रांची, राज्य ब्यूरो। झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस एसएन प्रसाद और जस्टिस रत्नाकर भेंगरा की अदालत में धुर्वा स्थित नए हाई कोर्ट भवन के निर्माण को लेकर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने नए भवन में कार्य की गति को लेकर नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि सरकार को जल्द से जल्द काम पूरा करने को कहा है। लेकिन अभी भी काम धीमी गति से हो रहा है। पिछली बार से अभी तक सिर्फ पांच प्रतिशत ही काम अधिक हो पाया है। इस दौरान अदालत ने पूछा कि जब इस मामले की जांच एसीबी कर रही है, तो फिर एक सदस्यीय जांच आयोग का गठन क्यों किया गया है। इस पर राज्य सरकार को जवाब देना है। साथ ही अदालत ने हाई कोर्ट के निर्माण को लेकर भी प्रगति रिपोर्ट अदालत में पेश करने का निर्देश दिया है। मामले में अगली सुनवाई 15 जुलाई को होगी। बता दें कि इस संबंध में अधिवक्ता राजीव कुमार ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि हाई कोर्ट के नए भवन निर्माण में वित्तीय अनियमितता की गई है। अदालत से इस मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराए जाने की मांग की गई है।

वरीयता पर आदेश का पालन नहीं, तो हाजिर होंगे मुख्य सचिव

उधर, झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस एसके द्विवेदी की अदालत में बिहार से राज्य कैडर आवंटन के बाद वरीयता निर्धारण को लेकर दाखिल अवमानना याचिका पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अगर दो सप्ताह में कोर्ट के आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है, तो अगली सुनवाई के दौरान मुख्य सचिव और कार्मिक सचिव अदालत में हाजिर होंगे। इस संबंध में संजय कुमार व अन्य की ओर से हाई कोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की है। प्रार्थियों के अधिवक्ता विकास कुमार ने बताया कि वर्ष 2000 में झारखंड राज्य बनने के बाद बिहार के कई सचिवालय कर्मियों ने अपना कैडर झारखंड आवंटित कराया था। उसके बाद उनकी ओर से वरीयता निर्धारित करने के लिए अदालत में याचिका दाखिल की गई। सुनवाई के बाद अदालत ने अक्टूबर 2020 में इस मामले में राज्य सरकार को निर्णय लेने का निर्देश दिया था। लेकिन सरकार की ओर से कहा गया कि इस तरह का ही एक मामला सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए लंबित है। इसलिए सचिवालय कर्मियों की वरीयता सूची को लेकर अभी कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता हैं। सुनवाई के दौरान प्रार्थी की ओर से सरकार की कार्यवाही को अदालत के समक्ष बताया गया। इस पर अदालत ने नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि अगर दो सप्ताह में राज्य सरकार की ओर से इस संबंध में निर्णय नहीं लिया जाता है, तो उनके राज्य के मुख्य सचिव और कार्मिक सचिव को अदालत में हाजिर होकर जवाब देना होगा।

Edited By: M Ekhlaque