रांची, जासं। मानवता की लाज बचाने में दिन-रात जुटी झारखंड की राजधानी रांची की एक संस्‍था स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं के लिए मिसाल बन गई है। वे लावारिस लाश जिनको मोक्ष दिलाने वाला कोई नहीं, जिनका शव अंत्‍येष्टि का महीनों इंतजार करता है। इसके लिए ये वरदान सरीखे साबि‍त हो रहे हैं। मुक्ति नाम की इस संस्‍था के लिए मानो मानवता से बड़ी सेवा कोई दूजा नहीं। अज्ञात लाशों को वे पूरे विध‍ि -विधान से दाह-संस्‍कार कर उनकी अंत्‍येष्टि करते हैं। अब तक 719 शवों की अंत्येष्टि कर संस्‍था दूसरों को भी मानवता की सेवा की प्रेरणा दे रही है।

रविवार को मुक्ति संस्था की ओर से सूबे के सबसे बड़े अस्‍पताल में महीनों से पड़े 41 अज्ञात लावारिस शवों का विधि विधान से जुमार नदी के तट पर अंतिम संस्कार किया गया। प्रातः 9 बजे से ही संस्था के सदस्य रिम्‍स के शीत शव गृह पहुंच गए और इन लाशों की पैकिंग शुरू कर दी।

सभी शवों को ट्रैक्टर से जुमार नदी के घाट पर ले जाया गया। जहां चिता सजा कर संस्था के अध्यक्ष प्रवीण लोहिया द्वारा सामूहिक अग्नि दी गई। पुष्प, चंदन, घी, कपूर इत्यादि सभी सामग्री अर्पित कर अंतिम संस्‍कार की तमाम रस्‍में पूरी की गईं। संस्‍था के सभी सदस्‍यों ने शव को प्रणाम कर अंतिम अरदास किया। इस दौरान मौके पर परमजीत टिंकू, अंशु मित्तल, कमल चौधरी, अरुण कटियार, हरजीत सिंह, अमित किशोर, सुदर्शन कुमार और संदीप पपनेजा आदि मौजूद रहे।

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Posted By: Alok Shahi