झारखंड हाईकोर्ट का फैसला: पटमदा सामूहिक दुष्कर्म मामले में चारों दोषियों की अपील खारिज, 20 साल की सजा बरकरार
झारखंड हाईकोर्ट ने पटमदा सामूहिक दुष्कर्म मामले में निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए चारों दोषियों की 20 साल की सजा को सही ठहराया है।

जमशेदपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए 23 अगस्त 2018 को चारों अभियुक्तों को दोषी करार दिया था।
HighLights
पटमदा सामूहिक दुष्कर्म मामले में हाईकोर्ट ने सजा बरकरार रखी।
पीड़िता की विश्वसनीय गवाही को मेडिकल रिपोर्ट से ऊपर माना।
राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पूर्वी सिंहभूम के पटमदा थाना क्षेत्र से जुड़े चर्चित सामूहिक दुष्कर्म मामले में निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह बरकरार रखा है।
जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस पीके श्रीवास्तव की अदालत ने चारों दोषियों की अपील को खारिज करते हुए उन्हें दी गई 20-20 साल के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा को सही ठहराया है।
अदालत ने अपने अहम फैसले में स्पष्ट किया कि केवल मेडिकल जांच में शुक्राणु (स्पर्म) न मिलने या चिकित्सीय रिपोर्ट की कमियों के आधार पर पीड़िता की विश्वसनीय गवाही को नकारा नहीं जा सकता।
खंडपीठ ने कहा कि पीड़िता का बयान पूरी तरह भरोसेमंद है और उसके शरीर व पीठ पर मिले चोट तथा खरोंच के निशान इस वीभत्स घटना की सत्यता को पूरी तरह प्रमाणित करते हैं।
इसके साथ ही, अदालत ने हेमंत सिंह को जेल में ही रहने का निर्देश दिया है, जबकि अन्य दोषी रामनाथ सिंह, विभीषण सिंह और फागु हांसदा को दो महीने के भीतर अदालत में आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है।
क्या था पूरा मामला?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह घटना 5 नवंबर 2013 की है। पीड़िता अपनी ससुराल से मायके जा रही थी। दोपहर करीब तीन बजे जब वह लपित छेंचा जंगल के पास पहुंची, तो जेरका गांव निवासी हेमंत सिंह, रामनाथ सिंह, विभीषण सिंह और फागु हांसदा ने उसे जबरन दबोच लिया।
इसके बाद अभियुक्त उसे खींचकर जंगल में ले गए और बारी-बारी से सामूहिक दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया। किसी आहट के बाद वे मौके से फरार हो गए।
घटना के बाद स्थानीय स्तर पर पंचायत बैठाकर मामले को सुलझाने का प्रयास किया गया, लेकिन आरोपियों के भागने के कारण बात नहीं बनी। अंततः घटना के तीन दिन बाद, 8 नवंबर 2013 को पटमदा थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई।
निचली अदालत का फैसला और हाईकोर्ट की टिप्पणी
जमशेदपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए 23 अगस्त 2018 को चारों अभियुक्तों को दोषी करार दिया था। इसके बाद 29 अगस्त 2018 को प्रत्येक को 20 साल के कठोर कारावास और 40-40 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी।
जिसे दोषियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के आदेशों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़िता की निष्पक्ष और ठोस गवाही ही सजा के लिए पर्याप्त है।
अदालत ने माना कि ग्रामीण परिवेश से जुड़ी होने और पहले सामाजिक स्तर पर पंचायत के माध्यम से न्याय पाने के प्रयास के कारण प्राथमिकी दर्ज कराने में तीन दिन का विलंब हुआ, जो इस परिस्थिति में पूरी तरह स्वाभाविक है।
