रांची, किशोर झा। विधानसभा के पहले की सत्रों की तरह मानसून सत्र भी भारी हंगामे की भेंट चढ़ता नजर रहा है। विपक्ष विधानसभा कार्यवाही के दौरान हंगामे के पुराने रुख पर कायम है तो सत्तापक्ष ने आक्रामक जवाब देने के साथ ही शांतिपूर्ण सदन चलाने में अपनी ओर से भी कोई पहल नहीं की। यही कारण है कि पहले विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव और बाद में सरकार के ही वरिष्ठ मंत्री सरयू राय ने सदन के बाधित रहने पर दोनों पक्षों को नसीहत दी। सच तो यह है कि विधानसभा के बाधित रहने से न तो सत्तापक्ष को कोई परेशानी है और न मुख्य विपक्षी दल को। सारे विधेयक और सरकारी कामकाज ध्वनिमत से चल रहे हैं तो मुख्य विपक्षी दल बिना चर्चा, तर्क और बहस के जोरदार हंगामा कर अपने मतदाताओं को यह संदेश दे रहा है कि वह उनके हक के लिए समर्पित है।

विधानसभा के हंगामे के दौरान सरकार ने 2596.86 करोड़ के अनुपूरक बजट, झारखंड नगर पालिका संशोधन विधेयक तथा मोटर वाहन करारोपण संशोधन विधेयक को बिना चर्चा के पास करा लिया है। यह हालत तब है जब झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) समेत तमाम विपक्षी दलों ने विधानसभा से पास हो चुके भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक पर हास्यास्पद तरीके से बहस की मांग कर डाली है। जाहिर है कि यह मांग स्वीकार नहीं की जा सकती थी। इसे मुद्दा बनाकर विपक्ष ने भारी हंगामा कर सदन की कार्यवाही बाधित कर दी है। विधानसभा को बाधित रखने का सत्तापक्ष और विपक्ष का यह रवैये शुरू से है। जब विधानसभा में प्रस्ताव प्रस्तुत किया जाता है, तब वह किसी अन्य पुराने मुद्दे के विरोध में हंगामा खड़ा कर देते हैं। 

भले ही उस दौरान कोई बेहद महत्वपूर्ण प्रस्ताव सदन के पटल पर रखा गया हो लेकिन न तो उस पर चर्चा की जाती है और न विरोध का कारण बताया जाता है। जाहिर है कि चाहे जितना भी महत्वपूर्ण मसला सदन में रखा जाता हो, उसे बिना चर्चा के ध्वनिमत से पास होने दिया जाता है। भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक भी कई माह पूर्व विपक्ष के ऐसे ही हंगामे के दौरान विधानसभा से पास हो चुका है। राज्यपाल के माध्यम से यह राष्ट्रपति तक पहुंच गया तब जाकर विपक्ष की नींद टूटी। ऐसा ही स्थानीय नीति, आम बजट, धर्म स्वतंत्र विधेयक जैसे महत्वपूर्ण विधेयक के दौरान हुआ। विपक्ष ने बाद में तो इन सभी मसलों पर खुलकर प्रतिक्रिया व्यक्त की और विरोध किया लेकिन जब बहस करने तथा जनता को इसके फायदे-नुकसान के बारे में विधानसभा में चर्चा के दौरान बताने का समय आया तो उस दौरान हंगामा कर विधेयक को ध्वनिमत से पास हो जाने दिया।

इस हंगामे का सीधा असर आम जन से जुड़े मुद्दे उठाने के अवसर प्रश्नकाल, विधेयक व सरकारी प्रस्ताव पर चर्चा और सरकार के कामकाज की समीक्षा का मौका गंवाने के रूप में पड़ता है। इस प्रकरण का चिंताजनक पहलू यह है कि वेतन-भत्ते जैसे जिन मसलों में माननीयों के हित जुड़े हों, उसे बड़े  आराम से सर्वसम्मति से पास किया जाता है। इसके साथ ही माननीयों के प्रभाव को कम करने वाले निजी स्कूलों और डाक्टरों पर नकेल कसने संबंधी विधेयकों में पक्ष और विपक्ष के विधायक एकजुट होते नजर आते हैं।

सत्तापक्ष और मुख्य विपक्ष के इस रुख का सीधा सा मतलब यही समझ में आता है कि विपक्ष की रणनीति सत्तापक्ष को इच्छानुसार फैसला लेने देने और बाद  में बिना किसी ठोस तर्क के उसे जनविरोधी करार देकर हंगामा कर अपने वोट बैंक को अपने साथ जोड़े रखने की है। सत्तापक्ष की मंशा भी मुख्य विपक्षी दल के नेताओं पर व्यक्तिगत कड़ी टिप्पणी कर राजनीतिक लड़ाई को भाजपा बनाम झामुमो करने की प्रतीत हो रही है। ऐसे में बाकी विपक्षी दल सिर्फ सहयोगी और समर्थक की भूमिका में सीमित होते जा रहे हैं। सबसे अहम बात यह है कि इस पूरे प्रकरण में भले ही कुछ राजनीतिक दलों का जनाधार सिमट रहा हो लेकिन सर्वाधिक नुकसान जनता और उसके नागरिक अधिकार का हो रहा है। जनप्रतिनिधियों को चुन कर विधानसभा भेजने का उनका मकसद हर बार अधूरा रह जाता है।

यह सवाल हर गंभीर राजनेताओं के साथ ही प्रबुद्ध नागरिकों के समक्ष मुंह बाए खड़ी है कि इस स्थिति से कैसे बाहर निकला जाए? सत्तापक्ष और विपक्ष के आरोप-प्रत्यारोप और विधानसभा की कार्यवाही के हंगामे की भेंट चढ़ने से जनप्रतिनिधियों के साथ ही आम जनता के हित भी बुरी तरह से प्रभावित हो रहे हैं। विधानसभा अध्यक्ष और खाद्य आपूर्ति मंत्री की चिंता वाजिब है लेकिन इसका तब तक समाधान निकलना संभव नहीं दिखता है, जब तक कि यह चिंता अन्य जनप्रतिनिधियों को भी न हो और उनमें इस स्थिति से बाहर निकलने की छटपटाहट न हो।

Posted By: Babita

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