Jharkhand Navratri 2026: गुप्त साधना और तांत्रिक चेतना के केंद्र हैं ये शक्तिपीठ, नवरात्र में दर्शन मात्र से पूरी होती है मनोकामना
Maha Navratri 2026: नवरात्रा से पहले जानिए झारखंड के नौ महत्वपूर्ण तांत्रिक शक्ति स्थलों को जहां माता के दर्शन मात्र ...और पढ़ें

रामगढ़ जिले के रजरप्पा के इस मंदिर में प्राकृतिक शिला की पूजा होती है।
HighLights
झारखंड के नौ प्रमुख तांत्रिक शक्ति स्थलों का विस्तृत विवरण।
शारदीय नवरात्र 2026 की तिथियां और पूजा-विधान की जानकारी।
रजरप्पा, लातेहार, मलूटी सहित कई मंदिरों का आध्यात्मिक महत्व।
जागरण संवाददातता, रांची। दस अक्टूबर को महालया है। यह दिन मां के अवतरण का दिन है। शहर में दुर्गाबाटी से लेकर बांग्ला पूजा पंडालों में महालया का आयोजन होगा। अगले दिन 11 को नवरात्र प्रारंभ हो जाएगा। दस दिवसीय नवरात्र का समापन 20 को होगा।
प्रतिमाओं का विसर्जन 21 को किया जाएगा। इस बार शहर में करीब पौने दो सौ पूजा पंडाल बन रहे हैं। चतुर्थी से ही पंडालों के पट खुलने शुरू हो जाएंगे। शहर में उत्सव की धूम है। सबरंग का यह अंक झारखंड के नौ तांत्रिक शक्ति स्थलों पर केंद्रित है। इसकी जानकारी दे रहे हैं रवि सिंह चौधरी। अभी हाल में जागो मां नाम से इनकी पुस्तक आई है।
1. रजरप्पा का मां छिन्नमस्तिका मंदिर
जहां भैरवी नदी वेग से उतरकर शांत दामोदर से मिलती है, वहीं चट्टानों के बीच मां छिन्नमस्तिका का रजरप्पा मंदिर खड़ा है। स्वयं अपना मस्तक धारण करने वाली छिन्नमस्ता दशमहाविद्याओं की रहस्यमयी देवी हैं।
रामगढ़ जिले के रजरप्पा के इस मंदिर में प्राकृतिक शिला की पूजा होती है और परिसर में काली सहित दूसरी महाविद्याओं के मंदिर भी हैं। अमावस्या और पूर्णिमा पर साधक यहां विशेष अनुष्ठान करते हैं। नदी, वन, जनजातीय आस्था और तंत्र का यह संगम रजरप्पा को वास्तव में झारखंड का अद्वितीय शक्ति-केन्द्र बनाता है।
2. लातेहार का मां उग्रतारा मंदिर
घने जंगलों और शांत पहाड़ियों के बीच पहुंचते ही लातेहार का उग्रतारा मंदिर किसी पुराने साधना-क्षेत्र जैसा अनुभव कराता है। तारा दशमहाविद्याओं की दूसरी देवी हैं, जबकि उग्रतारा उनका प्रचंड और रक्षक स्वरूप हैं।
मान्यता है कि देवी भय, संकट और अज्ञान से मुक्ति देकर साधक को आंतरिक शक्ति प्रदान करती हैं। मंदिर की विशेषता उसकी भव्यता नहीं, बल्कि सदियों से जीवित और आज भी सुरक्षित पूजा-विधान तथा रहस्यमय वातावरण है। नवरात्र तथा विजयादशमी पर यहाँ विशेष अनुष्ठान होते हैं। वन, पर्वत, लोकविश्वास और तारा-साधना का संगम इसे झारखंड की महत्त्वपूर्ण तांत्रिक धरोहर बनाता है।
3. मलूटी मंदिर समूह और मां मौलिक्षा
झारखंड और बंगाल की सीमा पर स्थित मलूटी में प्रवेश करते ही लगता है मानो पूरा गांव मंदिरों में बदल गया हो। कभी यहां 108 मंदिर बताए जाते थे। अनेक मंदिर अपनी टेराकोटा कला के साथ खड़े हैं। इस धार्मिक संसार के केंद्र में मां मौलिक्षा हैं, जिन्हें राजपरिवार की कुलदेवी और मां तारा की बड़ी बहन माना जाता है।
प्रसिद्ध तांत्रिक बामाखेपा की साधना-स्मृति भी यहां जीवित है। काली मंदिर, भैरव उपासना, वज्रयान के संभावित संकेत और निकट स्थित तारापीठ से सम्बन्ध मलूटी को केवल धरोहर नहीं, बल्कि पूर्वी भारत की बहुस्तरीय तांत्रिक चेतना का जीवित संसार बनाते हैं।
4. चतरा इटखोरी का मां भद्रकाली मंदिर
लगभग 1960 के दशक में प्रतिमा चोरी हुई, पर कोलकाता से बरामद होकर पुनः मंदिर पहुंची। इस घटना के बाद पशुबलि बंद करके शाकाहारी बलि अपनाई गई। महाकाल संहिता में वे नौकाली के नौ स्वरूपों में सम्मिलित हैं, जबकि कालिका पुराण उन्हें महाकाली की अभिव्यक्ति बताता है।
वहां महिषासुर अपनी मृत्यु का पूर्वाभास पाकर उन्हीं की आराधना करता है और अंततः उनसे मुक्ति का वर मांगता है। इसीलिए भद्रकाली एक साथ युद्ध की प्रचंड देवी और मोक्ष देने वाली करुणामयी माता हैं। शिवपुराण-कथा में वे शंखचूड़ की सेना का सामना करने वाली शिव की महान सेनानायिका के रूप में भी उभरती हैं।
5. चतरा का कौलेश्वरी पीठ
कोल्हुआ पहाड़ की चढ़ाई पूरी करने पर सामने खुला आकाश, रहस्यमय जलकुंड और कौलेश्वरी देवी का प्राचीन मंदिर दिखाई देता है। चतरा के हंटरगंज के निकट लगभग 1,575 फुट ऊंची इस पहाड़ी पर देवी को काली और शक्ति के रूप में पूजा जाता है।
यहां मंदिरों, गुफाओं, शिलाखंडों और जैन प्रतिमाओं के अवशेष बिखरे हैं। हिंदू, जैन और बौद्ध, तीनों परंपराएं इस पर्वत से अपना संबंध जोड़ती हैं। इसका एकांत वातावरण सहज ही साधना-भूमि का आभास देता है।
6. गोड्डा का योगिनी शक्तिपीठ
गोड्डा के पथरगामा क्षेत्र में पहाड़ियों और हरियाली के बीच स्थित योगिनी स्थान पहली दृष्टि में शांत दिखाई देता है, पर स्थानीय समाज में इसकी गहरी प्रतिष्ठा है। देवी को यहां योगिनी स्वरूप में पूजा जाता है और परंपरा इसे शक्तिपीठ मानती है।
श्रद्धालु मनोकामना, संरक्षण और आध्यात्मिक शक्ति की कामना लेकर पहुंचते हैं। “योगिनी” नाम तंत्र की उस प्राचीन धारा की स्मृति जगाता है जिसमें देवी स्वतंत्र और प्रचंड शक्ति हैं। हालांकि इसे चौसठ योगिनी मंदिर-परंपरा से जोड़ने के लिए पुरातात्त्विक प्रमाण अपेक्षित हैं, फिर भी यह स्थल झारखंड की अनलिखी तांत्रिक और लोक-स्मृतियों के अध्ययन का द्वार है।
7. बैद्यनाथ धाम का जयदुर्गा शक्तिपीठ
देवघर में अधिकांश यात्री बाबा बैद्यनाथ के दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन इस तीर्थ के भीतर देवी की समान रूप से महत्त्वपूर्ण कथा छिपी है। शक्तिपीठ परम्परा मानती है कि यहां सती का हृदय गिरा था। यहां शक्ति जयदुर्गा और भैरव वैद्यनाथ कहलाते हैं।
मंदिर परिसर में शिव और देवी की निकटता बताती है कि दोनों की उपासना को अलग करके नहीं देखा जा सकता। तांत्रिक दर्शन में शिव निष्क्रिय चेतना हैं और शक्ति उसकी अभिव्यक्ति। इसीलिए बैद्यनाथ धाम केवल ज्योतिर्लिंग नहीं, शिव-शक्ति का संयुक्त क्षेत्र भी है, जहां हृदय भक्ति, ऊर्जा और चेतना का प्रतीक बन जाता है।
8. गुमला का मां महामाया मंदिर
गुमला के आदिवासी बहुल भूभाग में स्थित हापामुनी का महामाया मंदिर एक हजार वर्षों की स्मृतियां संजोए हुए है। ऐतिहासिक विवरण इसकी स्थापना को नागवंशी राजा गजघट राय और दसवीं शताब्दी से जोड़ते हैं। मंदिर ने समय के साथ संघर्ष, विनाश और पुनर्निर्माण देखा, लेकिन देवी की पूजा नहीं रुकी।
यहां राजवंशीय इतिहास, ग्रामीण विश्वास और जनजातीय परिवेश एक सांस्कृतिक धारा में मिलते हैं। महामाया का अर्थ उस ब्रह्मांडीय शक्ति से है जो संसार को प्रकट भी करती है और उसके रहस्य को ढकती भी है।
9. गिंजो ठाकुरगांव का भवानीशंकर मंदिर
रांची से 35 किमी दूर गिंजो ठाकुरगांव के भवानीशंकर मंदिर में देवी उपस्थित हैं, लेकिन श्रद्धालु उनकी प्रतिमा नहीं देख सकते। स्थानीय मान्यता के अनुसार माँ भवानी और भगवान शंकर की अष्टधातु युगल प्रतिमाएँ पूजनीय हैं, दर्शनीय नहीं।
नवरात्र में पुजारी आंखों पर पट्टी बांधकर उनका वस्त्र बदलते और तांत्रिक विधि से पूजा करते हैं। इसकी परंपरा को सोलहवीं शताब्दी और नागवंशी राजपरिवार से जोड़ा जाता है। संधि पूजा, पारंपरिक बलि और राजपरिवार की सहभागिता आज भी जीवित है। गोपनीयता, भय और श्रद्धा से घिरा यह मंदिर शिव और शक्ति को दो अलग देवताओं के बजाय एक संयुक्त सत्ता के रूप में प्रस्तुत करता है।
शारदीय नवरात्र 2026
पंडित रामदेव पांडेय, रांची ने बताया कि इस वर्ष कुल 10 दिनों का नवरात्र है। दशमी मंगलवार को होने के कारण मूर्ति का विसर्जन अगले दिन यानी बुधवार, 21 अक्टूबर 2026 को किया जाएगा।
| तिथि एवं दिन | तिथि / नक्षत्र / योग | मुख्य कार्यक्रम / अनुष्ठान |
| 11 अक्टूबर 2026 (रविवार) | • प्रतिपदा (रात 8:37 तक) • चित्रा नक्षत्र (रात 10:49 तक) • वैधृति योग (रात 10:42 तक) • अभिजित मुहूर्त (दिन 10:52 से 1:09 तक) | कलशस्थापन (घटस्थापना) |
| 16 अक्टूबर 2026 | षष्ठी | बेलबोधन |
| 17 अक्टूबर 2026 (शनिवार) | • दुर्गा सप्तमी • मूल नक्षत्र (सुबह 8:58 तक) | • महासप्तमी (नव पत्रिका प्रवेश, पटपट्टाभिषेक, प्राण-प्रतिष्ठा) • मूल नक्षत्र में देवी सरस्वती का आवाहन |
| 18 अक्टूबर 2026 | • महाष्टमी: रविवार सुबह 5:54 से सोमवार सुबह 6:53 तक • सूर्योदय के योग से महाष्टमी | • महाष्टमी व्रत • रात्रि में महा निशा पूजन |
| 19 अक्टूबर 2026 | • संधि पूजन सुबह 6:53 पर • उत्तराषाढ़ नक्षत्र (दिन 2:00 बजे तक) | • संधि पूजन व बलि पूजन • घरों में हवन |
| 20 अक्टूबर 2026 | • नवमी (दिन 9:35 तक) • श्रवण नक्षत्र (शाम 4:09 तक) | • पंडालों में हवन • नवरात्र का पारण • दोपहर में विजयादशमी उत्सव (देवी का आगमन/गमन पैदल - अशुभ संकेत) |
| 21 अक्टूबर 2026 (बुधवार) | दशमी मंगलवार को होने के कारण | मूर्ति विसर्जन |
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