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RPF की दलील पर झारखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, रेलवे फाटक तोड़ना अब गैर-जमानती अपराध

Published: Wed, 21 Oct 2026 09:12 PM (IST)

झारखंड हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि रेलवे क्रासिंग पर बंद गेट या बैरियर तोड़ना रेलवे अधिनियम के तहत ...और पढ़ें

रेलवे क्रासिंग पर गेट तोड़ना अब गैर-जमानती अपराध: झारखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला।

रेलवे क्रासिंग पर गेट तोड़ना अब गैर-जमानती अपराध: झारखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला।

HighLights

  1. रेलवे क्रासिंग गेट तोड़ना गैर-जमानती अपराध घोषित।

  2. झारखंड हाई कोर्ट ने पूर्व आदेश में संशोधन किया।

  3. रेलवे अधिनियम की धारा 160(2) के तहत कार्रवाई।

राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि रेलवे क्रासिंग पर बंद गेट, चेन या बैरियर को तोड़ना रेलवे अधिनियम के तहत गैर जमानती अपराध है। रेल सुरक्षा बल (आरपीएफ) और केंद्र सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने अपने पूर्व आदेश में संशोधन किया।

इससे पहले सात मई को अदालत ने आरोपित आनंद कुमार यादव की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए इस अपराध को जमानती माना था। आरपीएफ और केंद्र सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई कि रेलवे अधिनियम की धारा 160(2) के तहत अपराध को जमानती मानना सही नहीं है।

इस धारा के तहत दोषी पाए जाने पर अधिकतम पांच साल तक की कारावास का प्रविधान है। इसी आधार पर पूर्व आदेश में संशोधन करने का आग्रह किया गया था।हाई कोर्ट ने आरपीएफ की दलीलों पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसले और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में अपराधों के वर्गीकरण का हवाला दिया।

अदालत ने माना कि धारा 160(2) के तहत दर्ज अपराध गैर-जमानती है। इसके बाद सात मई के आदेश में संशोधन करते हुए मामले का निपटारा कर दिया। यह मामला आनंद कुमार यादव की अग्रिम जमानत याचिका से जुड़ा है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया था कि वह रेलवे फाटक पार करने की कोशिश कर रहा था। इसी दौरान गेटमैन ने अचानक बैरियर गिरा दिया। इससे वह स्कूटी पर ब्रेक नहीं लगा सका और स्कूटी रेलवे फाटक के लोहे से टकरा गई। इस घटना में रेलवे फाटक को कोई नुकसान नहीं हुआ।

इसी आधार पर अग्रिम जमानत देने का अनुरोध किया गया था। पूर्व में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से भी कहा गया था कि धारा 160 (2) के तहत दर्ज अपराध जमानती है और इसलिए अग्रिम जमानत याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।

हालांकि, बाद में इस कानूनी प्रविधान और संबंधित न्यायिक फैसलों पर विचार करने के बाद अदालत ने अपराध के वर्गीकरण को लेकर अपना पूर्व आदेश संशोधित कर दिया।