झारखंड की बड़ी मांग: कोयले को जीएसटी से बाहर करें, राज्यों को मिले विशेष वित्तीय ढांचा
झारखंड ने जीएसटी काउंसिल की बैठक में कोयले को जीएसटी के दायरे से बाहर रखने और खनिज-समृद्ध राज्यों के लिए ...और पढ़ें

वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने जीएसटी काउंसिल के सामने रखा बड़ा प्रस्ताव।
HighLights
कोयले को जीएसटी के दायरे से बाहर रखने की मांग।
खनिज-समृद्ध राज्यों के लिए विशेष वित्तीय ढांचे की वकालत।
कोयले पर वैट लगाने की अनुमति, बिजली कर घटाने का प्रस्ताव।
राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड ने जीएसटी काउंसिल की नई दिल्ली में गुरुवार को हुई बैठक में कोयले को जीएसटी के दायरे से बाहर रखने की मांग करते हुए खनिज समृद्ध राज्यों के लिए विशेष वित्तीय ढांचे की भी मांग की। राज्य की ओर से वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने कोयले पर राज्य को वैट लगाने की अनुमति देने की मांग भी उठाई।
इससे कोयला उत्पादक राज्यों का राजस्व बढ़ेगा। इसके अलावा उन्होंने बिजली उत्पादन पर कर का बोझ 18 प्रतिशत से घटाकर पांच प्रतिशत करने की भी मांग उठाई। जीएसटी काउंसिल की बैठक में झारखंड का प्रतिनिधित्व करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि गंतव्य-आधारित जीएसटी व्यवस्था के कई वर्षों के अनुभव के बाद अब यह समीक्षा का समय आ गया है।
इसकी समीक्षा होनी चाहिए कि संसाधन-उत्पादक राज्यों पर पड़ने वाले वित्तीय, पर्यावरणीय और अंतर-पीढ़ीगत बोझ को कैसे संबोधित किया जाए। झारखंड ने मांग की कि जीएसटी में उपलब्ध आपूर्ति के स्रोत और गंतव्य, कर देनदारी, आइटीसी सृजन और उपयोग, आइजीएसटी प्रवाह तथा सरकारों के बीच निपटान के डेटा को संस्थागत रूप दिया जाए।
इसके साथ ही झारखंड की ओर से वित्त मंत्री ने बताया कि जीएसटी दरों के युक्तिकरण से उसे लगभग 4,000 करोड़ रुपये, वीबी जीरामजी की फंडिंग व्यवस्था बदलने से 4,000 करोड़ रुपये और एमएमडीआर अधिनियम में हालिया बदलावों से 14,000 करोड़ रुपये का नुकसान या अतिरिक्त बोझ झेलना पड़ा है। लगभग 1.36 लाख करोड़ रुपये की पुरानी बकाया राशि भी नहीं मिल रहा है।
ऊर्जा सुरक्षा में बड़ा योगदान, लेकिन लागत राज्य पर
राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि भारत के कुल कोयला भंडार का लगभग 23.27 प्रतिशत अकेले झारखंड में है। झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल मिलकर देश के करीब 57 प्रतिशत कोयला भंडार रखते हैं।
इसके बावजूद पूर्वी क्षेत्र में देश की उपयोगिता-आधारित स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता केवल लगभग 10 प्रतिशत है, जबकि पश्चिमी क्षेत्र में 35 प्रतिशत, दक्षिणी क्षेत्र में 27.5 प्रतिशत और उत्तरी क्षेत्र में 27.3 प्रतिशत है।
झारखंड ने कहा कि वह राष्ट्रीय ऊर्जा एकीकरण और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है, लेकिन संसाधनों का क्षय, खदानों का पर्यावरणीय बोझ, भूमि और वनों का विस्थापन, पुनर्वास और पुनर्स्थापन की जिम्मेदारियां राज्य में ही रह जाती हैं।
गंतव्य सिद्धांत के तहत कोयले पर जीएसटी उपभोग करने वाले राज्यों को चला जाता है, जिससे झारखंड इन लागतों से निपटने के लिए आवश्यक राजस्व से वंचित रह जाता है।
अंतर-पीढ़ीगत लागत और पर्यावरणीय न्याय का मुद्दा
राज्य ने कहा कि कोयला उत्पादन से देशभर में आर्थिक मूल्य कई गुना बढ़ता है, लेकिन खदान, समाप्त होता संसाधन और पर्यावरणीय बोझ मुख्यतः झारखंड में ही रहता है।
खनन से भूमि और जंगल प्रभावित होते हैं, जल और स्थानीय पारिस्थितिकी पर असर पड़ता है, और खदान बंद होने के बाद भी भूमि सुधार, पर्यावरण बहाली और आर्थिक बदलाव दशकों तक चल सकते हैं।
