झारखंड के दो मामलों पर हाईकोर्ट का फैसला: कल्लू घोष हत्याकांड में उम्रकैद बरकरार, साहिबगंज का आरोपी बरी
झारखंड हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों से जुड़े दो अलग-अलग फैसलों में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाए हैं। जमशेदपुर के कल्लू घोष हत्याकांड ...और पढ़ें

अदालत ने जमशेदपुर के बिष्टुपुर स्थित धातकीडीह हरिजन बस्ती में कल्लू घोष की गोली मारकर हत्या करने के मामले में फैसला सुनाया।
HighLights
कल्लू घोष हत्याकांड में उम्रकैद की सजा बरकरार।
साहिबगंज के बिल्ला यादव को बरी किया गया।
गवाहों के विरोधाभास के कारण बरी हुए आरोपी।
राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों से जुड़े दो अलग-अलग फैसलों में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाए हैं।
पहली घटना में, अदालत ने जमशेदपुर के बिष्टुपुर स्थित धातकीडीह हरिजन बस्ती में कल्लू घोष की गोली मारकर हत्या करने के मामले में चार भाइयों की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है।
जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने दोषियों की ओर से दायर दोनों अपीलों को खारिज कर दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से घटना की पूरी पुष्टि होती है, इसलिए निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता है।
यह घटना 8 मई 2016 की सुबह की है, जब कल्लू घोष अपने घर के पास स्थित चबूतरे पर योगाभ्यास कर रहे थे।
इसी दौरान उन पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाई गईं, जिससे उनकी टाटा मेन हॉस्पिटल (TMH) में इलाज के दौरान मौत हो गई थी।
निचली अदालत ने ज्योति मुखी, होलिया मुखी, विकास मुखी और गोपी मुखी को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे हाईकोर्ट ने सही ठहराया है।
साहिबगंज के 15 साल पुराने मामले में अभियुक्त बरी
दूसरे मामले में, हाईकोर्ट ने साहिबगंज के लगभग 15 साल पुराने एक अन्य हत्या मामले में बिल्ला यादव उर्फ जैदुलार यादव को बरी कर दिया है।
अदालत ने उसकी आजीवन कारावास की सजा को रद करते हुए कहा कि गवाहों के बयानों में स्पष्ट विरोधाभास था और कथित हत्या में इस्तेमाल हथियार व खून लगी मिट्टी की फॉरेंसिक जांच भी नहीं कराई गई थी।
यह मामला 14 मई 2011 का है, जब सकरीगली निवासी सुचन मंडल की धारदार हथियार से गर्दन पर वार कर हत्या कर दी गई थी। निचली अदालत ने दिसंबर 2016 में बिल्ला यादव को दोषी करार दिया था।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि प्राथमिकी में पुरानी दुश्मनी को वजह बताया गया था, जबकि परिवार के सदस्यों ने ही जिरह के दौरान ऐसी किसी दुश्मनी से इनकार किया।
जांच की इन कमियों और साक्ष्यों के अभाव के कारण अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए अभियुक्त को बरी कर दिया।
