रांची, [विनोद श्रीवास्‍तव]। हाल ही में रिलीज हुई फिल्म 'छपाक' से एसिड अटैक का दंश झेल चुकी लक्ष्मी अग्रवाल का दर्द एक बार फिर चर्चा में है। झारखंड में समय-समय पर एसिड अटैक के मामले सामने आते रहे हैैं। यहां के गोमिया (बोकारो) की सपना का दर्द भी लक्ष्मी अग्रवाल जैसा ही है, कई मायने में उससे भी बड़ा। तेजाब के हमले ने लक्ष्मी की खूबसूरती छीन ली तो सपना को भी यह जिंदगी भर का दर्द दे गया। इंसाफ की लड़ाई लड़ते हुए लक्ष्मी तेजाब हमले की पीड़‍िताओं का रोल मॉडल बन चुकी हैैं। वहीं सपना ने भी हर पल जिंदगी के लिए संघर्ष किया।

द्वेषवश एक व्यक्ति ने साजिश के तहत छलपूर्वक सपना के पूरे परिवार को एक साथ तेजाब पिला देने की साजिश रची थी। साजिश का शिकार होकर तेजाब पीने के बाद सपना के भाई-बहन और पिता की मौत हो गई, सपना की जान किसी तरह बची, लेकिन उसकी भोजन नली तेजाब से जलकर बुरी तरह सिकुड़ चुकी है। परिवार के सदस्यों और अपनी भोजन नली को खोने के बाद भी सपना ने अपने सपनों को ना मरने दिया ना ही झुलसने। इस संघर्ष के क्रम में उसे तेजाब पिलाने वाले पर वह कार्रवाई की गुहार लगाने के लिए पुलिस की शरण में जाने का भी मौका नहीं मिला। आरोपित लंबे समय तक फरार रहा। अभी हाल ही में उसकी भी मौत हो गई। 

अंधविश्वास में तीन लोगों की गई जान, सपना ने भी बहुत कुछ खोया...

अपनी इस हालत के लिए सपना अंधविश्वास को भी एक बड़ी वजह मानती है। यही कारण है कि सपना अब अंधविश्वास मिटाने की मुहिम में जुट गई है। सपना का संघर्ष 20 वर्ष पुराना है। बात अप्रैल 1999 की है। तब वह 13 वर्ष की थी। घर की आर्थिक बदहाली दूर करने के नाम पर उसके पड़ोसी ने सपना के पिता को मंत्रयुक्त जल बताकर तेजाब पीने को दे दिया। अंधविश्वास के कारण उसपर भरोसा कर परिवार के सभी लोग उसकी बातों में आ गए।

सपना के पिता भोला स्वर्णकार ने जैसे ही तथाकथित मंत्रयुक्त जल कंठ से नीचे उतारा, उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि यह जल नहीं एसिड है। उन्होंने ठीक बगल में बैठी पत्नी वीणा और छोटे बेटे घनश्याम का ग्लास झटक दिया। तबतक उनकी बड़ी बेटी आशा, बड़ा बेटा गोपाल और छोटी बेटी सपना तेजाब पी चुके थे। इस घटना के कुछ ही देर बाद सपना की बहन ने पास के अस्पताल में दम तोड़ दिया। बाद में बेहतर इलाज की आस में सभी को रांची लाया गया। यहां कुछ दिनों के बाद सपना का भाई भी चल बसा।

सपना और उसके पिता की स्थिति गंभीर होती देख दोनों को मुंबई ले जाया गया। दोनों की भोजन नली पूरी तरह से जल चुकी थी। वहां दो वर्षो तक इलाज चला, लेकिन पिता को बचाया नहीं जा सका। इस तरह छल से पिलाए गए तेजाबयुक्त जल ने सपना के परिवार के तीन सदस्यों की जान ले ली। सपना अब 33 साल की है। इस बीच उसकी शादी भी हुई, दो बच्चे भी हैैं। इतना कुछ खोने के बाद भी उसके हौसले टूटे नहीं हैैं। वह अब समाज को जागरूक करने के अभियान में जुटी है।

पाइप गले में डालकर किसी तरह ले पाती है तरल भोजन

उधर सपना जिंदगी और मौत से संघर्ष करती रही। मुंबई के डॉक्टरों ने सपना को ढाई फीट लंबी पाइप दी। वह उसे हर दिन गले के अंदर डालकर उसके सहारे भोजन नली को फैलाती है, फिर कुछ तरल पदार्थ ले पाती है। लगभग 14 वर्षों तक गुमनामी की जिंदगी जीने के बाद सपना एक दिन सामाजिक कार्यकर्ता उदय शंकर झा के संपर्क में आई। इसके बाद उसके संघर्ष को यहां बल मिला। सजल चक्रवर्ती तब झारखंड के मुख्य सचिव हुआ करते थे। तब उनकी पहल पर सपना को फुसरो नगर निकाय में अनुबंध आधारित नौकरी मिली। साथ ही लंबे संघर्ष के बाद लगभग दो साल पूर्व बतौर मुआवजा तीन लाख रुपये मिले।

अब एम्स पर टिकी है सपना की आस

क्रिश्चन मेडिकल कालेज वेल्लोर, प्रिंस अली और लीलावती अस्पताल मुंबई जैसे नामी-गिरामी अस्पतालों का खाक छान चुकी बोकारो की आस अब एम्स पर टिकी है। सपना फिलहाल फरीदाबाद में एक परिचित के यहां है। अब वह इलाज के लिए एम्स के अलग-अलग विभागों के संपर्क में है।

अंधविश्वास के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी है सपना ने

अंधविश्वास की राह पर चलकर सपना के परिवार का जो हाल हुआ है, उसकी पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए सपना ने अंधविश्वास के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी है। गैर सरकारी संगठन 'आसराÓ से जुड़कर वह अपनी इस मुहिम को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने की जुगत में है।

Posted By: Alok Shahi

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