रांची, संजीव रंजन। झारखंड के गांवों में हॉकी को लेकर जबरदस्त क्रेज रहा है। शरीर से मजबूत आदिवासी लड़कियां गांव की माटी में हॉकी स्टिक से अपनी कलाकारी दिखाती नजर आती हैं। एक अरमान यह भी रहता है कि खेल कोटे से कोई नौकरी-रोजगार मिल जाए। लेकिन आर्थिक स्थिति मजबूत न होने और पर्याप्त प्रशिक्षण के अभाव में वे आगे नहीं बढ़ पातीं। मानव तस्करों का जाल भी इनकी राह में बड़ा रोड़ा है। कम पढ़े लिखे गरीब मां-बाप को चंद पैसों का लालच देकर ये तस्कर यहां की बेटियों को फुसलाकर महानगरों में बेच देते हैं।

इस समस्या के समाधान के लिए भी अब हॉकी को हथियार बनाया जा रहा है। मानव तस्करों के खिलाफ काम करने वाली स्वयंसेवी संस्था शक्ति वाहिनी की इस पहल को अमेरिकी काउंसलेट का भी साथ मिल गया है। दोनों मिलकर इस काम को मिशन मोड पर अंजाम दे रहे हैं। हॉकी में रुचि रखने वाली लड़कियों को अपने साथ जोड़कर बेहतर प्रशिक्षण व संसाधन मुहैया करा रहे हैं। साथ ही, उन्हें मानव तस्करों के खिलाफ भी जागरूक किया जा रहा है। गांवों की इन गरीब लड़कियों को बेहतर भविष्य की राह दिखाई जाती है और इसके लिए अन्य प्रशिक्षण-मार्गदर्शन सहित आर्थिक मदद भी दी जाती है। इन्हें शिक्षित करने के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेजी भी सिखाई जा रही है।

अमेरिका के दो कोच व तीन एथलीट दे रहे प्रशिक्षण

रांची स्थित दक्षिण पूर्व रेलवे के एस्ट्रोटर्फ स्टेडियम में ग्रामीण इलाकों की 106 लड़कियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। अमेरिकी काउंसलेट व स्वयंसेवी संस्था द्वारा आयोजित हॉकी शिविर में अमेरिका के दो प्रशिक्षक व तीन एथलीट इन लड़कियों को प्रशिक्षण देने के लिए मौजूद हैं। लड़कियां सुबह व शाम जमकर अभ्यास कर रही हैं। इसके साथ ही कैंप लगाकर इन्हें पढ़ाया भी जा रहा है। इन लड़कियों में कोई भी डे बोर्डिंग व आवासीय सेंटर की नहीं है, लेकिन उनकी प्रतिभा को देख अमेरिकी सेंटर के उप निदेशक जे ट्रेलोर भी हतप्रभ हैं। वे कहते हैं कि इन खिलाड़ियों में से कम से कम दो दर्जन ऐसी हैं, जो राज्य टीम में भी जगह पा सकती हैं। चूंकि हॉकी यहां काफी लोकप्रिय है, इसलिए इस खेल के जरिये हम समाजिक बुराइयों को समाप्त करना चाह रहे हैं।

उग्रवाद प्रभावित जिलों की हैं ज्यादातर खिलाड़ी 

शिविर में भाग लेने वाली खिलाडिय़ों में ज्यादातर उग्रवाद प्रभावित जिलों की हैं। पहले चरण में छह जिलों की लड़कियों का चयन किया गया। दूसरे चरण में दूसरे जिलों की लड़कियों के लिए शिविर लगाया जाएगा और यह लगातार चलता रहेगा। लड़कियों का चयन उन जिलों के थाना क्षेत्रों में शिविर आयोजित कर किया गया।

पुलिस प्रशासन व रेलवे का मिला सहयोग

मानव तस्करी सहित अन्य सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने के लिए शुरू इस मुहिम को पुलिस प्रशासन व दक्षिण पूर्व रेलवे का सहयोग मिला है। रेलवे ने स्टेडियम उपलब्ध कराया जबकि लड़कियों के चयन में सभी थानों की पुलिस सहयोग कर रही है।

हर साल 500 लड़कियों को बचाते हैं

हर वर्ष झारखंड से औसत पांच सौ लड़कियों को मानव तस्करों से छुड़ा घर वापस भेजते हैं। हॉकी से इन्हें जोड़ कर हम इन्हें सजग कर रहे हैं। खाली समय में मैदान पर जाने से इनकी प्रतिभा भी निखर रही है।

-रविकांत, अध्यक्ष, शक्ति वाहनी।

हॉकी-शिक्षा-जागरूकता

हॉकी से इनके लगाव के चलते हम इन्हें अपने साथ जोड़ने में और जागरूक करने में कामयाब हो रहे हैं। खेल के साथ उन्हें शिक्षित भी किया जा रहा है। हम इन्हें इस तरह तैयार कर रहे हैं कि वे मानव तस्करों के चंगुल में न फंसने पाएं और बेहतर भविष्य के लिए तत्पर रहें।

-जेए ट्रेलोर, डिप्टी डायरेक्टर, अमेरिकन सेंटर।

Posted By: Sachin Mishra