रांची, प्रदीप सिंह। राज्य बिजली वितरण निगम में मनमाने दाम पर खरीदे गए बिजली उपकरण इनसुलेटर की जांच संबंधी आरंभिक रिपोर्ट प्रबंधन को सौंप दी गई है। प्रारंभिक रिपोर्ट के मुताबिक इनसुलेटर की खरीद में अनियमितता के प्रमाण मिले हैं। इस आधार पर बिजली वितरण निगम के कई वरीय पदाधिकारियों की गर्दन फंस सकती है।

राज्य के ज्यादातर बिजली एरिया बोर्ड में बड़े पैमाने पर हाल के वर्षो में इनसुलेटर खरीदे गए थे। बिजली वितरण निगम को शिकायत मिली कि इनसुलेटर की वास्तविक कीमत और खरीदने की दर में भारी अंतर है। तफ्तीश में इसे सही पाया गया।

बिजली वितरण निगम ने तत्काल इस मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित की। इसका नेतृत्व तत्कालीन वित्त नियंत्रक अमित बनर्जी कर रहे थे। उनका हाल में तबादला किया गया है। जल्द ही इस घोटाले से संबंधित फाइनल रिपोर्ट प्रबंधन को सौंप दी जाएगी।

200 का इनसुलेटर खरीदा 1600 रुपए तक में : जिस वक्त खरीद हुई उस समय इनसुलेटर की सामान्य बाजार में कीमत 200 रुपए तक थी लेकिन राज्य के अलग-अलग एरिया बोर्ड और सर्किल में इस मद में अलग-अलग राशि का भुगतान हुआ।

एक इनसुलेटर के लिए 400 रुपये, 600 रुपये से लेकर अधिकतम 1600 रुपये तक का भुगतान किया गया। इसकी खरीद राची, जमशेदपुर, धनबाद, मेदिनीनगर समेत अन्य एरिया बोर्ड और सर्किल में हुई।

तमाम विद्युत आपूर्ति क्षेत्रों में बीते दो वित्तीय वर्ष में 3,35,023 इनसुलेटर खरीदे गए। दस्तावेज के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2015-2016 में 2,11,242 और वित्तीय वर्ष 2016-2017 में 1,23,781 इनसुलेटर खरीदे गए। इनसुलेटर की कीमत में बाजार कीमत के मुकाबले भारी अंतर पाया गया। शिकायत के बाद बिजली निगम मुख्यालय ने इस गड़बड़ी को पकड़कर उजागर किया। तत्काल बिजली निगम मुख्यालय ने तमाम एरिया बोर्ड के महाप्रबंधकों से आरोपों के बाबत पूछताछ की। जवाब संतोषप्रद नहीं पाए गए। इसके बाद वित्तीय विशेषज्ञों की टीम से इसका जांच कराने का निर्णय किया गया।

वित्तीय अधिकारों का दुरुपयोग : इनसुलेटर की कीमत में भारी अंतर का मामला तकनीकी पेंच में भी फंस सकता है। नियम के मुताबिक सभी उपकरणों की खरीद टेंडर के द्वारा की जाती है। बिजली एरिया बोर्ड और सर्किल को इस बाबत वित्तीय अधिकार है। खरीद के लिए मुख्यालय से अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं है। ऐसे में अधिकारियों को इस नियम का फायदा मिल सकता है कि वे अपने स्तर से क्रय के लिए स्वतंत्र हैं और खुले टेंडर के जरिए लिए जाने वाले फैसले को चुनौती नहीं दी जा सकती।

ऊर्जा विभाग ने भी स्पष्ट किया है कि खरीदारी के लिए बोर्ड मुख्यालय का आदेश आवश्यक नहीं है। डेलिगेशन आफ फाइनेंशियल पावर के मुताबिक उपकरणों की खरीद के लिए सक्षम अधिकारी तय होते हैं।

Posted By: Jagran