प्रमोद सिंह, ओेरमांझी। बिरसा जैविक उद्यान में वर्तमान में तीन हाथी रामू, सम्राट और लक्खी हैं। हाथियों को मुख्य रूप से उनके इनक्लोजर में चुन्नीलाल महतो और बैजनाथ महतो के अलावा महेंद्र सिंह देखते थे। लक्खी और सम्राट को तो अन्य लोग भी घुमाते-फिराते थे और खाना देते थे, लेकिन रामू के पास महेंद्र के अलावा कोई नहीं फटकता था। कारण था कि रामू ने एक साल पहले ही महेंद्र सिंह पर हमला कर दिया था। इसमें महेंद्र सिंह का एक हाथ टूट गया था। उससे पहले रामू ने चुन्नीलाल को भी पीठ से गिरा दिया था। इससे उसका भी हाथ टूट गया था। उस समय चुन्नीलाल को महेंद्र सिंह ने ही बचाया था। महावत महेंद्र सिंह भी प्रत्येक दिन सुबह जब रामू को घुमाते थे, तो उनके पीछे दो सहयोगी डंडा लेकर रहते थे, ताकि कुछ गलत होने पर डंडा दिखाकर हाथी को डराया जा सके, लेकिन रविवार को यह भी काम नहीं आया।

छठ की छुंट्टी के बाद शनिवार को लौटे थे महेंद्र छठ से पहले महेंद्र सिंह अपने घर बिहार गया हुआ था। वहां से लौटकर शनिवार शाम को ही काम पर लौटा था। जू में इसकी चर्चा है कि रामू मस्ती में आ गया था। जब हाथी मस्ती में आता है, तो किसी की भी नहीं सुनता है। उसे काबू करना नामुमकिन सा हो जाता है। महावत हाथी के हावभाव से समझ जाता है। चूंकि महेंद्र शनिवार को ही लौटकर आए थे, इसलिए वह उसकी पहले से चल रही गतिविधियों को नहीं समझ सके।

इनक्लोजर में खुला घूम रहा है रामू

रामू हाथी महेंद्र सिंह पर हमला करने के बाद से इनक्लोजर में खुला ही घूम रहा है। अभी तक उसे नियंत्रित नहीं किया जा सका है। रात में भी वह खुला ही घूम रहा था। उसे केज में नहीं डाला जा सका है। जू कर्मियों का कहना है कि कोई भी कर्मी हाथी के इनक्लोजर में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। सोमवार को अधिकारी व कर्मी हाथी को उसके केज में बाधने के लिए कोई न कोई जुगाड़ लगाएंगे। दूर से ही ईख-वगैरह खाने के लिए फेंककर दिया गया है।

दूर से हाथी को देखते हैं दर्शक

बिरसा जू में घूमने वाले दर्शकों को हाथी का दर्शन दूर से ही होता है। क्योंकि, हाथी को उनके इनक्लोजर से बाहर नहीं लाया जाता है। हाथी के इनक्लोजर के चारो ओर ट्रेंच खोदा हुआ है। हाथी ट्रेंच में उतर नहीं पाता है। इसलिए महावत जब उसे इनक्लोजर में घुमाते हैं, तो लोग उसे देखते हैं। हाथी दर्शकों का अभिवादन भी करता है। लोगों को जरा सा भी आभास नहीं होता है कि कौन सा हाथी किस मूड का है। हाथी को खाने में बरगद व पीपल का पत्ता, ईख महुआ व केला दिया जाता है। इसके अलावा उसे खीरा व ककड़ी भी दिया जाता है।

तेंदुआ निकल गया था केज से

बिरसा जैविक उद्यान खतरनाक होता जा रहा है। इसके लिए जू प्रबंधन जिम्मेदार है। कई जानवर अपने केज से बाहर निकल जा रहे हैं, जो दर्शकों के लिए खतरनाक है। पहले हाथी को उनके इनक्लोजर से बाहर जू में भी घुमाया जाता था, जहा दर्शकों को दर्शन हो जाता था। एक बार एक हाथी ने अपने महावत को झाड़ी में गिरा दिया और जंगल में घुस गया। प्रबंधन ने उस समय दर्शकों को उधर जाना ही रोक दिया। काफी मशक्कत के बाद उसे उसके इनक्लोजर तक ले जाया जा सका। उसी समय के बाद से हाथी को इनक्लोजर से नहीं निकाला जाता है। इसी साल छह माह पहले एक तेंदुआ अपने केज से बाहर निकल गया था। उस समय भी प्रबंधन का हाथ-पैर फूल गया था। आनन-फानन सभी दर्शकों को जू से बाहर किया गया व तेंदुआ को खाने का लालच देकर उसके केज तक पहुंचाया गया था। बंदर तो जब-तब अपने इनक्लोजर से बाहर निकल जाते हैं और दर्शकों को परेशान करते हैं।

जीवन सुरक्षा की व्यवस्था नहीं है

जू में बिरसा जू में जीवन सुरक्षा के लिए कोई इंतजाम नहीं किया गया है। अगर कोई जानवर किसी कर्मी अथवा किसी दर्शक पर हमला कर दे, तो उसे बचाने की कोई व्यवस्था नहीं है। न ही कोई कर्मी को इसके लिए ट्रेनिंग दी गई है। अगर ऐसा रहता, तो महेंद्र सिंह को तुरंत इलाज के लिए ले जाया जा सकता था। उसे मेदाता डेढ़ घटे बाद ले जाया जा सका, जब अधिकारी राची से आए तब। उससे पहले सभी कर्मी हाथी के इनक्लोजर से दूर भाग खड़े हुए थे। रामू के डर से कोई इनक्लोजर में नहीं जा रहा था।

चौबीस सालों तक दैनिक वेतनभोगी के रूप में थे महेंद्र सिंह

महेंद्र सिंह बिरसा जू में 1991 में आए थे। उन्हें तत्कालीन जू निदेशक फतेह बहादुर सिंह संजय गाधी जू पटना से लाए थे। उस समय बिरसा जू का सेटअप किया जा रहा था। पलामू से एक बाघ आया था, जो बीमार था। उसी की देखरेख के लिए लाया गया था। 1991 से 2016 तक महेंद्र सिंह बिरसा जू में दैनिक वेतनभोगी के रूप में काम कर रहे थे। 2016 में 17 कर्मियों की पशुपालक सह स्वीपर पद पर नियुक्ति हुई थी। उसी में महेंद्र सिंह की भी नियुक्ति हुई थी। इस बीच सम्राट नामक हाथी व बाघ के बच्चे को बोतल से दूध पिलाकर पाला था। जू के पुराने दर्शक व सभी बड़े अधिकारी उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते थे।

पति की लंबी आयु के लिए पत्‍‌नी ने किया था छठ

मेदाता में महेंद्र सिंह की पत्‍‌नी ललिया देवी, पुत्रवधू कमला कुमारी व नाती आशा कुमारी बैठी हुई थीं। पत्‍‌नी को दो बजे तक नहीं बताया गया था कि महेंद्र सिंह की मौत हो गई है। पुत्रवधू ने नहीं बताने को कहा था। पर पत्नी सभी सहकर्मी और जू के अधिकारी को देखकर काफी व्यग्र हो गई। तब उन्हें सबकुछ धीरे-धीरे बताया गया। वास्तविकता जानने के बाद पत्‍‌नी के क्रंदन से मेदाता का परिसर गमगीन हो गया। पत्‍‌नी कह रही थी कि साथ में ही छठ करने गए थे। मईया से उनकी उम्र के लिए पूजा किए थे, लेकिन क्या हो गया। कहा चूक हो गई। पूरा परिवार सहित छठ करने घर गए हुए थे। शनिवार को पाच दिन की छुट्टी के बाद लौटे थे। उसी दिन शाम को काम पर चले गए और रविवार को सुबह घटना हो गई। महेंद्र सिंह के पुत्र मध्यप्रदेश में बैंक में कार्यरत हैं। उनके आने के बाद सोमवार को शव का पोस्टमार्टम होगा।