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खनिज कानून संशोधन विधेयक का झारखंड में कड़ा विरोध, मंत्रियों ने कहा- राज्य को कमजोर करने की साजिश

Published: Thu, 13 Aug 2026 06:57 PM (IST)Updated: Thu, 13 Aug 2026 07:19 PM (IST)

ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह और कांग्रेस विधायक प्रदीप यादव ने खनिज वहन भूमि उपकर संशोधन विधेयक 2026 का ...और पढ़ें

ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने प्रस्तावित संशोधन पर तीखा हमला बोला।

ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने प्रस्तावित संशोधन पर तीखा हमला बोला।

HighLights

  1. खनिज वहन भूमि उपकर संशोधन विधेयक का विरोध।

  2. राज्यों के वित्तीय अधिकारों को कमजोर करने की साजिश।

  3. झारखंड के राजस्व व कल्याणकारी योजनाओं पर असर।

राज्य ब्यूरो, रांची। ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने खनिज वहन भूमि उपकर (जेएमबीएल सेस) को लेकर प्रस्तावित संशोधन विधेयक 2026 को राज्यों के अधिकार को खत्म करने की साजिश करार दिया है। उन्होंने कहा है कि इस संशोधन से झारखंड जैसे राज्य खनिज युक्त भूमि पर किसी प्रकार का कर, उपकर या अन्य लेवी केंद्र सरकार के निर्धारित शर्तों के बिना नहीं लगा सकेंगी।

ये राज्यों के वित्तीय क्षमता को कम करने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है। मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि झारखंड जैसे राज्य जिसके गर्भ में प्रचुर खनिज संपदा मौजूद है, ऐसे में प्रदेश के राजस्व पर केंद्र सरकार की ओर से लगाम लगाना कहीं से भी जायज नहीं है।

खनिज वहन भूमि उपकर कोई नई रायल्टी नहीं है और ना ही यह खनिज उत्पादन पर लगाया गया अतिरिक्त शुल्क है। यह उस भूमि पर लगाया गया उपकर है जिसके भीतर खनिज मौजूद है और जिनका खनन किया जा रहा है।

दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि जुलाई 2024 में सर्वोच्च न्यायालय में नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ मिनरल एरिया डेवलपमेंट आथोरिटी बनाम स्टील आथॉरिटी आफ इंडिया लिमिटेड मामले में निर्णय दे चुकी है।

इस निर्णय के बाद झारखंड विधानसभा ने झारखंड मिनरल बेयरिंग के लैंड सेस अधिनियम 2024 पारित किया था। कांग्रेस और गठबंधन सरकार केंद्र के इस संशोधन विधेयक पर हर स्तर पर विरोध करेगी।

झारखंड के लिए काला विधेयक, 20 हजार करोड़ का नुकसान संभव: किशोर

केंद्र सरकार की ओर से पेश नए विधेयक से राज्य सरकार को तत्काल 15-20 हजार करोड़ रुपये का नुकसान होगा। जानकारी देते हुए वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि यह झारखंड की जनता के लिए काला विधेयक है।

केंद्र सरकार का रवैया तानाशाही पूर्ण तो था ही, अब जानबूझकर कुछ राज्यों को नुकसान पहुंचाने की कार्रवाई की जा रही है। वित्त विभाग पहले ही जीएसटी रेशनलाइजेशन से हुए नुकसान की भरपाई के रास्ते खोज रहा है। ऐसे में सरकार की ओर से हुए प्रयासों को केंद्र सरकार की ओर से कुचलने की कोशिश की जा रही है।

खनिज कानून में संशोधन से राज्य के हितों पर हमला: प्रदीप यादव

विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने केंद्र की मोदी सरकार द्वारा लोकसभा में पारित ‘खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026’ को राज्य के अधिकारों और वित्तीय संघीय ढांचे पर सीधा हमला बताते हुए इसे काला कानून करार दिया है।

केंद्र सरकार राज्यों के संवैधानिक एवं वित्तीय अधिकारों को कमजोर कर उन्हें उनके वाजिब हक से वंचित करने का प्रयास कर रही है। प्रदीप यादव ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के फैसले के बाद राज्यों को खनिज संसाधनों पर अतिरिक्त सेस लगाने का जो अधिकार प्राप्त हुआ था, केंद्र सरकार उसी अधिकार को छीनने के लिए यह संशोधन लेकर आई है।

यह कदम सहकारी संघवाद की भावना के खिलाफ है और राज्यों की आर्थिक स्वायत्तता पर गंभीर प्रहार है। इस कानून का झारखंड पर गहरा और प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि राज्य की अर्थव्यवस्था में खनिज संसाधनों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने कहा कि झारखंड में गरीबों, महिलाओं, किसानों और जरूरतमंदों के हित में अनेक कल्याणकारी योजनाएं संचालित हो रही हैं। मंइयां सम्मान योजना जैसी योजनाओं पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

यह सिर्फ राज्य सरकार के अधिकारों का सवाल नहीं है, बल्कि 50 लाख से अधिक महिलाओं के सम्मान, अधिकार और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा विषय है।

झारखंड की जनता अपने जल, जंगल, जमीन और खनिज संपदा पर अपने अधिकारों की लड़ाई को कमजोर नहीं होने देगी। प्रदीप यादव ने कहा कि केंद्र सरकार को राजनीतिक दुर्भावना से ऊपर उठकर राज्यों के संवैधानिक अधिकारों का सम्मान करना चाहिए।

विधेयक के माध्यम से संघीय ढांचे पर हमला : केशव

झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने लोकसभा में पेश किए विधेयक को संघीय ढांचे को कमजोर करनेवाला करार दिया है। यह कदम खनिज संपदा को कारपोरेट घरानों के हित में इस्तेमाल करने की दिशा में उठाया गया कदम है।

कमलेश ने कहा कि खनिज संपदा जिस राज्य की जमीन से निकलती है, उस राज्य और वहां के लोगों का उसके लाभ पर पहला अधिकार होना चाहिए। केंद्र सरकार राज्यों के अधिकारों को सीमित कर अपने हाथों में अधिक शक्तियां केंद्रित करना चाहती है, जो संविधान की संघीय भावना पर सीधा हमला है।

कमलेश ने नीलामी प्रक्रिया और राजस्व व्यवस्था में बदलाव पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि पारदर्शिता कम करने वाली किसी भी व्यवस्था से राज्यों के राजस्व हित प्रभावित हो सकते हैं। केंद्र सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इस विधेयक से राज्यों को क्या वास्तविक लाभ मिलेगा और खनिज संपदा से प्राप्त होने वाले राजस्व में राज्यों तथा स्थानीय समुदायों का उचित हिस्सा कैसे सुनिश्चित होगा।

उन्होंने कहा कि सरकार क्रिटिकल मिनरल्स, रोजगार और आत्मनिर्भरता की बात कर रही है, लेकिन आत्मनिर्भर भारत का मतलब राज्यों के अधिकार छीनना और प्राकृतिक संसाधनों का लाभ बड़े कॉरपोरेट घरानों को देना नहीं हो सकता। विकास ऐसा होना चाहिए जिसमें राज्य मजबूत हों, स्थानीय लोगों के अधिकार सुरक्षित हों और पर्यावरण की रक्षा हो।