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बिना मां का पक्ष सुने अदालत नहीं सुना सकती फैसला, बच्ची की कस्टडी पर फैमिली कोर्ट का आदेश झारखंड HC से निरस्त

Published: Wed, 09 Sep 2026 08:30 PM (GMT+05:30)

झारखंड हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के बच्ची की कस्टडी के एकतरफा आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने ...और पढ़ें

सुनवाई के दौरान बच्चे की भलाई के बारे में सोचना अनिवार्य।

सुनवाई के दौरान बच्चे की भलाई के बारे में सोचना अनिवार्य।

HighLights

  1. फैमिली कोर्ट का बच्ची की कस्टडी का आदेश रद्द।

  2. हाई कोर्ट ने मां का पक्ष सुने बिना फैसले को गलत बताया।

  3. बच्ची की भलाई सर्वोपरि, मामले की दोबारा सुनवाई होगी।

राज्य ब्यूरो, रांची। हाई कोर्ट के जस्टिस एसएन प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने चार साल की बच्ची की कस्टडी से जुड़े मामले में कहा है कि बच्चे की भलाई से जुड़े मामले का फैसला किसी एक पक्ष को सुने बिना नहीं किया जा सकता।

अदालत ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद कर दिया, जिसमें मां की गैरमौजूदगी में एकतरफा सुनवाई करते हुए बच्ची को उसके पिता को सौंपने का निर्देश दिया गया था। हाई कोर्ट ने मामला फिर से फैमिली कोर्ट में भेजते हुए नोटिस के स्तर से दोबारा सुनवाई करने का निर्देश दिया है।

इस संबंध में निचली कोर्ट के आदेश के खिलाफ शगुफ्ता यास्मीन की ओर से अपील दाखिल की गई थी। रांची के फैमिली कोर्ट ने 19 मई को बच्ची की कस्टडी उसके पिता को देने का आदेश दिया था।

मां को उचित मौका नहीं मिला

हाई कोर्ट ने पाया कि कस्टडी का मामला संवेदनशील होने के बाद भी फैमिली कोर्ट ने जल्दबाजी में मामले को एकतरफा घोषित कर दिया। अदालत के रिकार्ड के अनुसार, कस्टडी का मुकदमा अप्रैल 2025 में दायर हुआ था।

नोटिस जारी करने के बाद मामला कई तिथि तक चलता रहा और बाद में 13 अक्टूबर 2025 को इसे एकतरफा सुनवाई के लिए रख दिया गया। हाई कोर्ट ने कहा कि इस दौरान मां की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए कानून के अनुसार जरूरी कदम पूरी तरह नहीं उठाए गए।

अदालत ने यह भी पाया कि बच्ची की मां पहले से एक अन्य मामले में फैमिली कोर्ट में नियमित रूप से उपस्थित हो रही थी। इसके बाद भी उसे कस्टडी से जुड़े मुकदमे की जानकारी नहीं दी गई। हाई कोर्ट के अनुसार, ऐसे मामले में मां को प्रभावी तरीके से अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला।

बच्ची की भलाई सर्वोपरि

हाई कोर्ट ने कहा कि कस्टडी के मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात बच्चे का हित और उसकी भलाई है। बच्चे की स्थिरता और उसके जीवन की निरंतरता भी अदालत के लिए महत्वपूर्ण पहलू हैं। इसलिए केवल कानूनी औपचारिकताओं के आधार पर नहीं, बल्कि बच्चे के कल्याण को ध्यान में रखकर फैसला किया जाना चाहिए।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नाबालिग की कस्टडी का फैसला दोनों पक्षों की भागीदारी के बिना नहीं किया जाना चाहिए। एक पक्ष को सुने बिना अदालत के पास बच्चे के हित का सही आकलन करने के लिए जरूरी जानकारी और दृष्टिकोण नहीं आ सकता।

हाई कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि फैमिली कोर्ट के पुराने आदेश के आधार पर बच्ची की कस्टडी पहले ही पिता को दी जा चुकी है, तो उसे तत्काल मां को वापस किया जाए।