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    Hool Diwas Special: जीने का नैसर्गिक अधिकार पत्र है हूल

    By Vikram GiriEdited By:
    Updated: Wed, 30 Jun 2021 01:07 PM (IST)

    राजमहल के जंगलों में आज से डेढ़ सौ साल पहले लोग यह गीत गाते थे। इस गीत को गाते हुए झारखंडी जनता तब भी मारी गयी और इसी तरह के गीत गाते हुए आज भी कॉरपोरेट और सत्ता के टारगेट पर है। 1855 की जनविरोधी परंपरा आज तक जारी है।

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    Hool Diwas Special: जीने का नैसर्गिक अधिकार पत्र है हूल। जागरण

    पत्नी, बच्चे, घर-द्वार के लिए भाई

    बछड़े, बकरों के लिए भाई

    हूल हम जरूर करेंगे

    पहले जैसी आजादी के लिए भाई

    पहले जैसी मुक्ति के लिए भाई

    हूल हम जरूर करेंगे

    रांची। राजमहल के जंगलों में आज से डेढ़ सौ साल पहले लोग यह गीत गाते थे। इस गीत को गाते हुए झारखंडी जनता तब भी मारी गयी और इसी तरह के गीत गाते हुए आज भी कॉरपोरेट और सत्ता के टारगेट पर है। 1855 की जनविरोधी परंपरा आज तक जारी है, यह सामाजिक न्याय का दंभ भरनेवाले सरकारों और सत्ता व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल है। जबकि इस नयी सदी में दुनिया भर की शासक पार्टियां कह रही हैं कि प्रकृति और प्राकृतिक जनों की रक्षा के लिए कृत संकल्प हैं।

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    कई देश तो सार्वजनिक रूप से माफी तक मांग चुके हैं कि राष्ट्र ने इतिहास के पिछले दौर में आपसब देशज-आदिवासी समुदायों के साथ अमानवीय सलूक किया। 2006 में ‘वन अधिकार अधिनियम’ लागू करते हुए भारत सरकार ने भी कहा कि हम इतिहास की गलतियों को स्वीकार करते हुए वन्य क्षेत्र के निवासियों के अधिकारों की रक्षा के प्रति संवैधानिक वचनबद्धता को दुहराते हैं।

    इस तरह के मासूम स्वीकारोक्तियों और वचनबद्धता से पूरा इतिहास भरा पड़ा है। मासूम इसलिए कि सामाजिक न्याय के संकल्प आज भी न सिर्फ अधूरे हैं बल्कि इससे सरकार की दूरियां लगातार बढ़ती ही जा रही हैं। झारखंड, छत्तीसगढ़, ओड़िसा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, राजस्थान और दक्षिण के प्रदेशों में जो हालात बन गए हैं, वह बताता है कि स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। हूल, उलगुलान, भूमकाल और सन 47 के बाद किये गये संवैधानिक वायदों की अनदेखी बढ़ती जा रही है।

    इसलिए हूल दिवस के इस अवसर पर इतिहास और वर्तमान को याद करना जरूरी होगा। जिससे हम 1855 से जारी जनयुद्ध के कारणों को सामाजिक न्याय के परिप्रेक्ष्य में देख सकें। इसके आलोक में अपन समझदारी विकसित कर सकें कि कोई भी समाज-राष्ट्र आखिर अपने ही देशज-आदिवासी समुदायों के, वह भी संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद, क्यों जीने के अधिकार से वंचित करते हुए उन्हें अलगाव में डाल रहा है, उन्हें जनयुद्ध की ओर धकेल रहा है।

    भारत के आदिवासी जनों के साथ भेदभाव इतिहास लेखन के साथ ही शुरू हो जाता है। जब हम सभी पाठ्य पुस्तकों, इतिहास की किताबों में सिर्फ और सिर्फ यही पढ़ते हैं कि भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के सिपाही विद्रोह से शुरू होता है। झारखंड, पश्चिम बंगाल और बिहार की सीमा पर राजमहल के जंगलों में जबकि 1880 में तिलका मांझी का जनयुद्ध हो चुका था। इसके करीब 70 साल बाद 1855 में हुआ हूल तो एक व्यापक, संगठित और रणनीतिक रूप से सुनियोजित युद्ध था।

    जिसके विस्तार और प्रभाव को अंग्रेज अधिकारियों से लेकर तत्कालीन लेखकों ने समान रूप से स्वीकार है। इस दृष्टि से आर कार्सटेयर्स लिखित ‘हाड़मा विलेज’, जिसका प्रकाशन 1935 में हुआ, एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज है। जिसमें हूल का आंखों देखा विवरण दर्ज है। र्कासटेयर्स 1855 से 1859 तक संताल परगना में डिप्टी कमिश्नर रहा था। ‘हाड़मा विलेज’ का संताली अनुवाद आर. आर. के. रापाज किस्कू ने 1946 में ‘हाड़मावाक् आतो’ का रोमन लिपि में प्रकाशित किया था। हिंदी अनुवाद 2012 में शिशिर टुडू ने किया। जो ‘ऐसे हुआ हूल’ के नाम से प्रकाशित हुआ।

    यह औपन्यासिक दस्तावेज हूल के जिन कारणों पर विस्तार से प्रकाश डालता है, उससे अलग आज की परिस्थिति बिल्कुल नहीं है। बल्कि पहले से ज्यादा बदतर हुई है. पहले तो कम से कम एक बड़ा विभाजन यही था कि शासक बाहरी अर्थात् विदेशी थे। लेकिन 47 के बाद शासक देशी हुए और कहा गया कि देश आजाद हो गया, सभी नागरिक अब स्वतंत्र हैं।

    झूठी स्वतंत्रता और भ्रष्ट लोकतंत्र के कारण विरोध करना, असहमति जताना, अन्याय-अत्याचार की खिलाफत करना और आत्मरक्षार्थ हथियार उठाना सीधे-सीधे देशद्रोह मान लिया जाता है। शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के साथ शासक वर्ग का रवैया कसाई और बकरी की तरह है। ऐसे में आदिवासी जनता क्या करे? हम जानते हैं कि तमाम संवैधानिक प्रावधानों, कानूनों, सराकरी नीतियों-कार्यक्रमों, घोषणाओं और आश्वासनों के बावजूद देश के आदिवासी इलाके हूल की तरह ही त्रस्त हैं और प्रतिरोध में लगातार उबल रहे हैं।

    1855 में हुए देश के इस प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में सिर्फ संताल ही नहीं शामिल थे। उस इलाके सारे समुदाय, जो सूदखोरी, महाजनी, जमींदारी जुल्म, पुलिसिया अन्याय और औपनिवेशिक लूट से पीड़ित थे, हूल में शामिल थे। संतालों की आबादी चूंकि राजमहल के इलाके में सबसे ज्यादा थी और उन्होंने ही इस जनयुद्ध का नेतृत्व किया था, इसलिए इसे संताल हूल कहा जाता है. लेकिन यह वास्तव में संतालों के नेतृत्व में हुआ देश का पहला जनयुद्ध था। इसीलिए हूल के तुरंत बाद 15 अगस्त 1855 को अंगरेजी सरकार ने यह घोषणा करते हुए उस इलाके में 14 हजार सैनिकों को तैनात किया था -

    ‘‘जान पड़ता है, संताल आदिवासियों ने सरकार के विरुद्ध विद्रोह किया, लूट-पाट की, लोगों के प्राण लिये और सरकारी फौजों का सामना किया, फिर भी उनमें से अधिकांश अपना मूर्खता को महसूस करते हुए क्षमा चाहते हैं, पहले की तरह मिलजुलकर रहना चाहते हैं। इसलिए सरकार की ओर से यह घोषणा की जाती है कि चूँकि सरकार अपनी प्रजा की भलाई चाहती है, अतः संताल लोग पथभ्रष्ट हो चुकने के बाद भी हाकिमों, अधिकारियों के पास दस दिनों के अन्दर आत्मसमर्पण कर दें, तो जाँच के बाद नेताओं को छोड़कर अन्य लोगों को क्षमा प्रदान कर दिया जाएगा। और अगर इस घोषणा के बाद भी कोई सरकार के विरुद्ध खड़ा होगा, तो उसे अविलंब सजा दी जायेगी।’’

    लेकिन योद्धाओं ने समर्पण नहीं किया। महाजनी-सामंती और अंगरेजी राज के खिलाफ नारा और बुलंद हुआ - ‘जुमीदार, महाजन, पुलिस राजदेन आमला को गुजुकमाड़’। अर्थात ‘जमींदार, महाजन, पुलिस और सरकारी अमलों का नाश हो। ’ ‘बिर-बुरु ओकेया-ओकेया’ (जल, जंगल, जमीन हमारा है हमारा है.)। आज भी देश के आदिवासी क्षेत्रों में यही नारा है। कोई नया नारा नहीं है। जब नारा नया नहीं है तो जाहिर है परिस्थितियां वही हैं। सवाल, मुद्दे और मांगें भी वही हैं।

    हद तो तब हो जाती है जब देश का संवैधानिक प्रमुख, जिस पर आदिवासी इलाकों के लिए संविधान में किये गये विशेष प्रावधान 5वीं अनुसूची की रक्षा का दायित्व है, एक निजी कंपनी के उद्घाटन के लिए संताल परगना में आता है और भारी जनविरोध के बावजूद कॉरपोरेट का साथ देता है। आदिवासियों को संवैधानिक प्रमुख से मिलने नहीं दिया जाता। समूचे क्षेत्र में अघोषित कर्फ्यू लगा दिया जाता है। ऐसी स्थिति में यह दोष देना कि आदिवासी नक्सली राजनीति का हिंसक रास्ता अपना रहे हैं, अपनी बेईमानी, करतूतों और दमनात्मक कार्रवाइयों को छुपाना है।

    सरकार और समाज को हूल की असहमतियों पर विचार करना ही होगा। हूल मांग का कोई ज्ञापन नहीं है। यह ऐतिहासिक अस्वीकार है लूट, दमन और आज के विध्वंसकारी विकास मॉडल का। यह दावा है प्रकृति जनों का प्रकृति और समूची समष्टि के लिए. प्रकृति, जानवर, वनस्पतियां, ग्रह, नक्षत्र और इंसान सभी के हित सुरक्षित रहें इसकी कामना है हूल। सरकारी नीतियां और सोशल कॉरपोरेट रिस्पांसब्लिटी जिसकी अवमानना करती है। उनके विकास और पुनर्वास के कार्यक्रम ‘वसुधैव कुटुंबकम’ तक पहुंच नहीं बना पाते। जो थोड़ा बहुत भी पहुंच पाता है - संविधान की पांचवीं अनुसूची - उसे स्थगित कर रखा गया है।

    हूल की मूल भावना 1855 में भी संवाद की थी। लेकिन सत्ता की अनदेखी और दमन के कारण वह भारतीय इतिहास का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम बन गया. हमारी सरकारें और समाज का दलाल हिस्सा इसे प्रथम ‘स्वतंत्रता संग्राम’ नहीं मानकर आज भी सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो के वंशजों को, जिनमें आदिवासी और कमजोर, वंचित सभी मेहनतकश व कारीगर समुदाय शामिल हैं, जीने के लिए लगातार जनयुद्ध की ओर ले जा रहा है। आदिवासी इलाकों में सेनाएं उतारी जा रही हैं। हम इतिहास के सबक को बार-बार भूल जाते हैं कि संवाद सेनाएं नहीं करती।

    - अश्विनी कुमार(स्वतंत्र लेखक)