रांची, राज्य ब्यूरो। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने झारखंड के अफसरों को सुझाव देते हुए खुला पत्र जारी किया है। उनके मुताबिक दबाव में गलत काम अधिकारियों को नहीं करना चाहिए। इसका परिणाम बुरा होता है। उन्होंने अपने मुख्यमंत्रित्व काल का एक अनुभव शेयर करते कहा कि तब उग्रवादियों का उत्पात चरम पर था। योजना ज्यादा से ज्यादा उग्रवादियों, उनके सहयोगियों को मुख्यधारा में वापस लाने की थी। आदिवासी बहुल एक जिले में कुछ उग्रवादियों को संसाधन देने वालों के पीछे पुलिस हाथ धोकर पड़ी हुई थी।

मैंने अपनी बात तुरंत वापस ले ली...

वहां के एक सीनियर पदाधिकारी को बुलाकर कर कहा कि उन्हें मुख्यधारा में लाना चाहता हूं। थोड़ा रहम करिए उनपर। वे अधिकारी रो पड़े और कहा कि सर ये लोग भारी बदमाश हैं। मुझसे तो यह नहीं होगा। आप चाहें तो मुझे वहां से हटा दीजिए। मैंने तुरंत अपनी बात वापस ली और उन्हें कहा कि बेहिचक अपनी कार्रवाई जारी रखिए। आज भी उन्हें देखता हूं तो मुझे उनकी बात याद आ जाती है। उन्हें सम्मान से देखता हूं। संयोगवश वे अफसर भी आदिवासी समाज से ही थे। मैंने पद की गोपनीयता की शपथ ली थी, इसलिए उनका नाम उजागर नहीं करूंगा।

लालची अफसरों की कहानी सुन शर्म आती है...

ठीक इसके उलट कुछ नए अफसरों के भी कानून से अलग सत्ता के इशारे पर चंद पैसे और महत्वपूर्ण पद के लालच में करतूत सुनता हूं तो शर्म आती है और आश्चर्य भी होता है। सरकार के इशारे पर हर गलत काम करने वाले ऐसे कुछ अफसर आजकल परेशानी में अपने-अपने संपर्कों के जरिये मिलते हैं या मिलने का प्रयास करते हैं। उन्हें अपनी करनी का भय है कि न जाने कब उनकी गर्दन दबोची जाए? ऐसे लोग अपनी सफाई देते जब बताते हैं कि उनसे दबाव देकर कैसे गलत करा लिया गया तो सुनकर हैरानी होती है।

मुझे लालू यादव का जमाना याद आ रहा है...

ऐसे लोग जब कहते हैं कि उनके जान पर बन जाएगी तो मजबूरी में सारी पोल-पट्टी खोलना ही पड़ेगा। मुझे लालू प्रसाद का वो जमाना याद आ रहा है, जब चारा चोरी में उनके सहयोगी अफसर, दलाल, सप्लायर खुद जेल जाने लगे तो वे सब खुद भी डूबे और लालू को भी ऐसा डुबा दिया। पिछली गलतियों का उदाहरण सामने होने के बाद भी आखिर कोई अफसर या नेता लालच में कैसे अपना पूरा करियर दांव पर लगाने के बारे में सोच लेता है?

Edited By: M Ekhlaque

जागरण फॉलो करें और रहे हर खबर से अपडेट