रांची, प्रदीप शुक्ला। बारी-बारी सबका नंबर आएगा..। साइबर ठगी के लिए देशभर में बदनाम जामताड़ा पर बनी वेब सीरीज का यह डायलाग लगभग सभी को याद होगा..सबका नंबर आएगा। खनन, उच्च स्तर पर अफसरों की ट्रांसफर-पोस्टिंग सहित तमाम नीतिगत फैसलों में दलालों की दखलंदाजी के नित नए हो रहे पर्दाफाश से रांची में फिर यह डायलाग दोहराया जा रहा है। सत्ता से सांठगांठ कर विभिन्न तरीकों से भ्रष्टाचार में लिप्त नौकरशाह, नेता और दलाल, सभी का बारी-बारी से नंबर आएगा। ईडी कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए धीरे-धीरे सत्ता के शीर्ष में बैठे व्यक्तियों तक पहुंचती दिख रही है।

मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव के रिश्तेदार से लेकर कुछ ऐसे कारोबारी दलाल ईडी के शिकंजे में आ चुके हैं जिनके सामने राज्य की नौकरशाही दुम हिलाती रही है। उनसे बरामद डिजिटल डिवाइसों, दस्तावेजों में छिपे राज को लेकर हर कोई हलकान दिख रहा है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि झारखंड के गठन के बाद से अब तक का यह सबसे बड़ा घोटाला साबित होगा। राज्य की जनता बड़ी उम्मीद से जांच एजेंसियों पर नजर गड़ाए हुए है। शायद इस बार तमाम बड़ी मछलियां जेल की सलाखों तक पहुंच जाएं।

झारखंड एक दशक बाद फिर से भ्रष्टाचार के काले कारनामे को लेकर चर्चा में है। इससे पहले निर्दलीय मधु कोड़ा के मुख्यमंत्रित्व काल में हुई बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितता के कारण राज्य की छवि खराब हुई थी। इस बीच हालिया प्रकरण के तहत ईडी ने राज्य की एक चर्चित आइएएस अधिकारी पूजा सिंघल और उनके करीबियों के 25 ठिकानों पर छापेमारी की। यह एक ऐसा सिंडिकेट है जो काले धन के निवेश से लेकर राज्य के पूरे तंत्र को अपने आर्थिक तंत्र के जरिये नियंत्रित करता था। यहां अधिकारी पंगु और निवेशक की भूमिका में हैं और सत्ता के इर्द-गिर्द दलालों का प्रभुत्व है, जो तमाम नीतिगत फैसलों से लेकर खनन, उच्च स्तर पर अफसरों-इंजीनियरों की ट्रांसफर-पोस्टिंग में जमकर दखलंदाजी करते थे। मुखौटा कंपनियों के माध्यम से इसके तार हवाला के जरिये पैसों के हस्तांतरण से भी जुड़ा है।

पूजा सिंघल और खनन पदाधिकारियों से पूछताछ के बाद उनकी निशानदेही पर सत्ता शीर्ष के करीबी रहे रवि केजरीवाल, विशाल चौधरी, निशिथ केसरी, प्रेम प्रकाश आदि तक जांच की आंच पहुंच चुकी है। केजरीवाल उन मुखौटा कंपनियों की देखरेख करता था, जिसमें सत्ता में बैठे प्रभावी लोगों की साङोदारी है। वह कभी सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा का कोषाध्यक्ष हुआ करता था। अंदरूनी मतभेद के कारण उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। निशिथ केसरी मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव आइएएस अधिकारी राजीव अरुण एक्का का करीबी रिश्तेदार है। ईडी का ताजा शिकार प्रेम प्रकाश है। वह बड़ी मछली है और आश्चर्यजनक तौर पर हर शासन में प्रभावी भूमिका में रहा है।

ईडी की सतत छापेमारी ने राज्य के पूरे तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। जो खनिज संपदा राज्य के लिए वरदान है, उसे किस प्रकार से अधिकारियों, सत्ताधीशों और दलालों के नेटवर्क ने दोनों हाथों से लूटा है, उसकी यह एक बानगी है। अगर इसकी कड़ी दर कड़ी जुड़ी तो यह चारा घोटाले से भी बड़ा घोटाला साबित हो सकता है, जिसके घेरे में दर्जनों भ्रष्ट नेता, नौकरशाह व दलाल आ सकते हैं। इससे राज्य सरकार का भी संकट बढ़ा है। खुद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का पूरा कुनबा आरोपों के घेरे में है। उन पर आरोप है कि उन्होंने पद पर रहते हुए पत्थर खनन पट्टा लिया। भाजपा ने जब इसकी शिकायत राज्यपाल से करते हुए उन्हें अयोग्य ठहराने की मांग उठाई तो मामला आगे बढ़ा।

भारत निर्वाचन आयोग से उनसे जवाब मांगा है, जिसके उत्तर में उन्होंने कहा है कि उनके पास कोई खनन पट्टा नहीं है। वे इसे पूर्व में सरेंडर कर चुके हैं। सोरेन इस मामले में जन प्रतिनिधित्व कानून के दायरे में आ सकते हैं। उनपर पद के दुरुपयोग का आरोप है। उनकी पत्नी पर रांची से सटे औद्योगिक क्षेत्र में जमीन लेने का आरोप भी उन्हें असहज कर रहा है। उनके भाई विधायक बसंत सोरेन भी खनन कंपनी चलाने के आरोपों में निर्वाचन आयोग को जवाब भेज चुके हैं। बसंत सोरेन को 30 मई और हेमंत सोरेन को 31 मई को व्यक्तिगत तौर पर अथवा अपने वकील के माध्यम से भारत निर्वाचन आयोग ने तलब किया है। इसके अलावा खनन पट्टा और मुखौटा कंपनियों को लेकर झारखंड हाई कोर्ट में भी एक याचिका पर सुनवाई चल रही है। राज्य राजनीतिक अस्थिरता की ओर बढ़ता दिख रहा है। हालांकि इस परिस्थिति के लिए सर्वाधिक जिम्मेदारी सत्ता शीर्ष पर बैठे लोग हैं, जिन्होंने भ्रष्ट प्रवृत्तियों को बढ़ावा दिया।

[स्थानीय संपादक, झारखंड]

Edited By: Sanjay Pokhriyal