झारखंड हाई कोर्ट ने अवैध बांग्लादेशी नागरिकों के निर्वासन में देरी पर केंद्र और राज्य सरकार को लगाई फटकार
झारखंड हाई कोर्ट ने अवैध विदेशी नागरिकों के निर्वासन में देरी पर केंद्र और राज्य सरकारों को फटकार लगाई है, ...और पढ़ें

हाई कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार को पर जताई नाराजगी।
राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस संजय प्रसाद की अदालत ने अवैध रूप से भारत में प्रवेश करने वाले विदेशी नागरिकों के निर्वासन में हो रही देरी को लेकर केंद्र सरकार, झारखंड और पश्चिम बंगाल सरकार को कड़ी फटकार लगाई है।
अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि अपनी सजा पूरी कर चुके विदेशी नागरिकों को प्रक्रिया पूरी करने के नाम पर लंबे समय तक जेल में रखकर करदाताओं के पैसों से खाना और सुविधाएं मुहैया कराना कतई उचित नहीं है। एकल पीठ ने बांग्लादेशी नागरिक नजमुल हवलदार की आपराधिक अपील खारिज करते हुए यह आदेश पारित किया।
रिकार्ड के अनुसार, बांग्लादेश के बागेरहाट जिले के निवासी नजमुल हवलदार को फरवरी 2023 में साहिबगंज के तालझारी रेलवे स्टेशन के पास बिना वैध पासपोर्ट और दस्तावेजों के संदिग्ध हालत में पकड़ा गया था। पूछताछ में उसने स्वीकार किया था कि उसने लगभग 20,000 रुपये देकर अवैध रूप से सिलहट सीमा पार की थी।
राजमहल की विशेष अदालत ने 15 जून 2024 को विदेशी नागरिक अधिनियम के तहत उसे दो साल के सश्रम कारावास और 10 हजार के जुर्माने की सजा सुनाई थी। चूंकि उसने अदालत के समक्ष खुद अपना जुर्म स्वीकार कर लिया था, इसलिए झारखंड हाई कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 416 का हवाला देते हुए उसकी अपील को खारिज कर दिया।
सजा पूरी होने के बाद कैंप से फरार होने की कोशिश
अदालत को सूचित किया गया कि नजमुल हवलदार अपनी दो साल की सजा पूरी कर चुका था। इसके बाद उसे प्रत्यर्पण की प्रक्रिया के लिए हजारीबाग स्थित डिटेंशन कैंप में रखा गया था। जून 2025 में वह दो अन्य बांग्लादेशी महिलाओं रीना खान और निपाह अख्तर खुशी के साथ वहां से फरार हो गया, जिन्हें बाद में पुलिस ने दोबारा गिरफ्तार कर लिया।
केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि कानूनी प्रक्रियाओं के पूरी होने तक निर्वासन संभव नहीं है। इस पर हाई कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताते हुए कहा कि यह राज्य और केंद्र सरकार की एजेंसियों की स्पष्ट विफलता है कि सजा पूरी होने के बावजूद उन्हें वापस नहीं भेजा गया।
अदालत ने साहिबगंज के पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया कि भारत में अवैध रूप से प्रवेश कराने और काम दिलवाने में मदद करने वाले राहुल और सागर जैसे लोगों के खिलाफ गहन जांच की जाए, जो पैसों के लिए ऐसा रैकेट चला रहे हैं।
अदालत ने इस आदेश की प्रति झारखंड और पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिवों, डीजीपी तथा केंद्रीय गृह और विदेश मंत्रालय के सचिवों को भेजने का निर्देश दिया। इस अधिकारियों से 25 नवंबर 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट पेश करने को कहा है।
टेरर फंडिंग मामले में सात को मिली जमानत
हाई कोर्ट के जस्टिस आर मुखोपाध्याय और जस्टिस राम शर्मा की अदालत से चतरा के टंडवा स्थित मगध व आम्रपाली कोल परियोजना से जुड़े अवैध फडिंग मामले में सात सजायाफ्ता को राहत मिली है।खंडपीठ ने उन लोगों की जमानत को लेकर दायर हस्तक्षेप याचिका पर सुनवाई करते हुए सातों को जमानत प्रदान कर की।
यह लाभ आधे से अधिक सजा काट लेने के आधार पर मिली है। इसमें विनोद कुमार गंझू, विंदेश्वर गंझू उर्फ विंदु गंझू, बीरबल गंझू, भीखन गंझू, अमर सिंह भोक्ता, प्रेम विकास और अनिश्चय गंझू शामिल है। बता दें कि रांची की एनआइए की विशेष अदालत ने आठ साल पुराने उक्त मामले में 18 अगस्त 2026 को 12 दोषियों को 8 से 10 साल तक सजा सुनाई थी। साथ ही जुर्माना लगाया था।
इस फैसले को सात ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। साथ ही मामले में हस्तक्षेप याचिका (आइए) दायर कर जेल में साढ़े छह साल से अधिक समय बिताने का हवाला देते जमानत की गुहार लगाई थी।
