विवेक आर्यन]। Terror of Bengal - टेरर ऑफ बंगाल कही जाने वाली जलकुंभी की चपेट में रांची की स्वर्णरेखा नदी भी आ गई है। शहर के भीतर और बाहर नदी में जलकुंभी पूरी तरह भर चुकी है। दूर तक नदी का पानी नजर नहीं आता है। बुधवार को पर्यावरणविद नितिश प्रियदर्शी ने अपने फेसबुक टाइमलाइन पर नदी की तस्वीरों को पोस्ट करते हुए इसकी भयावहता को दर्शाया है। उन्होंने लिखा है कि स्वर्णरेखा को जलकुंभी निगल रही है, पानी में ऑक्सीजन की कमी हो रही है और इससे प्रदूषण स्तर बढ़ता जा रहा है। उन्होंने जलकुंभी के इतिहास को भी बताया है कि यह स्थिति जलीय जीवों के लिए भी खतरनाक है।

जागरण से बात करते हुए नितिश प्रियदर्शी ने कहा कि स्वर्णरेखा की तरह रांची के सभी जलाशयों पर जलकुंभी का प्रकोप है। कांके डैम में भी यह एक खतरनाक स्थिति उत्पन्न कर रही है, जिस ओर सरकार व विभाग का कोई ध्यान नहीं है। उन्होने बताया कि जलकुंभी से जलाशयों का पानी जहरीला हो जाता है और इसका प्रयोग किसी भी हाल में उचित नहीं है। ज्ञात हो कि नदी के किनारे घनी आबादी बसती है जो किसी ना किसी रूप से नदी पर निर्भर है। पर्यावरणविद के अनुसार जलकुंभी वाले पानी में उतरना भी खतरनाक है।

रुक्का में मिलती है स्वर्णरेखा, सात लाख लोगों तक पहुंच रहा दूषित पानी
स्वर्णरेखा नदी शहर के सबसे बड़े जलाशय रुक्का डैम में मिलती है। डैम के पहले नदी पूरी तरह प्रदूषित हो चुकी है। सैटेलाइट तस्वीर में पानी के स्थान पर हरा रंग नजर आ रहा है। यह प्रदूषण की सीमा को दर्शाता है। बता दें कि रुक्का डैम से रांची के सात लाख लोगों को पानी दिया जाता है। इतना प्रदूषित पानी निश्चित तौर पर ही लोगों को नुकसान पहुंचा रहा है। खुद रुक्का डैम भी जलकुंभी के प्रकोप से वंचित नहीं है।

बीमारियों को मिल रही दावत
नदियों पर जलकुंभी का प्रकोप बीमारियों को दावत दे रहा है। पानी का प्रयोग किसी भी रूप में वर्जित है। लेकिन इसके पास रहना भी खतरनाक है। दुर्गध के कारण लोगों को परेशानी है। यदि किसी कारण से नदी में लोग जाते हैं तब भी उन्हें कई तरह के चर्म रोग हो सकते हैं। जलकुंभी पानी के बहाव को भी रोकता है। पानी के जमने से जलकुंभी सड़ने लगती है।

दस दिनों में दुगना हो जाएगा जलकुंभी का क्षेत्रफल
जलकुंभी की सबसे बड़ी परेशानी है इसका विस्तार। यह इतनी तेजी से फैलता है कि इसे नियंत्रित करना मुश्किल है। यदि जल्द ही सफाई के लिए कोई प्रयास नहीं किया तो महज दस दिनों में यह दुगने क्षेत्रफल में फैल चुका होगा। कहना गलत नहीं है कि इतने दिनों में स्वर्णरेखा में केवल जलकुंभी दिखेगी, पानी नहीं। इसका असर सहायक नदियों पर भी पड़ेगा।

सबसे पहले नदियों के उद्गम स्थल को बचाने का प्रयास किया जाना चाहिए। इसके अलावा सभी जलाशयों को प्रदूषण से मुक्त करने का प्रयास किया जाना चाहिए। यदि आज इस स्थिति पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले दिनों में रांची में शुद्ध पेयजल मिलना बेहद मुश्किल हो जाएगा। नितिश प्रियदर्शी, पर्यावरणविद।

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