रांची, [प्रदीप सिंह]। झारखंड में बिजली की महत्वाकांक्षी योजनाओं की राह में बड़ी बाधा विभिन्न ठेका एजेंसियों की उदासीनता है। टेंडर लेते वक्त ये आगे आकर काम लेने में तत्परता दिखाते हैैं, लेकिन इससे संबंधित मानकों के साथ काम को पूरा करने में कतई गंभीरता नहीं बरतते। इनके रवैये को अधिकारियों का तबका भी प्रोत्साहित करता प्रतीत होता है। जब कार्रवाई की नौबत आती है तो बड़े प्रोजेक्ट्स में ढिलाई बरतने वालों के कारनामे को छिपाने की भरसक कोशिश होती है।

यहां कार्रवाई बस दिखाने भर को होती है, जिससे काली सूची में डाली जाने वाली कंपनियों को खास फर्क नहीं पड़ता। इससे अधिकारी जहां अपनी गर्दन फंसने से बचाते हैैं वहीं कंपनियां बेरोकटोक मनमर्जी से काम करती हैैं। ऐसे ही एक मामले में रिस्ट्रक्चर्ड एक्सेलरेटेड डेवलपमेंट एंड रिफॉर्म प्रोग्राम (आरएपीडीआरपी) की योजनाओं को लंबे अरसे तक अधर में लटकाने वाली एजेंसी ईस्ट इंडिया उद्योग लिमिटेड, गाजियाबाद को महज तीन माह के लिए डिबार किया गया है।

इससे संबंधित आदेश 31 दिसंबर 2019 को जारी किया गया है। कंपनी को डिबार करने का आदेश मार्च 2020 तक प्रभावी रहेगा। आरएपीडीआरपी के महाप्रबंधक के स्तर से यह आदेश जारी किया गया है। यानी महज तीन माह की डिबार की अवधि के बाद कंपनी फिर कोई अन्य कार्य करने को स्वतंत्र होगी।

क्या है मामला

वर्ष 2015-16 से लेकर 2017 तक मेसर्स ईस्ट इंडिया उद्योग, गाजियाबाद को आरएपीडीआरपी के तहत बिजली वितरण व्यवस्था को सुदृढ़, जीर्णोंद्धार और विकसित करने का जिम्मा दिया गया था। 21 मई 2015 को उसे काम अवार्ड किया गया। इसके तहत जमशेदपुर विद्युत आपूर्ति क्षेत्र के जमशेदपुर, चक्रधरपुर, चाईबासा, घाटशिला और मुसाबनी में काम करना था। इसके लिए सहमति पत्र (लेटर आफ इंटेंट) 31 मार्च 2016 को जारी किया गया। ईस्ट इंडिया उद्योग और मेसर्स एनर्जों इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स लिमिटेड, गुडग़ांव का यह ज्वाइंट वेंचर था। करार के मुताबिक कंपनियों को ज्वाइंट वेंचर एग्रिमेंट के तहत कांट्रैक्ट प्राइस का दस प्रतिशत बतौर बैैंक गारंटी देनी थी। इसमें एजेंसी विफल रही। इसके बाद इन्हें सात दिनों की नोटिस देते हुए यह पूछा गया कि क्यों न इनके कार्य को रद कर दिया जाए। इस दरम्यान कंपनी टालमटोल करती रही। अंतत: तीन माह के लिए इसे डिबार कर दिया गया।

झारखंड को लगेगा झटका

आरएपीडीआरपी प्रोजेक्ट्स के तहत बिजली वितरण में विकास और अत्याधुनिक सुधार के कार्य होते हैैं। अगर ये करार और शर्तों के मुताबिक कार्य समय पर संपन्न हो जाते तो संबंधित क्षेत्र में बिजली उपलब्धता की स्थिति बेहतर होती। इसका सीधा असर लोगों के जीवन स्तर के साथ-साथ औद्योगिक निवेश और विकास पर पड़ता। लंबे अरसे तक कार्य अधर में लटकने के कारण अब संबंधित क्षेत्र में इस परियोजना की लागत बढ़ जाएगी। 

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