जागरण संवाददाता, राची : भगवान जगन्नाथ की स्नान यात्रा आगामी पाच जून को विधि-विधान से संपन्न होगी। इसके बाद भगवान एकातवास में चले जाएंगे। 22 जून को नेत्रदान अनुष्ठान के बाद प्रभु जगन्नाथ एकातवास से वापस आम जन के बीच लौटेंगे। 23 जून को ऐतिहासिक रथ यात्रा होगी। बहन सुभद्रा एवं भाई बलराम के साथ एक सप्ताह तक मौसी के घर रहने के बाद एक जुलाई को भगवान जगन्नाथ वापस अपने धाम लौटेंगे। इसे घुरती रथ यात्रा भी कहा जाता है। रथ यात्रा का अनुष्ठान तो तय है लेकिन कोरोना संक्रमण के कारण अनुष्ठान में आमलोगों की सहभागिता पर संशय की स्थिति है।

जिस प्रकार संक्रमण बढ़ रहा है, ऐसे में रथ यात्रा भव्य रूप से मनाया जाए इसकी संभावना बहुत कम है। इसे लेकर गुरुवार को ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव के प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी प्रवीर नाथ शाहदेव सदर एसडीओ से मुलाकात करेंगे। इसके बाद ही कुछ स्पष्ट हो पाएगी। हालाकि, अनुष्ठान की तैयारी आरंभ हो चुकी है। रथ मरम्मती का काम किया जा रहा है। मंदिर के प्रधान पुजारी ब्रजभूषण नाथ मिश्र के अनुसार मंदिर के अंदर अनुष्ठान की तैयारी चल रही है। जन सहभागिता होगा या नहीं इसका निर्णय जिला प्रशासन को लेना है। उसी अनुरूप आयोजन होगा। एक सप्ताह पूर्व ही इस मामले में सीएम को पत्र लिखा गया था। एकातवास के दौरान मंदिर में नहीं होगी पूजा

पाच जून को स्नानयात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ के विग्रह को गर्भगृह से बाहर निकालकर स्नानमंडप पर विराजमान कराकर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच स्नान कराया जाएगा। इसके बाद भगवान 15 दिनों के एकातवास में चले जाएंगे। इस दौरान मंदिर में पूजा अर्चना नहीं होगी। एकातवास में आराम करने के दौरान भगवान की विशेष सेवा की जाती है। भगवान जगन्नाथ के साथ बहन सुभद्रा एवं भाई बलराम का दिव्य श्रृंगार किया जाता है। 22 जून को नेत्रदान के साथ श्रृंगार पूरा होता है उसके बाद भगवान जनमानस के बीच आते हैं।

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पुरी की तर्ज पर निकलती है रथयात्रा

नागवंशी राजा ठाकुर एनी नाथ शाहदेव ने करीब 327 साल पूर्व 1691 में करवाया था। खास बात ये है कि पुरी की तरह यहा भी भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि को रथ यात्रा का विहंगम दृश्य देखने को मिलता है। ठाकुर एनी नाथ शाहदेव ने मंदिर के रख-रखाव के लिए तीन गाव जगन्नाथपुर, आमी और भुसु की जमीन मंदिर को दान में दी थी।

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सभी जाति धर्म के लोगों को मंदिर से जोड़ा

जगन्नाथपुर मंदिर आध्यामिक केंद्र के साथ-साथ सर्वधर्म सद्भाव का भी केंद्र माना जाता है। ठाकुर शाहदेव ने आसपास रहने वाले सभी जाति धर्म के लोगों को मंदिर से जोड़ा था। 326 साल पहले यहा हर जाति और धर्म के लोग मिल-जुलकर रथयात्रा का आयोजन करते थे। श्री जगन्नाथ को जहा घासी जाति के लोग फूल मुहैया कराते थे, वहीं उराव घटी प्रदान करते थे। मंदिर की पहरेदारी मुस्लिम किया करते थे। रजवार जाति द्वारा विग्रहों को रथ पर सजाया जाता था। मिट्टी के बर्तन कुम्हार देते थे। बढ़ई और लोहार रथ का निर्माण करते थे। वहीं, ट्रस्ट बनने के बाद अब इस रथयात्रा का आयोजन ट्रस्ट के द्वारा कराया जाता है।

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रथयात्रा के दौरान नौ दिन तक मौसीबाड़ी में रुकते हैं भगवान

ऐतिहासिक जगन्नाथ रथ यात्रा पर भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ नौ दिन के लिए मौसी के घर जाते हैं। मौसी गुडिचा देवी के घर नौ दिन आतिथ्य सत्कार स्वीकार करने के बाद प्रभु वापस अपने धाम लौट आते हैं। प्रभु की अनन्य भक्ति के कारण ही जगन्नाथ मंदिर के समीप ही गुडिचा देवी(मौसीबाड़ी) का मंदिर बनवाया गया। मंदिर के मुख्य पुजारी ब्रज भूषण मिश्र के अनुसार कृष्णावतार में भगवान विष्णु से एक बार सुभद्रा कहती है, भैया आपकी पूजा को हर कोई करेगा। भैया बलराम और मैं आपके भाई-बहन हैं हमारी भी पूजा होनी चाहिए। बहन की विनती सुनकर भगवान आशीष देते हैं कि कलयुग में जगन्नाथ रूप में मेरे साथ भैया बलराम और तुम्हारी भी पूजा होगी। इसी मान्यता के तहत जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ के साथ भाई बलराम और बहन सुभद्रा की भी पूजा होती है।

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12 पीढ़ी से रथ मरम्मत करता है लोहार परिवार

रथ यात्रा निकलेगी या औपचारिकताएं निभायी जाएंगी यह जिला प्रशासन को तय करना है लेकिन पीढ़ी दर पीढ़ी रथ मरम्मत कार्य करने वाले लोहार परिवार इस साल भी पूरे मनोयोग से रथ मरम्मत में जुटा है। जगन्नाथपुर इलाके में ही रहने वाले महावीर लोहार व उत्तम लोहार बीते अक्षय तृतीया से ही रथ मरम्मत में जुटे हुए हैं।

Posted By: Jagran

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