बिजय कुमार ठाकुर, रांची : सरकारी विद्यालयों को विलय करने की इन दिनों सरकार की योजना चल गई है, विद्यालय मर्ज किए जा रहे हैं। गुणवत्ता के हिसाब से सरकार जहां इसे अच्छा मान रही है, वहीं शिक्षक संघ के प्रतिनिधि व आम व्यक्ति इसे शिक्षा विभाग की विफलता बता रहे हैं। विफलता न होती तो पूर्व में खर्च कर खोले गए विद्यालयों को क्यों बंद किया जाता, यह भी बड़ा सवाल है।

इस वर्ष भी जिले में 315 विद्यालयों को विलय किया गया। वे मध्य विद्यालय जो एक ही परिसर या 100 मीटर की दूरी स्थित है, उन्हें प्रशासनिक रूप से विलय किया गया है। इसके अलावा 52 विद्यालयों को डिग्रेड किया गया। डिग्रेड वाले में जिन विद्यालयों एक से आठ तक कक्षाएं संचालित थी, उनमें छह से आठ तक की कक्षाएं बंद कर दी गई। वहां अब एक से पांच तक की पढ़ाई होगी।

विद्यालयों के विलय से विद्यार्थियों की परेशानी बढ़ी है, अभिभावकों की परेशानी भी बढ़ गई है। कहीं निजी विद्यालयों के बढ़ते प्रभाव से तो सरकारी विद्यालय नहीं सिमट रहे हैं, यह बड़ा सवाल है। सरकारी विद्यालयों के सिमटने से एक ओर जहां निजी विद्यालयों को फलने-फूलने का मौका मिलेगा, उनका विस्तार होगा, वहीं गरीब बच्चे पढ़ाई से वंचित होंगे। क्योंकि सरकारी विद्यालयों के अधिकतर बच्चे वंचित वर्ग के होते हैं।

जिनके माता-पिता की माली हालात ठीक नहीं होती, वहीं सरकारी विद्यालयों में अपने बच्चों को भेजते हैं। ताकि वह शिक्षा भी ग्रहण कर ले और सरकार की ओर से मिलने वाले मीड डे मिल खाकर पेट की भूख भी मिटा सके। ऐसे में सरकार का हर बच्चे को शिक्षा देने का उद्देश्य कैसे पूरा होगा। शत फीसद साक्षरता का लक्ष्य ऐसे में कैसे पूरा होगा।

राज्य सरकार के फैसले ने बच्चों व अभिभावकों दोनों को परेशानी में डाल दिया है। स्कूल की दूरी का पैमाना भी बढ़ गया। शिक्षकों को भी मर्ज किए गए विद्यालयों में जाकर बच्चों को पढ़ाना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में मर्ज किए गए कई विद्यालय संबंधित गाव से दूरी पर हैं। प्राथमिक विद्यालयों में छोटे बच्चे अध्ययन करते हैं। ग्रामीण क्षेत्र के विद्यार्थियों को अब अपने गांव के नजदीक वाले गांव के विद्यालय में जाकर शिक्षा लेनी होगी।

वहीं शहरी क्षेत्रों में दूसरे मोहल्ले के विद्यालयों में जाना होगा। ऐसे में सड़क पार करने की परेशानी व अधिक समय लगने से अभिभावकों की भी चिंता सताएगी। इस दौरान उन्हें ज्यादा परेशान होना पड़ेगा। विद्यालयों में बच्चों की संख्या बढ़ाने की बजाए कम संख्या वाले विद्यालयों को बंद करते हुए मर्ज करने की योजना सरकार के शिक्षा विभाग की कार्यशैली पर प्रश्न खड़ा कर रही है।

किस वर्ष कितने विद्यालयों का हुआ विलय व डिग्रेड :

वर्ष विद्यालयों की संख्या

2010 -29

2011 -62

2016 -133

2018 -367

प्रखंड के विलय के बाद पुनर्गठित विद्यालय :

प्रखंड विद्यालयों की संख्या

बुढ़मू - 42

तमाड़ -35

लापुंग -30

रांची -27

राहे -27

बुंडू -27

खलारी -25

कांके -22

सिल्ली - 22

नामकुम -20

नगड़ी -17

बेड़ो -16

सोनाहातू -15

अनगड़ा -05

मांडर -09

चान्हो -09

रातू -08

ओरमांझी -09

इटकी -02

विलय करने के सरकारी प्रावधान :

- वैसे प्राथमिक व मध्य विद्यालय जिनमें 20 से कम विद्यार्थी नामांकित हैं। वहीं एक किलोमीटर की परिधि में दूसरा प्रारंभिक, मध्य व उच्च विद्यालय स्थित है।

- वैसे विद्यालय जहां 21 से 60 विद्यार्थी अध्यनरत हो तथा 500 मीटर की परिधि में अन्य विद्यालय स्थित हो।

- वैसे मध्य विद्यालय जिनमें प्राथमिक स्तर पर 30 से अधिक तथा उच्च प्राथमिक स्तर पर 60 से कम विद्यार्थी अध्ययनरत हो तथा दो किलोमीटर की परिधि में कोई दूसरा मध्य, उच्च विद्यालय हो

- एक ही परिसर में दो विद्यालय संचालित हो रहे हों।

'जिस उद्देश्य के लिए विद्यालय खोले गए थे, उनकी पूर्ति नहीं हो रही है। नियमावली के तहत स्कूल खुले, लेकिन विद्यार्थियों की कमी बनी रही। स्कूल ज्यादा हो गए, कहीं-कहीं तीन स्कूल हो गए। स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए विलय किया गया। इससे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित होगी।'

- शिवेंद्र कुमार, जिला शिक्षा अधीक्षक।

'स्कूलों के विलय से वंचित वर्ग के लोगों को कठिनाई हो रही है। यह सरकार की गलत नीतियों से हो रहा है। सभी को शिक्षा का अधिकार प्राप्त है। इसके बावजूद सरकारी स्कूल को बंद या विलय करना, निजी विद्यालयों को बढ़ावा देने के बराबर है। वंचित वर्ग के बच्चों को शिक्षा मिलना मुश्किल होगा।

- नसीम अहमद, प्रदेश प्रवक्ता, अखिल झारखंड प्राथमिक शिक्षक संघ।

Posted By: Jagran

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