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अनपढ़ से अंग्रेजी में सवाल पूछना, निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन: झारखंड हाई कोर्ट ने हत्यारोपी को किया बरी

Published: Wed, 28 Oct 2026 08:47 PM (IST)

रांची हाई कोर्ट ने एक हत्या के मामले में अनपढ़ आरोपी की आजीवन कारावास की सजा रद्द कर दी है। ...और पढ़ें

हाई कोर्ट ने अभियुक्त की आजीवन कारावास की सजा को निरस्त किया।

हाई कोर्ट ने अभियुक्त की आजीवन कारावास की सजा को निरस्त किया।

HighLights

  1. अनपढ़ आरोपी की आजीवन कारावास की सजा रद्द।

  2. अंग्रेजी में बयान दर्ज करना निष्पक्ष सुनवाई का उल्लंघन।

  3. सीआरपीसी धारा 313 का सही पालन आवश्यक।

राज्य ब्यूरो, रांची। हाई कोर्ट के जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस पीके श्रीवास्तव की अदालत ने एक अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि आरोपित से ऐसी भाषा में सवाल पूछना, जिसे वह समझता ही नहीं, निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने हत्या के एक मामले में यह टिप्पणी करते हुए अनपढ़ व्यक्ति की दोषसिद्धि और आजीवन की सजा निरस्त कर दी।

अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 313 के तहत आरोपित का बयान सही तरीके से दर्ज नहीं करना और उसे अपने खिलाफ सबूतों पर सफाई देने का उचित अवसर नहीं देना, बरी करने का आधार बन सकता है।

अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए आरोपित चमरा उरांव को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया। रांची के अपर न्यायायुक्त सह फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 25 अप्रैल 2018 को चमरा उरांव को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

जमीन विवाद में हत्या करने का था आरोप

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 26 फरवरी 2009 को आरोपित ने शिकायतकर्ता की पत्नी परमेश्वरी देवी को कुएं में धकेल दिया। शिकायतकर्ता ने पत्नी को बचाने के लिए कुएं में छलांग लगाई, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका।

आरोपित शिकायतकर्ता का चाचा था। दोनों पक्षों के बीच जमीन को लेकर विवाद चल रहा था। इसी विवाद को हत्या की वजह बताया गया था। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि चमरा उरांव अनपढ़ ग्रामीण है, लेकिन ट्रायल कोर्ट में धारा 313 के तहत उसका पूरा बयान अंग्रेजी में दर्ज किया गया था।

दस्तावेज पर उसके बाएं अंगूठे का निशान था। रिकार्ड में इस बात का कोई उल्लेख नहीं था कि सवालों को उसकी मातृभाषा में समझाया गया था या जवाब उसे पढ़कर सुनाए गए थे। खंडपीठ ने कहा कि धारा 313 के तहत आरोपित को अभियोजन पक्ष के सबूतों और उसके खिलाफ सामने आई परिस्थितियों को समझाकर अपना पक्ष रखने का अवसर देना अनिवार्य है।

यह केवल कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि निष्पक्ष सुनवाई का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि आरोपित संबंधित भाषा नहीं समझता है, तो दुभाषिए की मदद ली जानी चाहिए।