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झारखंड में सॉफ्टवेयर का अजब खेल: 'मुंडा' को बना दिया धोबी, दाखिल-खारिज के लिए भटक रहे लोग

Published: Thu, 15 Oct 2026 08:52 PM (IST)

झारखंड में राजस्व विभाग का ऑनलाइन दाखिल-खारिज सॉफ्टवेयर लोगों के लिए परेशानी का सबब बन गया है। सॉफ्टवेयर की तकनीकी ...और पढ़ें

झारखंड में राजस्व विभाग का ऑनलाइन दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) सॉफ्टवेयर आम जनता के लिए मुसीबत बन गया है।

झारखंड में राजस्व विभाग का ऑनलाइन दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) सॉफ्टवेयर आम जनता के लिए मुसीबत बन गया है।

HighLights

  1. ऑनलाइन दाखिल-खारिज सॉफ्टवेयर से जनता परेशान।

  2. त्रुटि सुधार का विकल्प न होने से मामले लंबित।

राज्य ब्यूरो, रांची। पूरी दुनिया में कंप्यूटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक लोगों के काम को आसान बना रही है, लेकिन झारखंड में राजस्व विभाग का ऑनलाइन दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) सॉफ्टवेयर आम जनता के लिए मुसीबत बन गया है। 
 
स्थिति यह है कि न सिर्फ म्यूटेशन के मामले लटक रहे हैं, बल्कि सॉफ्टवेयर की तकनीकी खामियों के कारण जाति तक बदल जा रही है।
 
राजधानी रांची के चंदाघासी निवासी कैलाश मुंडा (एसटी) का ताजा मामला इसका जीवंत उदाहरण है, जहां सॉफ्टवेयर ने उन्हें अनुसूचित जनजाति के बजाय अनुसूचित जाति (धोबी) मान लिया है। 
 
सामान्य समझ है कि नाम के आगे 'मुंडा' उपनाम वाले लोग आदिवासी होते हैं, लेकिन यह सॉफ्टवेयर इस बात को समझने में विफल साबित हो रहा है। परिणाम यह है कि कोई भी अंचल अधिकारी इस तरह के मामलों में म्यूटेशन करने को तैयार नहीं है।
 
देशभर में एनजीडीआरएस (नेशनल जेनरिक डॉक्यूमेंट रजिस्ट्रेशन सिस्टम) के तहत निबंधन होते ही इसकी सूचना सीधे अंचल कार्यालय पहुंच जाती है और ऑनलाइन दाखिल-खारिज की प्रक्रिया शुरू होती है। 
 
लेकिन झारखंड में इस प्रक्रिया में बड़ी खामी सामने आ रही है। इस सॉफ्टवेयर की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें ऑनलाइन आवेदन में सुधार (एडिट) करने के तमाम विकल्प पूरी तरह समाप्त कर दिए गए हैं।
 
नतीजा यह है कि राजस्व कर्मचारी से लेकर अंचल अधिकारी (CO) तक किसी भी स्तर पर त्रुटियों को सुधारने में असमर्थ हैं। इस तकनीकी पेचीदगी के कारण सैकड़ों आवेदन या तो अंचलों में लंबित पड़े हैं या फिर रद्द (रिजेक्ट) हो रहे हैं। 
 
आवेदन रिजेक्ट होने पर लोगों को पूरी प्रक्रिया दोबारा शुरू करनी पड़ती है। इस गंभीर समस्या को लेकर विभिन्न स्तरों से शिकायतें दर्ज कराई जा चुकी हैं और मामला अब राज्य मुख्यालय तक पहुंच गया है, लेकिन समाधान न मिलने से आवेदक और अधिकारी दोनों खासे परेशान हैं।