विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

झारखंड में मानसून का आगमन जल्द, IMD ने जारी किया भारी बारिश और वज्रपात का अलर्ट; किसानों के लिए खुशखबरी

Published: Thu, 11 Jun 2026 04:40 AM (IST)

झारखंड में 15 से 18 जून के बीच मानसून के प्रवेश की संभावना है, जिससे इस बार अच्छी वर्षा की ...और पढ़ें

झारखंड का मौसम। एआई फोटो

झारखंड का मौसम। एआई फोटो

HighLights

  1. झारखंड में 15-18 जून तक मानसून प्रवेश की संभावना।

  2. समय से पूर्व प्री-मानसून वर्षा, कृषि के लिए अनुकूल।

  3. पिछले दो वर्षों से मानसून की अच्छी वर्षा दर्ज।

कुमार गौरव, रांची। राजधानी रांची समेत पूरे राज्य में प्री-मानसून के दौरान हल्की व मध्यम दर्जे की वर्षा हुई है तो दूसरी ओर मौसम विज्ञान केंद्र रांची ने अलर्ट जारी करते हुए बताया कि 15 से 18 जून तक राज्य के उत्तर पूर्वी क्षेत्र से मानसून झारखंड में प्रवेश करेगा।

जारी एडवाइजरी में बताया गया है कि वर्तमान में मानसून के ससमय आने की सभी परिस्थितियां अनुकूल बनी हुईं हैं। राजधानी रांची समेत आसपास के जिलों में लगातार छिटपुट वर्षापात हो रहा है। झारखंड में मानसून के आगमन की सामान्य तिथि 10 से 12 जून है।

राज्य के अधिकांश हिस्सों में मेघगर्जन के साथ 40 से 50 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से तेज हवा बहने और आकाशीय बिजली गिरने को ले अलर्ट भी जारी किए जा रहे हैं।

इन संभावनाओं के बीच बताया गया कि दक्षिण-पश्चिम मानसून केरल में दस्तक दे चुका है। दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य तिथि से 8 दिन पूर्व केरल में दस्तक दे चुका है।

मौसम विज्ञानी अभिषेक आनंद की माने तो वर्ष 2009 के बाद यह केरल में मानसून के आगमन की सबसे प्रारंभिक तिथि है, जब यह 23 मई 2009 को केरल में दस्तक दिया था।

वर्ष 1975 से प्रारंभ तिथियों पर विचार करते हुए केरल में मानसून का सबसे प्रारंभिक आगमन 1990 (19 मई, 1990) में हुआ था, जो सामान्य प्रारंभ तिथि से 13 दिन पहले था।

इन परिस्थितियों के बीच झारखंड में भी मानसून समय से पूर्व यानी चार दिन पूर्व प्रवेश करेगा। अभिषेक आनंद ने बताया कि इस बार झारखंड सहित कई मध्यवर्ती राज्यों में प्री-मानसून की वर्षा भी समय से पूर्व हो रही है।

इसलिए मानसून के समय से पूर्व आने की सभी परिस्थितियां अनुकूल बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि 15 से 18 जून तक मानसून झारखंड में दस्तक दे सकता है और अबकी बार झारखंड में मानसून अच्छा रहने वाला है। वहीं कृषि विज्ञानी कहते हैं कि यदि समय से पूर्व मानसून का प्रवेश होता है और अच्छी वर्षा होती है तो किसानी को भी बल मिलेगा।

झारखंड में 80 प्रतिशत से अधिक खेती मानसून पर है निर्भर

झारखंड में 80 प्रतिशत से अधिक खेती मानसून पर ही निर्भर है। यदि मानसून के दौरान अच्छी वर्षा न हो, तो कई क्षेत्रों में पेयजल संकट की भी स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

मौसम विज्ञान केंद्र रांची की ओर से जारी रिपोर्ट में इस वर्ष अच्छी वर्षा होनेे के संकेत दिए गए हैं, लेकिन राज्य में पिछले 10 वर्षों के दौरान वर्षा के जो आंकड़े है, उससे साफ हो जाता है कि इस दौरान किसी भी वर्ष सामान्य वर्षापात नहीं हुए।

हर वर्ष सामान्य से कम वर्षा रिकॉर्ड की गई। हालांकि 2013 में सामान्य वर्षा का जो आंकड़ा था, उसे पांच-पांच के अंतराल के बाद कम किया जाता रहा लेकिन उसके बावजूद सामान्य वर्षा के आंकड़े को छू पाने में सफलता नहीं मिली।

आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2013 में 1091.9 मिमी सामान्य वर्षा का अनुमान था लेकिन 844.9 मिमी वर्षा हुई। वर्ष 2014 में 930.3, 2015 में 951.9, 2016 में 1101.6, 2017 में 988.1 मिमी वर्षा रिकॉर्ड की गई। जिसके बाद मौसम विभाग की ओर से राज्य में सामान्य वर्षा का अनुमान कम कर 1055.7 मिमी कर दिया गया, लेकिन वर्ष 2018 में 785 मिमी वर्षा हुई।

इसके बाद वर्ष 2019 में 858.9, 2020 में 902.4, 2021 में 1041.5 मिमी वर्षा रिकॉर्ड की गई। पांच वर्ष के बाद राज्य में एक बार फिर सामान्य वर्षा का अनुमान और कम कर 1022.9 मिमी कर दिया गया लेकिन वर्ष 2022 में सिर्फ 817.6 मिमी वर्षा हुई।

वर्ष 2023 में सामान्य से 27 प्रतिशत कम वर्षा हुई और राज्य में 1022.9 मिमी सामान्य वर्षा की जगह 751.6 मिमी वर्षा हुई। वहीं, वर्ष 2024 में मानसून सामान्य रहा था। एक जून से लेकर 30 सितंबर तक राज्य में 1011.6 मिमी वर्षा हुई थी। यह मानसून के दौरान होने वाली सामान्य वर्षा से एक प्रतिशत ही कम थी।

वर्ष 2025 में मानसून 17 जून को सामान्य से पांच दिनों की देरी से प्रवेश किया था। देरी के बावजूद पिछले वर्ष मानसून के दौरान अच्छी वर्षा हुई थी और विशेष रूप से जून माह में 348.9 मिमी वर्षापात हुआ था जो दीर्घकालिक औसत से 84 प्रतिशत अधिक रहा।

ये है मानसून के आगमन के संकेत

मौसम विभाग की ओर से मानसून के आगमन की घोषणा कई बदलाव को ध्यान में रख कर की जाती है। इसके अनुसार मानसून का आगमन तभी घोषित होगा, जब दो दिन में कम से कम 2.5 मिमी वर्षा रिकॉर्ड की जाती है।

पश्चिमी हवा का प्रभाव नहीं के बराबर होना चाहिए। निचले स्तर पर बादल की प्रमुखता होनी चाहिए। हालांकि, इससे पहले मार्च से जून के पहले सप्ताह के बीच प्री-मानसून वर्षा होती है।

कैसे होती है मानूसन की उत्पत्ति?

गर्मी के मौसम में जब हिंद महासागर में सूर्य की किरणें विषुवत रेखा के ठीक ऊपर होती है, तो मानसून का निर्माण की प्रक्रिया शुरू होती है। इस प्रक्रिया में समुद्र की सतह गर्म होने लगती है। उसका तापमान 30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है।

इस दौरान धरती का तापमान 45 से 46 डिग्री तक पहुंच जाता है। ऐसी स्थिति में हिंद महासागर के दक्षिणी हिस्से में मानसूनी हवाएं सक्रिय हो जातीं हैं। ये हवाएं एक-दूसरे को आपस में काटते हुए विषुवत रेखा पार कर एशिया की ओर बढ़ने लगती है।

इसी दौरान समुद्र के ऊपर बादलों के बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। विषुवत रेखा पार कर ये हवाएं और बादल वर्षा करते हुए बंगाल की खाड़ी और अरब सागर की ओर बढ़ते हैं। जिस कारण देश भर में वर्षा होती है।