विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

जैप कर्मचारियों को बकाया वेतन देने का झारखंड HC का आदेश, सरकार का 'काम नहीं तो वेतन नहीं' तर्क खारिज

Published: Fri, 25 Sep 2026 06:06 PM (IST)

झारखंड हाई कोर्ट ने जैप के चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों को सेवा से हटाए जाने से लेकर पुनर्बहाली तक की अवधि का ...और पढ़ें

अदालत ने काम नहीं तो वेतन नहीं देने की दलील को किया खारिज।

अदालत ने काम नहीं तो वेतन नहीं देने की दलील को किया खारिज।

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने जैप कर्मचारियों को बकाया वेतन भुगतान का निर्देश दिया।

  2. सरकार के 'काम नहीं तो वेतन नहीं' तर्क को अदालत ने खारिज किया।

  3. आठ सप्ताह के भीतर सभी सेवा लाभ देने का आदेश।

राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत में झारखंड सशस्त्र पुलिस (जैप) में चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों को सेवा से हटाने के बाद पुनर्बहाली तक बकाया भुगतान की मांग को लेकर दाखिल याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई हुई।

सुनवाई के बाद अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ताओं को सेवा से हटाए जाने से लेकर पुनर्बहाली तक की पूरी अवधि का बकाया वेतन और सभी परिणामी सेवा लाभ आठ सप्ताह के भीतर प्रदान किए जाएं।

अदालत ने सरकार के उस तर्क को खारिज कर दिया, जिसमें काम नहीं तो वेतन नहीं के सिद्धांत के आधार पर बर्खास्तगी अवधि का वेतन देने से इन्कार किया गया था। मामला वर्ष 2016 में जैप में हुई चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों की नियुक्तियों से जुड़ा है।

नियुक्ति प्रक्रिया में अनियमितता की शिकायत मिलने के बाद राज्य सरकार ने मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित की थी। कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने पूरी चयन प्रक्रिया को निरस्त करते हुए नियुक्त कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी थीं।

इसके खिलाफ कर्मचारियों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने सेवा समाप्ति के आदेश को रद कर दिया था और याचिकाकर्ताओं को परिणामी सेवा लाभ देने का निर्देश दिया था।

अदालत के आदेश के अनुपालन में सरकार ने कर्मचारियों को दोबारा सेवा में बहाल कर दिया, लेकिन बर्खास्तगी अवधि का वेतन देने से इन्कार कर दिया।

सरकार के आदेश को फिर दी चुनौती

राज्य सरकार के इस निर्णय को दिकेश कुमार एवं अन्य ने अधिवक्ता चंचल जैन के माध्यम से हाई कोर्ट में चुनौती दी। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि सेवा से बाहर रहने की अवधि में उनकी कोई गलती या स्वैच्छिक अनुपस्थिति नहीं थी।

उन्हें सरकार के आदेश के कारण सेवा से बाहर रहना पड़ा था। हाई कोर्ट का पूर्व आदेश अंतिम हो चुका था और सरकार ने उसे किसी अपील में चुनौती भी नहीं दी थी। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने सरकार के काम नहीं तो वेतन नहीं वाले तर्क को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कर्मचारियों की सेवा समाप्त करने का आदेश ही बाद में निरस्त हो चुका है और उन्हें पुनर्बहाल कर दिया गया है, तो सेवा से बाहर रहने की अवधि के सेवा लाभ से उन्हें वंचित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने बर्खास्तगी से पुनर्बहाली तक का पूरा वेतन तथा अन्य परिणामी सेवा लाभ देने का निर्देश देते हुए आठ सप्ताह में आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने को कहा है।