'जब एजेंसी ही बिक गई, तो दागी कैसे छांटें?', JPSC-CGL परीक्षा रद करने पर झारखंड सरकार की हाई कोर्ट में दो टूक
सरकार ने झारखंड हाई कोर्ट में जेपीएससी सहित 4 परीक्षाएं रद करने के फैसले को संवैधानिक और जनहित में बताया है, क्योंकि पूरी परीक्षा प्रणाली पर सिंडिकेट का कब्जा था।

जेपीएससी परीक्षा रद: सरकार का दावा, सिंडिकेट ने पूरी प्रणाली पर किया था कब्जा
HighLights
सरकार ने परीक्षा रद्द करने को संवैधानिक और जनहित में बताया।
सीआईडी जांच में बड़े पैमाने पर धांधली और सिंडिकेट का खुलासा।
पदों की बिक्री, उत्तर रटाने के कैंप, ओएमआर शीट में हेरफेर।
राज्य ब्यूरो, रांची। जेपीएससी, सीजीएल सहित 4 परीक्षाएं रद करने के मामले में हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से शपथ पत्र दाखिल किया गया है। राज्य सरकार ने कैबिनेट द्वारा 18 अगस्त 2026 को परीक्षा रद करने के फैसले को पूरी तरह संवैधानिक और जनहित में बताया है।
सरकार का कहना है कि जब परीक्षा की कस्टडी रखने वाली एजेंसी ही बिक चुकी हो, तो उसमें से दागी और बेदाग अभ्यर्थियों को अलग करना नामुमकिन है।
सर्वोच्च न्यायालय के वंशिका यादव और सचिन कुमार के मामलों का हवाला देते हुए सरकार ने दलील दी कि व्यापक स्तर पर धांधली होने पर पूरी परीक्षा रद करना ही एकमात्र संवैधानिक विकल्प है, ताकि लाखों ईमानदार अभ्यर्थियों के साथ न्याय हो सके।
सरकार की ओर से अदालत को बताया कि यह केवल कुछ अभ्यर्थियों की गड़बड़ी नहीं, बल्कि पूरी परीक्षा प्रणाली पर सिंडिकेट द्वारा कब्जा किए जाने का मामला है।
नेपाल, आसनसोल और बिहार में लगाए गए थे रटने के कैंप
सीआईडी जांच के मुताबिक, परीक्षा से ठीक पहले अभ्यर्थियों को संगठित रूप से उत्तर रटाने के लिए विशेष कैंप लगाए गए थे। जांच में सामने आया कि 28 अभ्यर्थियों को नेपाल के बीरगंज ले जाकर उत्तर रटवाए गए थे, जिनमें से 10 अभ्यर्थी सफल भी घोषित हो गए थे।
हलफनामे की मुख्य बातें
- इसके अलावा बिहार, कोलकाता, आसनसोल, झरिया और बोकारो में भी बड़े पैमाने पर अभ्यर्थियों को इकट्ठा कर उत्तर याद कराने के प्रमाण मिले हैं।
- मामले में अब तक 28 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और 265 सफल अभ्यर्थी जांच के घेरे में हैं, जिन्हें नोटिस जारी किए गए हैं।
- हलफनामे में जांच का हवाला देते हुए कहा गया है कि डिप्टी कलेक्टर और अन्य संबद्ध सेवाओं के पदों को 50 लाख से लेकर एक करोड़ तक में बेचा गया। ऐसी स्थिति में बड़े पैमाने पर धांधली के कारण योग्य और अयोग्य अभ्यर्थियों को अलग करना तकनीकी और व्यावहारिक रूप से असंभव है।
- मुख्य परीक्षा के डेटा प्रोसेसिंग, मेरिट लिस्ट, इंटरव्यू और अंतिम परिणाम का जिम्मा नियमों को ताक पर रखकर नामिनेशन बेसिस पर मेसर्स टीएसआर डेटा प्रोसेसिंग प्रा. लि. (टीडीपीएल) को दे दिया गया।
- सीआईडी की जांच में सामने आया कि ओएमआर शीट को बिना सील किए रखा गया था, क्लाउड सर्वर में बदलाव किए जा सकते थे और आन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम से छेड़छाड़ कर लिखित परीक्षा के अंक बढ़ाए गए। इतना ही नहीं, इंटरव्यू में मनचाहे नंबर दिलाने के लिए अभ्यर्थियों की डिकोडिंग की गई और वाट्सएप पर आंसर-की भेजी गई।
- इस मामले में सीआईडी ने आयोग के तत्कालीन चेयरमैन, परीक्षा नियंत्रक, टीडीपीएल के निदेशकों सहित कई लोगों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा जा चुका है। हलफनामे में यह भी उल्लेख है कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद तत्कालीन चेयरमैन द्वारा डिजिटल साक्ष्य मिटाने के उद्देश्य से लैपटाप तक नष्ट कर दिया गया था।
- याचिकाकर्ताओं की इस दलील पर कि उन्हें बिना कारण बताओ नोटिस दिए अचानक सेवा से हटाया गया। सरकार ने कहा कि जब पूरी परीक्षा प्रक्रिया ही भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी हो, तो व्यक्तिगत नोटिस देना न तो अनिवार्य है और न ही संभव। परीक्षा में चयन या 27 नवंबर 2025 को जारी नियुक्ति पत्र किसी भी अभ्यर्थी को अवैध प्रक्रिया पर बने रहने का असीमित अधिकार प्रदान नहीं करता।
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